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Full text of "Sipi Sukt"

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प्राप्प स्थान -- 
चुन्नीलाल भोमराज घोथरा 
गंगाशहर, (राजस्थान) 


अ्रथमावृत्ति १००० 


मूल्य-- ३)०० 


सुद्रक-- 


पवन श्रार्ट प्रेस, 
बोकानेर 


 आ ७ ४.  क्‍ि>नजननीयतणी--++++ 7 


स्र्म्र्पंणा 


उस महान सिन्धु को 
जिसके अनन्त अन्तस्थल की 
उत्ताल तरंगों से भाव भाष के रूप में पानी उठा, युग सापषा 
पवन से प्रवाहित होकर नील गगन में छितरा | उपयुक्त तापक्रम 
या बादल के मिष वरसा और उत्तप्त मानव मेदिनी को तृप्त 
करता सरिता के रूप में आगे बढ़ा श्राज वही श्रमृत जल उसी 
महान्‌ सिच्धु के श्री चरणों में पुनः ....-«+*+- 


--मुनि चन्दन “सरदार” 


दम कि नमक मरक कम मिल अत लव अब का #कसउन्‍अक 


प्रस्तावना --+ 


2 विचार एक तत्त्व है। तत्त्व एक .दिशा-बिन्द है । वह बिन्दू 
जो सत्य-अ्रन्वेषण की प्रेरणा देता है। 
० अन्वेषण ही जीवन का मंथन है। आत्म-मंधन, जो मानव 
की-गति-का प्रेरक है ।;+ : ४६० कं (१४ 
» गति में उत्तरोत्तर प्रगति है ॥. प्रगति में. युग-दर्शन का 
 प्रतिबिम्ब है। इस प्रतिबिम्ब को युग-पुरुष तत्त्व के प्रकाश 
में देखता; अनुभव करता और अपने जीवन-मंथन से तत्त्व ' 
का दिग्दशन देता है। :. - ' | 
७ यही दिग्दर्शन दर्शन का: रूप लेता, : हवा.. में, फ़ंलता शौर 
जीवन-रश्मियों में रमणा करता हुआ अपनी किरणों तत्त्व 
में प्रस्कुटित करता है । । 
. ० ब्िन्दु-बिन्दु विचार का सा सार-दशन लिये प्रस्तुत “सीपी- 
सूक्त” केवल पुस्तकीय विचार नहीं, वरन्‌ जीवन-साधना 
से प्रेरित एक ऐसे साधक को शोध. है, . जिन्होंने इसे केवल - 
ज्ञान और अनुभव से ही नहीं वरच्‌ अपने आत्म-योग से 
सींचा है। यह योग जीवन में भी नवीन चिन्तन को धारा 
लिए एक ऐसा मंथन है, जो युग-सत्य से उद्वेलित है और 
सार-भूत है । 


9 ग्णुक्रत द्रष्टा आचार्य श्री तुलसी ने योग साधना के साथ 
'अगुक्नत-दर्शन' के रूप में योग-जीवन में भी युग का एक 
नया झिन्‍्तन दिया है। उन्हीं के शिष्य मुनि श्री चन्दनमलंजी 
ने विचार अन्वेषण का यह चुम्बक प्रस्तुत किया है ! 

७ मुनि श्री चन्दमलजी का सरदारशहर में जन्म हुआझा 

और वि० सं० २००० गंगाशहर में आचार्य, श्री तुलसी के 

कर कमलों से दीक्षित हुए । साधना के पथ पर बढ़ते हुए 
अनेक विप्नय्नों का अध्ययन किया, तथा गणित ज्योतिष के 
अच्छे विशेषज्ञ हैं । | 

“सीपी-सूक्त” की विशेषता यह है कि अपनी आकार प्रकार 

पूर्ण पुस्तकीय पृष्ठ के अनुसार ही लगभग सूत्र वाक्यों का 

इसमें वजनदार और महत्वपूर्णो संकल॒त है, जो राष्ट्रीय 

अन्तर्राष्ट्रीय, सामाजिक, वेयक्तिक, धामिक एवं वेचारिक 
सभी विषयों का सारपूर्ण तत्त्व के रूप में पाठक को प्रेरणा 
बोध देती है ५ निसन्‍्देह जीवन की विविध दिशाश्रों की 
ज्ञान-भारती के रूप में “सीपी-सूक्त” मानव-सुख की 
जीवन-भारती है, जो प्रत्येक के मनन एवं शोधन के लिए 
पठनीय और संग्रहण य है । 


» “सीपी-सूक्त” से हम कुछ भी गाह्य .कर सके तो हंमारे 
लिए यह एक सफल अभिव्यक्ति हैं। उसो की नम्न आकांक्षा 
के साथ इस सारपूर्ण विचार-संकलन के लिए आपका 
सविनतय अभिनन्दत करता हूँ। 


वोधि-स्थल देवेन्द्रकुमार करशाविट 
राजनंगंर सम्पादक : “अरुब्नत 
१ जुलाई १६६७ के 


पाठकगण ही बतलायेंगे जो स्वयं साहित्यकार है, साहित्य प्रेमी 
हैं शर साहित्य के मर्मज्ञ हैं । मुझे जो जो वाक्यांश भावपुर्सण 
और हृदय स्पर्शी लगे उन्हीं को इस पुस्तक में स्थान देने का 
यत्न किया । पुस्तक रूप में संकलित करने का यह मेरा प्रथम 
प्रयास है । 


इस सृूक्त संकलन में मुझे वयोवृद्ध विनय-निष्ठ मुनि श्रो 
चम्पालालजी स्वामी का सुन्दर मार्ग दर्शन मिला, कलाकार 
मुनि श्री दुलीचन्दजी पंचपदरा का--उत्साह वद्धंक सहयोग 
मिला और सुत्ति श्री दुलीचन्दजी सरदारशहर से समय समेय 
पर विचार मिले । जिन सहयोगियों से मुझे इस काये में प्रत्यक्ष 
या अप्रत्यक्ष सहयोग धिला है उन सबका मैं अत्यन्त कृतज्ञ भाव 
से आभारी हूँ | शुभ भवतु कल्याण मस्तु:। 


-- सुनि चन्दत “सरदार 
सं० २०२४ वेषाख सुंदी ३ * ' ३ के 


>> सलेफल सम... 


पछणुक्नत-प्रान्दोलन 
भ्रणुत्नती 
प्रण॒ुत्॒स 
भ्रभ्तरावलोकन 
प्रन्तमु खता 
शप्रधिकार 
अधिकारी 
भ्रध्पययन 
प्रध्पात्म 
प्रध्यापक-विद्यार्थो 
अनिवार्य 


विषयानुक्रम 


( अकारादि क्रम से ) 


पृष्ठ 
१ 
११ 
श्३ 
१२ 
श्ड 
ह्श 
श्र 
१६ 
१६ 
श्७ 


श्८ 


अनुकररा 
अ्नुभृति 


अनुशासन 


भनेकान्त (अपेक्षा) दाद 


अनेतिक 
श्रन्नय-निर्भ य 
श्रभाव-समभाद 
श्रसिभावक 
श्र्थ (घन) 
अशान्ति 


असत्य 


पृष्ठ 
श्प 
१8: 
श्धू 
२१ 
र्२ 
२३ 
र््‌ड 
सर. 
श्र 
२७ 
२६ 


ग्रसम्भव 
आरहिसा 
प्रस्पृदय 

आक्षेप 
आग्रह-अभ्रनागह 


आचरग्ग 
अचार-विचार 


आत्मधर्म-लोकधर्म 
श्रात्म-निरीक्षर्त 
खत्म-विकास 
ग्रात्मा 

थ्रात्मा फी क्षय पराजय 
श्रात्मानन्द 
श्रात्मानुशासन 
आाददों 
खरारोपवाद 
आलोचना 
ग्रावक्यकता 


झ्राशक्ति-अनाशक्ति 


पृष्ठ 
२६ 
३० 
३२६ 
३६ 
३७ 


८ 
३६ 


डर 

डर 
डे 
डश्‌ 
प्‌ 
४७ 


पू० 
५१ 


ख 


इन्द्रिय-निग्रह 
ईदवर-भक्ति 
उठना 

उहण्डता 

उदय 

उदार 

उन्नति (उत्थान) 
उन्माद 

उपकार 

उपवास 
उपासक-उपासना 
उपेक्षा 

एकतनन्‍्त्र 
एकाग्रता 
कठिनाई 

कत्तेंव्य 

कलह 
कलॉ-कलाकार 


कल्यारा 


पृष्ठ 


क्तवि 
कषाय 
फहनी-क रनी 
कानुन 
कायरता 
कार्यकर्ता 
क्रान्ति 
क््रता 
कोष 
खतरनाक 
खानपान 
गंवार 
गणतसन्त्र 
गलती 
गुरा 
घ्राा 
चरिच्र 
चोरो 


जयन्ती 





छेद 
७७ 
७ 
जप 
७६ 
पर 
प्र 


जातिवाद 
जिज्ञाप्ता 
जिम्मेदारी 
जीवन 

जीवन का लक्ष्य 
जसत और जेन धर्म 
जेन-तत्त्व 
जन-दर्शन 
जनागस 

भूठ 

तपस्या 


तृष्णा 
त्याग 


दया-दान 
दरिद्रता 
दर्शन 
दासता 
दिशा 


दीक्षा 





फरे 
परे 
पड 
छोड 
है] 
७ 
ः प्फ 
| सप 
१ 
९१ 
६२ 
९३ 
ह्ड 
&७ 
६६ 
३०० 
श्ग्र 
९०२ 
१०३ 


दुध्ख 
देव-गुरु-धर्स 
दोष 
धर्म 
घर्म-अधर्म 
धर्म श्रौर जाति 
धर्म शोर घन 
घ॒र्म और धर्मसथान 
धर्म और राजनीति 
घ॒र्म और समाज 
धर्म-कर्तेंव्य 
घ॒र्म की अवहेलना 
घर्म-पाप 
घामिक 
घेर्य 
सथवाद 
नये-पुराने 
- म्रक-स्वर्ग 
सागरिक 


'नारो 


१०४ 
१०५ 
१०६ 
१०७ 
११६ 
११७ 
श्श्८ 
११६ 
१२० 
१२२ 
१२२ 
१२३ 
१२५ 
श्२५ 
१२६ 
१२७ 
श्श्द 
श्श्८ 
१२६ 
१३० 


नास्तिकता 
नियन्त्ररय 

निर्मास 

निष्ठा 

नंतिकता 

परतन्त्र 

पर्दा 

परि ग्रह 

परिवर्तन 

परिस्थिति 
पविच्नता-अ्रपविन्रता 
पशुता 

पुरुषार्थ 

पु जीवाद-साम्यवाद 
प्रकृति 

भ्राति घोगिता 
प्रतिश्रोत 

प्रमांद 


प्रशंसा 


थे 


प्र 


पृष्ठ. 
१३१ 
१३१ 
१३३ 
१३३ 


. १३४ 


१३५ 
१३६ 
१३६ 
१३७ 
श्३्८ 
१३६ 
१४० 


ह १४० 


१४१ 


* १४१ 


१४२ 
श्डै२ 
१४३ 
१४३ 


१४४ 


प्रेरणा 

बलात्कार 

ब्रह्मचर्य 

बालक 

बुराई 

भक्त और भक्ति का पात्र 
भय 

भाग्य-निर्माता 

भारतीय श्रध्यत्म-विज्ञान 
भारतीय चिन्तन 

भाषा 

भोग 

भोतिकता 
भोतिक-विज्ञान 

सन-भेद 

मर्यादा 

महत्त्व 

महान्‌ (महापुरुष 

मात 


१५६ 
१६१ 


मानव और मसानव-जीवन 
मानवता 

मूर्ख 

घुल्पांकत 

मंत्री 

मोक्ष 

सोन 

युद्ध 

युवक-वृद्ध 

योगी 

योजना की सफलता 
राग 

राष्ट्र और अरुक्त 
राष्ट्र और धर्म 

राष्ट्र निर्माण 

लक्ष्य 

लज्जा 


घकोक्ति 


विकार 


पृष्ठ 
१६१ 
१६० 
१६७ 
१६७ 


१७१ 
५१७२ 
१७२ 


. १७३ 


१७ 
१७४ 
श्७४ 
श्छ५ 
१७६ 
१७७ 
१छप 
१७६ 
१ ७६ 


१८० 


विकास 
विचार-प्रचार 
विजेता 
विज्ञान 
चिद्या 
विद्यार्थी 
विद्वानु-प्रविद्वान्‌ 
विधि-निषेध 
विनय 
विरोध 
विवेक 
विश्वज्ञान्ति 
विश्वास 
वीरता 
व्यक्ति-समाज 
व्यवहारशुद्धि -श्रा त्मशुद्धि 
ब्र्त 
ब्रत-कानुन 
दराब 


पृष्ठ 
श्घर्‌ 
श्प२ 
श्परे 
श्ण्रे 
श्ष्श 
श्८७ 
१६० 


१६० 


१६१ 


१६२ 
१६४ 
१६५ 
१६५ 
१६६ 
१६७ 
२०० 
२०१ 
२०४ 


२०२५ 


शत्रु 

शासक 

शास्त्र 

शान्ति 

शिक्षा 

शिक्षा के कलंक 
शिक्षा-केन्द्र 
शुद्धि 
शोषण-दान 
शोषण-संग्रह 
श्रद्धा | 
श्रद्धा-श्रा चार 
श्रद्धा-तरक 

श्रम 

श्रावक 
श्रोता-वक्ता 
संकल्प 


संकीरांता 


'संगठन 


२०७ 
२१४ 
२१४ 
२१५ 


२१६ 
२१७ 


२१६ 


२२० 
२२१ 
२२१ 


' २२ 


२२३ 
२२४ 


संगति 
संघर्ष 
संतुष्टि 
संदेह 
सम्प्रदाय 
संघपप्त 
संस्कार 
संस्कृत 
संस्कृति 
सच्चा मंगल 
- सच्चा साम्पवाद 
सत्य 
' सफलता-पग्रसफलता 
समच्चय ह 
समय 
समस्या का हल 
सह अस्तित्त्व 
सहयोग 


सहिष्णुता-पअसहिष्णुता 


२२५ 
२२६ 
श्श्८ 
श्र८ 
२२६ 
२२६ 
२३१ 
र३२ 
२३२ 
र्र० 
र्३े० 
२३६ 
२-७ 
२२६ 
र्४ड० 
र्‌ड१ 
र४२ 
र४ड२ 
२४३ 


साधना 

साधु 
साध्य-साधन 
सामन्तञ्ञाही 
साहित्य-साहित्यकार 
सिद्धान्त 

सुख 
सुख-दुःख 
सुख-शान्ति 
सुधार 
सुविधावाद 
सुसज्जा 
सौन्दर्य 
सौराज्य 
स्मारक 
स्वदोषदर्शो 
स्वभाव दर्शन 
स्वस्थ 


स्वागत 


स्वाधीनता 

स्वार्थ 

हिसा 

हीन-भाव एवं अहम्‌-भाव 
हुदय-परिव्तेन 


हेप-ज्ञेय उपादिय 


२६३ 
रद 
रद० 
२६६ 


२७० 


२७१ 


५ 


क्षप्त॑-क्षमापना 
क्षमता 

क्षमा 

ज्ञीन 
ज्ञान-क्रिया 





हु पृष्ठ 


२७२ 
२७३ 
२७३ 
२७४ 


२७६ 


अपुव्रत आन्दे!डन 


१. अणुकव्त आन्दोलन अहिसा का आन्दोलन है । 


. अशुक्त आन्दोलन विक्ृति में ग्रस्त मानव को प्रक्ृति में 


लाने की एक ठोस परम्परा है । 


. प्राकृतिक चिकित्सा शरीरगत श्रप्राकृत या विकृत पदार्थों 


को निकाल दरीर को जहां सहज स्थिति में लाना चाहती 
है वहां अशुनश्नत आन्दोलन संयम द्वारा आत्मा के सहज 
गुणों का विकास करके अनेतिकता व अनाचरण जेसे 
विक्वत तत्वों के क्रम में व्याप्त आध्यन्तरिक रोग का 
ल्विरण करना चाहता है । 


 अशुश्नत आन्दोलन जीवन में नैतिक और चारित्रिक पक्ष 


पूरा करने का अभियान है । 


ग्रण्‌ न्_्न- तव्र्त 


 असुक्त आन्दोलन संयम प्रसार का आन्दोलन है जो 


जीवन व्यवहार को संयम द्वारा मांजना चाहता है। 


अणुक्त आन्दोलन का लक्ष्य है कि ऐसी परिस्थिति का 
निर्माण हो जिसमें न भोगवृत्ति उच्छ छ्लडल बने और न 


शास्त्रों की बाढ़ आए पर जनता का कदम अहिसा की 


ओर आगे बढ़े । 


७. कुछ बुराइयों को लोग बुराई मानना भ्रूल गए, उन्हें 


१०. 


३१ 


१२.. 


फिर से भान हुआ है भर वे बुराई को बुराई समभने 
लगे हैं । यह आन्दोलन की सफलता है। । 


' अखुब्रत श्रान्दोलत का लक्ष्य है चरित्रवाव्‌ समाज का 
निर्माण हो।... | 
 अणुत्रत आन्दोलन जन-जन के चारित्रिक जागरण का 


उद्देश्य लिए. चलने वाला एक अभियान है । 

अगशुक्रत श्रान्दोलन ब्रतों का आन्दोलन है। श्रहिसा, सत्य 
आदि ब्रतों के आधार पर ऐसे नियमों का गठन इसमें 
किया गया है जो जन-जीवंन में व्याप्त बुराइयों को 
परास्त कर सके । कं, 

अणखुत्रत श्रनदोलन .जन-जन में सत्यनिष्ठा, ईमानदारी 
औरं नेतिकता लाने का आन्दोलन है। । 
अशुब्रत आन्दोलन अ्रहिसा, सत्य पर गठित जीवन शोध- 
खकारी छोटे-छोटे ब्रतों के: सहारे मानव समुदाय को सद्‌ 
उद्बोधन देता चाहता है । उसे स्वार्थ की भूमिका से परे 


' हुटा कर परमार्थ की भ्रूमिका पर लाना चाहता है। 
१३. 


अखुब्रत श्रान्दोलन अहिसा, सत्य आदि के आधार पर सुषृष्त 
मानव को जाग्रत करने का एक डपक्रम है| वह काले 
और गोरों में, . हरिजन और. महाजनों में, किसान व 
जमींदारों में, मजदूर व -पूजीपतियों में समानता सौहार्द 


.. व. निर्दन्द की स्थिति देखना चाहता है यह मनुष्य के 
नैतिक व आध्यात्मिक-उन्नयन से ही सम्भव है । 


। १४, अरुव्रत आन्दोलन हृदय-परिवर्तत का मार्ग है। वह 


व्यष्टि-सुधार से समष्टि-सुधार की दिल्या में आगे बढ़ता है। 


१५. 


१६. 


१७. 


१८. 


१६. 
' निष्ठ बने, उसका जीवन सचाई, सादगी और नैतिकता 


२०. 


२१. 


श्र 


श्रसुत्रत आन्दोलन विचार-निर्माण का आन्दोलन है । 
वह मनुष्य के संस्कारों में से शोषण, संग्रह झ्रादि दोषों 
को समिटाकर एक उदार मानवीय -भावता का संचार 
करता है । 


अगशुक्नत आन्दोलन के अच्तगतः मेत्री दिवस-कार्य क्रम अन्त- 
राष्ट्रीय क्षेत्र में चलने वाले झीतयुद्ध व तनावों की दिशा 
में एक सात्विक चरणविन्यास है । 

अरुतक्रत आन्दोलन किसी व्यक्ति व समाज का नहीं, वह 
सबके लिए--सब का है । 

अशुऩ्त योजना का निर्माण सामाजिक या राजनेतिक 
सुधार के लिए नहीं हुआ है । उसका उद्देश्य एकमात्र 
आत्म-सुधार व्यक्ति-सुधार या जीवन-सुधार है । 
वास्तव में व्यक्ति-व्यक्ति में आत्मश्रद्धा आए, वह चरित्र- 


से ओतप्रोत हो; यही एक उद्देश्य है जिसे लक्ष्य कर 
अशुब्रत योजना का प्रवर्तत हुआ है । ह 
अशुन्तत श्रान्दोलन आज की जनता के जीवन में छाई 
हुई बुराईयों को निकालने का एक सीधा उपक्रम है। 

आज के इस भयग्रस्त व विषम वातावरण को प्रेम, समता 
व शान्तिमूलक बनाने के लिए “अखुद्रत योजना” अत्यंत्त 
उपयुक्त है । 

अणुक्नत का मार्ग प्रतिश्रोत का मार्ग है अर्थात्‌ दुनिया 
से प्रतिकूल चलने का मार्ग है । यद्यपि अनुश्रोत का मार्ग 
सरल है और प्रतिश्रोत का दुःसाध्य, फिर भी अनुश्रोत 


'. में चलने वाला सागर में पत्थर की तरह गायब हो जाता 


डे 


२३. 
श्ंडः 
२५. 
२६. 
२७. 


र्द- 


पर 


. ३०. 


है और प्रतिश्रोत में चलने वाला अपने श्रभीष्ट स्थान 
को प्राप्त कर अपना अस्तित्व कायम कर लेता है । 
अशुवम जहां विध्वंसात्मक है वहां अयुक्नत निर्माणात्मक। 
अशुबम जहां भीतिक पदार्थों का विध्वंस करता है वहां 
अशुबन्नत दुराचार का विध्वंस करता है । 

जो पूर्ण अरहिसक नहीं वन सकते वे अशुन्नत को अ्रवश्य 
ग्रहण करें। कम से कम निरपराघ प्राणी को तो 
सतावें--न मारें । 

अशुद्रत आन्दोलन बिना किसी वर्ण, वर्ग, जाति और 
धर्म-भेद के व्यक्ति सुधार के माध्यम से चलने वाला एक 
नेतिक-निर्माणात्मक अनुष्ठान है | ..' .' | 
जीवन सादा रहे, जीविका के साधन सरल और विकार 
वर्जित रहें, शोषण और अधिका र-हरण की भावना मिटे 
इसलिए अशुत्रत आन्दोलन चल रहा हैं । 

अशुक्रत जीने की कला है । 

ब्रत की छोटी- से छोटी सीमा अशुत्रत और उसका पूरा 
रूप महात्रत है । ह 

धर्म के प्रति मनुष्यों की डगमगाती हुई श्रद्धा को सुदृढ़ 
बनाने के निभित्त मानव जीवन में नैतिक और चारित्रिक 


मूल्यों की. पुनः प्रतिष्ठापना के प्रयोजन को लेते हुए 


अखुत्रत आन्दोलन का कार्यक्रम चल रहा है । 
सब धर्मों के लोग अध्यात्म के. एक सर्वसम्मत मंच पर 
भ्रा सकें, इसके लिए अखुबन्नत आन्दोलन एक ठोस 
योजना है । न ह जप 


. परिचम से निकले अरखुवम की विभीषिका से मानव श्राज 


व्यग्न है।. मुझे विश्वांस है पूर्व से (भांरतं से) निकला 


- 'अणुव्रत उससे :टवंकर लेगा । - संघर्ष के बदले दांति; 
: वेमनंस्यथ के बदले. मेत्री और लड़ाई-भगड़ों के बदले प्रेम 


रे२. 


३३- 


३४. 


३१. 


की प्रतिष्ठापना करेगा । लोग इसे देखें, सोचें, समझे 
ओर अपनाएं 


यदि आत्मबल और साहस के साथ वह अईने को -भलाइयों 
में--सद्वृत्तियों में प्राएपतन से फींके दे तो कोई कारण 
नहीं कि उसका जीवन सात्विक न बन सेके । इसके 
लिए शरुक्षत आन्दोलन एक व्यवस्थित और सक्रिय मार्ग 
प्रस्तुत करता है । 

अणन्नत आन्दोलन एक सीमा करता हैं, व्यंवंस्थां देता 
है । इस संयमात्मक सीमा या व्यवस्था का ही दूसरा 
पर्यायवाची शब्द ब्रत' है। 

अखुबत्रत आन्दोलन जीवन में स्थिरता लानैं, सत्त्व जंगाने 
और तेज उद्दीप्त करने का आन्दोलन है. ।- यंह देशेन 
उंन ऊंचे और गहन .सिद्धान्तों का एक बुद्धिगम्य; व्य- 
वहारगम्य-रूप लोगों को देता है जिससे वे अपने जीवन 
व्यवहार में एक मंजावट पा सकें । 

व्यक्ति मिंट नहीं सकता, .जाति, प्रदेश, राष्ट्र और धर्म 
भी मिट जायं--यह संभव नहीं लगते। । इन सब की. 


:' क्न्रिम भेद रेखाएं--ऊपरी सीमाए. मिट सकती हैं । 


वे मिट जाय --यह अखुन्रत आन्दोलन की. प्रेरक 


. भावना है। 
रे९ 


अखुत्रेंत आन्दोलन जन-जीवन में एक उत्क्रान्तिं- पदों 
करनां चाहता है, उसे ककमोर देना चाहंता है ताकि 


प्‌ 


३७. 


चिरनिद्रा में सुप्त-मानव-समाज जग सके... 

अगुत्रत श्रान्दोलन की अपेक्षाएं हैं। मनुष्य. शस्रनिष्ठ 
न बनकर अहिसानिष्ठ बने । .भौतिक-विकास को मुख्य 
ने मानकर आध्यात्मिक-चेतना को जगाए । भोगी ने 
बनकर व्रती बनें । स्टेण्डड ऑफ लिविंग (50800 
० ॥जग०8 ) को गौणा मानकर स्टेण्डर्ड ऑक. लाइफ 
(572970970 रई ॥2) को. ऊंचा उठाएं ।.एक. शब्द में 


 आन्‍्तरिक - साम्य को शक्तिशाली बनाकर वंषम्य का 


शे८. 


३६. 


श्रन्त करें। 
अखुत्रत युगवर्म इसलिए है कि वह किसी सम्प्रदाय विशेष 
से जुड़ा हुआ नहीं है । ह 
अखुब्रत आन्दोलन का ध्येय यही है कि हृष्टिदोष मिटे 


समभाव का विकास हो, मनुष्य मनुष्य को निकटता से 
देखे । अर्थ, जाति, भाषा, प्रान्त, सम्प्रदाय श्र राष्ट्र 


. का भेद उनके बीच में न आए 


४१. 
४२. 


डरे. 
- के आधार -पर ही जन - जीवन का परिवर्तन करना 


 अणुव्रत का स्वरूप जितना धघामिक है उतना ही व्याव- 


हारिक़ है । 
अशुक्नत श्रानदोलन को यही आदर्श है कि मनुष्य दूसरे 
का ,दमन करने. का. प्रयत्त न करे । अपनी बुराइयों.व 


ग्रपनी अ्रसदवत्तियों को जीतने की - कोशिश . करे । 


' अणुन्रत आन्दोलन केवल जीवन-शुद्धि की सामात्य.भूमिका 


का समन्वय ही नहीं. करता, घामिक मत भेदों के.प्रति 


सहिष्णु भी बनाता है । 


अणखुत्रतः की आधारशिला है संयम | इसलिए हम संयम 


हर 


४६. 


प्‌0. 


चाहते हैं । 


, अणुब्रत आन्दोलन किसी भो धर्म-विशेष का आन्दोलन 


नहीं है, बल्कि सब धर्मों का समन्वित रूप है । 

जो अशुक्नत के सही ढांचे में ढल जाता है वह तो सही 
मानव बन ही जाता है । है 
आन्दोलन का लक्ष्य समाज को शक्तिशाली बनाने की 
अपेक्षा व्यक्ति-व्यक्ति की आत्मा को शक्तिशाली बनाने 
का है । समाज तो फिर अपने आप शक्तिशाली बनेगा। 


. जिस प्रकार समुद्र और आकाश में चत्नने वाले जहाज 


और वायुयान को निर्दिष्ट स्थान पर सकुशल पहुंचने 
के लिए दिशासूचंक-यन्त्र की आवश्यकता रहती है; उसी 
प्रकार इस बेढंगी दुनियां में जहां चारों ओर बेईमा नी और 
बेइन्सानियत के बादल मंडरा रहे हैं, मनुष्य को सुख 
और शान्ति की अपनी इच्छित मंजिल प्राप्त करने के 
लिएं एक नेतिक दिशासूचक-यन्त्र की आवश्यकता है । 
0 इसी प्रकार का एक दिशा -सूचक 
यन्त्र है । 


 अणखुत्रत आन्दोलन यही सिखाता है कि किसी के प्रति 


आक्रान्त मत बनो, न्रिपराध को मत सताओ, शअ्रर्थ- 


लिप्सा और लोभ के भयावह तूफानों में अपना स्तर 
न छोड़ो । 


* अशुत्रत आन्दोलन जन-जन को आत्मोन्मुख बंनाने का 


आन्दोलन है । 
अखुक्त आन्दोलन साम्प्रदायक मतवाद और जातीय॑ कहुत्ता 
से दूर जीवन-जागरण का प्रशस्त पथ है, जिस पर 


ह 


. मानव मात्र को चलने, का निर्वाध अधिकार है । 


भृं१, 


नर 


२३... 


पड. 


५५. 
“ ओर सुनियमित जीवन-चर्या अपनाने का मांगे देता है । 
६. 
“के. जीवन पर निर्भर है ।: वे ही उसके आदर्शों की कसौटी 


जिस प्रकार एंक विशाल भवन के. लिंएं मजबूत नींवें 
की आवंश्यकता होती है, उसी प्रकार अरोतब्रत श्रांन्दोलन 
का श्रासाद सत्य और अहिसा के विशाल और -मजदबूंते 
खम्भों पर ठिक्का हमरा है । 

अशुब्रत आन्दोलन के प्रसार में हो सत्य और अहिसां 
का प्रसार है । 

जा सात्विक, संयत, उज्ज्वंल और सरल जीवेन चाहते 
हैं, श्रणुनत्नत आन्दोलन उनके लिए एक पथ-दर्शन. है । 
अनेतिकता ओर अनाच रण के भंकावात से डगगमगाते 
लोक-जीवन के लिए श्र॑शुब्रत वह अश्रांधार है जो उसे चैति- . 
कृता और सच्चरित्र पर टिकाए रखने की एके अभिनव 
प्रेरणा देता है । 

अखुद्त आन्दोलन मानव को हृढ़ संकल्पी बता उसे संयत्त 


अखुबन्त अपने आप में कुछ नहीं है । वह तो अराँत्नतियों 


८ हैं। उनका जीवन जिंतंनाः ऊंचा होगा, सर्दोचार और 
'.. सांत्विकता की ज्योति:से जिंतना, ज्वलन्त होगा, उतनी 


+छ. 


ही आन्दोलन की विशेषता है । 
धामिकों. के ब्िनाः धर्म कुछ .भी अर्थ नहीं रखता । इस 
प्रकार अणुब्नत अपने आप में कुछ नहीं है-। उसका 


.... बदनाम या: सनाम॑ अखुब्नतियों पर ही भ्रांवारित है, । 
वे तोंब्रत हैं, जी.पुस्तकों में लिखे पड़े हैं अतः अभारव॑- 


इमकेता है, ओज उन्हें जीवन में उतारा जाये-। 


शप. 


५६. 


६०. 


६१. 


६३. 


६४- 


६२. 


९६. 


अगुनब्नत आन्दोलन संयम के माध्यम से लोगों की भौतिक 
वस्तुओं की आसक्ति ओर ममत्व को कम करने को प्रेरणा 
देता है । 


अशुक्नत आन्दोलन संग्रह व शोषण की वृत्तियों को मिटा 
कर आवश्यकताओं के अल्पीकरण पर बल देता है । 
वह व्यक्ति में संकीर्ण वृत्तियों का संकोच कर “मिति 
में सव्व भुयेसु ” वसुधेव कुटठुम्बकस्‌ का आदशे लाना 
चाहता है । 

अरशुन्त आन्दोलन मनुष्य के हृष्टिकोण व मानदण्ड को 
बदलना चाहता है, मनुष्य असंयम से मुड़कर संयम की 
ओर बढ़े । उसका घोष है, संयम: खलु जीवनम' अर्थात्‌ 
संयम ही जीवन है । 

अणुत्रत आदर्श जीवन के अध्यात्मपक्षीय आदर्श है, जिनका 
जीवन के सर्वतोमुखी परिमार्जन में पर्याप्त हाथ है । 


. अणुब्त आन्दोलन छोटे-छोटे ब्रतों के माध्यम से व्यक्ति 


को संयमपूर्ण जीवन की प्रेरणा देकर समाज के. नैतिक 
एवं चारित्रिक स्तर को उदच्नत बनाने का आन्दोलन है। 
अरणुक्षत आन्दोलन मानव जीवन में परिव्याप्त अनेति- 
तिकता के घाव का आन्तरिक पीप सुखाकर उसे निरा- 
मय बनाना चाहता है । 

अगशुत्त आन्दोलन मानव को संयताचरण की ओर ले 
जाने का. क्रमिक विकासमय मार्ग है । | 
अशुत्रत आन्दोलन अपने-झ्रापको जीतने का, अपनी कलु- 
षित वृत्तियों को नियन्त्रित करने का सफल मार्ग देता है। 
अणुब्रत आन्दोलन और कुछ नहीं केवल यही करना 


'& 


६७. 


चाहता है । वह स्वार्थपरता, अर्थ लोलुपता और असंतोष 
वृत्ति का उन्मूलन करना चाहता है ताकि आज. का 
असन्तुलित, अ्रस्त-व्यस्त और डाँवाडोल जीवन -सन्तुलन, 
स्थिरता और स्वनिष्ठा' पा सके । ह 


अगशुब्रत के आदर्श विश्व जनीन आदर्श हैं, शास्वतत और 


- सनातन श्रादश हु | ' 


द्ः 


आदर्श केवल ग्रंथ 'और- वाणी में न रहकर जन-जन के 
व्यवहार में आएं, रोज़मर्राःकी जिन्दगी में उनका संचार . 
हो, ईंस वत्ति को -जगाना अखुब्रत आन्दोलन का अभि- 


प्रेत है । ह 
, अयुत्रत आन्दोलन नागरिक 'जींवन में स्कूति और सूचिता 


भरने का एक सफल साधन है । दूसरे शब्दों में मैं कहूँ 


तो यह व्यक्ति के श्रनेतिक रोगों की अ्रमोष औषधि है-। 
. अणुत्रत आन्दोलन सर्व धर्म समन्वय का प्रतीक है। उन 


. सर्व धर्म सम्मत आदर्शों को प्रस्तुत करता है, जो मानव 


9१.. 


छर. 


१.०. 


मात्र के कल्याण के आदर्श हैं । . लोक'जीवन को जगाने 
का आदर्श है । । । 
अरशुब्रत आन्दीलनं जीवन को परिष्क्ृति देने का वह 


पावन स्त्रोत: है ; जिसमें अवगाहन करने का भ्रधिकार 


. हर मानव को. है. । 
अखुब्रतः श्रान्दोलच' धर्म, के ऊंचे: तत्त्वों वों को जीवन व्यवहार 


! 
]ु 


में इस सफलता और सहज भाव॑ से जोड़ता. है-कि भार 
रूप में न रहे और. व्यक्ति के जीवन का. हर पक्ष सदाचार 


के बुनियादी उसूलों। से 


.छ ३. अखुब्नत आन्दोलन व्यक्ति सुधार को .प्रमुखता देकर चलने 


४. 


वाला चंरित्रशुद्धिमूलक रचनात्मक आन्दोलन है। 


अणुबस पराजय, भय और कायरता का प्रतीक है । 
अखुत्रत विजय, अभय और वीर वृत्ति का संदेश है । 


- अणशुन्नत संग्रह का मर्यादा करण है। 
- भ्र॒णुन्नत आन्दोलन अहिंसा को जीवन में साक्षात्कार कराने 


का एक प्रयोग है।। ै । 


 अशुब्नत किसी धर्म, सम्प्रदाय आदि का नहीं है, वह तो 


मानव धम. है 


. अशाक्रत का लक्ष्य है जीवन को शुद्ध, हल्का, सहिष्ण 


ओर संतुलित बनाना । 


..- झणुब्रती 


न + 
प्‌ है ध ि ३ 


१. अशुत्नती का जीवन एक प्रयोगशाला जेसप होना चाहिए 


. अखुब्रतियों को चाहिये कि वे केवल ब्रतों की शब्दावली 


को ही न्‌ पकड़े बल्कि भावना को संमक कर उनका 
पालन करें । 


- वक्ष के बाह्य श्राकार की शअप्ेक्षा जड़ दृढ़ होती है । जड़ 


की हढ़ता के बिना वायु के वेग से उसको गिरने का 
खतरा रहता है| वसे ही अखुब्रती भी अपने व्रत मूल 
को सुदृढ़ करे, ब्रतों की अन्तरात्मा को समझे और उसका 
निष्ठा से पालन करे । 


११ 


, जीवन-शोधन की इच्छा रखने वाला व्यविंत ही अखुब्रती 


बन सकता है । 


७ नैतिक उत्थान वास्तविक सुख है। अखुब्रती संघ नेतिकता 


की दिशा में विशेष जागरूक है। इसका उद्देश्य है- 
मानव में मानवता भ्राये--वह मानव जो पथ्श्रष्ट होता 


'.. जा रहा है सही पथ पर आये । 


| १०. 


११- 


१९: 


श्र 


, अरणुत्रती जीवन का आदर्श है परिग्रह और आरंम्भ का 


ग्रल्पीकरण । 


| वास्तव में अणुत्रती वे ही बन सकते हैं जिनकी ग्रहिंसा 


आदि सदाचारमूलक वृत्तियों में निष्ठा होती है। 


_ जो व्यक्ति अत्यन्त विरक्ति और अत्यन्त: अविरक्ति के 


बीच की स्थिति में होता है, वह अणुब्रती बनता है। 


. अखुब़ती दूसरे के श्रम और श्रमफल को न छीने तभी वह 


अहिंसा और अशोषण के आदर्श पर चल सकता है । 
एक काम करने में व्रत का भंग तो नहीं होता, पर 
व्यवहार श्रच्छा नहीं लगता तो अखुब्रती को उससे 
बचना चाहिये: । ह 


कार्यशील जीवन में ही जो व्यक्ति अशुब्रती बनेगी, वह 


अपने जोवन में शांति का अनुभव करेगा । , 
अरुत्रती वह है जो समाज में रहते हुए अपनी नैतिकता 
को स्थिर रखने का प्रयास करे. । हुक 


+ः न्त्न्न्न्न््क्ॉड्किशलल्लणःाः है अं 


+ 


अणबम 
नर 


. अणुबम जेसे खूखार अजगर के मुह में हाथ डाल कोई द 


अमृत प्राप्त करना चाहे तो क्या यह सम्भव है ? कदापि 
नहीं । वहां तो एक मात्र गरल ही मिलेगा जिसका फल 
है विनाश और मृत्यु । 


. अणुबम व हाइड्रोजन बम शान्ति चाहने वाले भयंकर 


अजगर के मुह में हाथ डालकर अमृत प्राप्त करना 
चाहते हैं । 


कान कमी नाता 5 


अन्तरावलरेकन 


- जिस तरह साहित्य की साधना, विद्या की आरावना और. 


वाडःमय का अन्‍्वेषण एवं शोधन महत्वपूर्ण कार्य है. 
उससे भी अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण एक बात और 
है, वह है अपने आपका अन्वेषरणा, अन्तरतम को दयोधना । 


, अन्तर अवलोकन जीवन में नव चेतना का संचार करता 


है विगत भूलों को सुधारने का अवसर देता है ॥ 


१३ 


अन्तंर्मु ब्रता 


अन्त खी "सदा सुखी वहिमुखी सदा दुखी । 


“२. राजस्थान' के ऊंट की तरह वहिमुखी सदा ढुंखी ही 


रहते हैं । 


: अन्तमुखी बने बिना शान्ति का प्राप्त होना कभी भी 


सम्भव नहीं-। 


४. अन्तमु खी शान्ति का श्रोत अपने में ही प्राप्त कर लेता 
 . है; और- वहिम खी.अज्ञानी श्रेग के सहश कस्तूरी की 


है] सुगंन्धं. को बांहिर ढूंढंता है पर वहं शान्ति की सौरभ 


श्ड 


बाहिर कहां से उपलब्ध हो । : 


. अन्तमु खता .जो जीवन का पहला और आवश्यक श्रग हैं, 
.. उससे! आप: अपने, को परांगमुख न. रखें । 


» अन्तंसु खींहमेंशा गम्भीर रहता है । 


हु 


० 


अधिकाए 


तुम सुख का उपभोग करो यह तुम्हारे अधिकार की बात 
पर औरों के सुख को लूटना, औरों के सुखों: में बाधक 
बनना तुम्हारी अनधिकार चेष्टा है। . 


. तुम्हारे अधिकार छीने जाने पर जैसे तुम्हें पीड़ा होती 


हैं क्या औरों को भी बसी पीड़ा नहीं होती ? 


. उपदेश देने का अधिकार उन्हें ही है जो पारदर्शी हैं। 


हम भी जो उपदेश देते हैं वह पारदर्शियों द्वारा बताये 
गये तत्त्वों के आधार पर ही दे सकते हैं । ह 


. शिक्षा के क्षेत्र में सबका समान अधिकार है । 





अधिकाही 


. जिस मार्म में जो स्वयं स्पष्ट होता है, वही उसकी प्रेरणा 


देने का अधिकारी 


१५ 


हा 


र्ष्ट 


अध्ययन 


- केवल अक्षर पढ़ना ही नहीं उसका आचरण करना सीखना 


है, वही वास्तविक अध्ययन है । 


. एकाग्रता ग्रभ्भीर अध्ययन के लिए पहली अपेक्षा है । 





अध्यात्म 


. मनुष्य चिन्तनशील व अनुभृति प्रधान प्राणी: है । रोटी 


कपड़ा व पाथिव-भोग सामग्री ही उसकी अंतिम मंजिल 
नहीं है । इन सबके परे उसके मन की भी कोई खुराक 


है और वह है आध्यात्म । 


, आध्यात्मिक &क्षेत्र में महिलायें सदा से पुरुष जांति को 


पथ-प्रदर्शन करती आई हैं । 


+*४20 


गए 


नप्फ 


. आध्यात्मिक जीवन इतना सुन्दर, इतना स्वच्छ और 


इतना निर्मल है कि उसमें विश्व की सभी चीज शुद्ध 
रूप में समा जाती है । 


» सानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए मनुष्य को ज्यादा 


से ज्यादा आध्यात्म मार्ग की ओर अग्रसर होना चाहिये । 


अध्यापक-- विद्यार्थी 


, अध्यापकों के चरित्र का प्रतिबिम्ब विद्याथियों पर कम 


या अधिक किसी न किसी मात्रा में अवश्य पड़ता है। 


पुस्तक शिक्षा की अपेक्षा अध्यापकों के व्यवहार व उनके 


विचारों का अधिक प्रभाव पड़ता है । 


यदि अध्यापकों का जीवन संयम शून्य होगा तो विद्या- 
थियों के चरित्र निर्माण की उनसे क्या आशा की जा 
सकती है ? | 


- बालक पुस्तकों और अंध्यापकों की बाणी से नहीं पढ़ते, 


वे पढ़ते हैं अध्यापकों के आचरण से । अध्यापकों का 
जीवन जैसा होगा वैसी ही छाया उन पर पड़ेगी । 


अध्यापकों के जीवन की सात्विकता विद्याथियों पर जैसा 
प्रभाव डालती है, उनके लम्बे-लम्बे लच्छेदार पांडित्यपूर्ण 


१७ 


९. 
. विद्याथियों के जीवन सुधार के लिए अभिभावकों और 


॥ ०] 


श्प्व 


भाषण वसा असर नहीं करते, यदि उनका जीवन तदनुकूल 


नहीं है । । 


» अध्यापक का जीवन विद्यार्थियों के लिए खुली पुस्तक 


होनी चाहिये तभी आज के विद्यार्थी की दशा सुधर 
सकती है । | 

व्यसनी अध्यापक के छात्र व्यसनी हुए बिना नहीं रहते । 
अध्यापकों का सुधरना अनिवायं है । 


++-+-(कग्किपी2-क-- 


अनगिवारय 


. अनिवार्य तत्त्व उसे ही कहा जा सकता है जिसके विना 
कि जीवन, जीवन ही न रह पाये । 


५2 


+++२#कण0०-+ 


अनुकरहण 


. अंनुकरण . एक खास वस्तु है । हम उसे मिटा दें यह 


सम्भव नंहीं । पर अच्छा हो जिनका अनुकरण किया 
जांता है हँम उन्हें सुधार । 


; दूसरों की अच्छाई को अपनाना ग्रुण है तो उनका अंबा- 


नुकरण करना महान दोष है। . 


3 


न 


+ 2 


अनुमूतति 


. जीवन का रहस्य समभने के लिए तक की अपेक्षा अपनी 


अनुभूति अधिक आवश्यक है । 


- अनुभूति मन की एकाग्रता से मिलती है । 


कक 


अनुग्मासन 


: वास्तविक अनुशासन वह है जो स्वेच्छा से स्वीकृत किया. 


जाता है। 


: अच्छी चीज ग्रहरा करने के लिए अच्छे अनुशासन में 


रहना कोई दोष नहीं है । 


« जिसने अपने पर अनुशासन नहीं कर लिया है, उसे 


१६ 


के 


रद 


१०. 


वास्तव में दूसरों पर अनुशासन करने का अधिकार ही 
क्‍या है ? है 
अपने स्वार्थ से दूसरों पर अनुशासन करने वाला कायर है। 


* अनुशासन मनुष्य के जीवन में बहुत ही कल्याणकारी है। 
. शिविरों के आयोजन में शिविराथियों से भी अधिक 


अनुशासन की आवश्यकता उनके संचालकों में होती है । 


 सूक्ष्म-दष्टि से देखें तो बाहर का अनुशासन विजातीय 


अनुशासन है । 


: अनुशासन के विना कोई भी समाज सचेतन नहीं रह 


सकता, यह एक निविकार तथ्य है । 


- जब तक अपने मन पर अपना नियन्त्रण नहीं तब तक 


किसी को दूसरों पर शासन करने का अ्रधिकार ही 
नहीं है । हे 
जो अपने आप पर शासन कर लेता है उसे दूसरों पर 
अनुशासन करने की आवश्यकता ही नहीं । 


११. संघीय अनुशासन जहां शिथिल पड़ता है वहां पतन की 


१२ 


१३ 


र्‌ ० 


सम्भावनाएं हो जाती 

स्वयं पर स्वयं के अनुशासन के बिना जीवन सुखमय 
नहीं हो सकता है । 

स्‍त्री हो या पुरुष आत्मबल एवं अनुशासित जीवन ही 
अपेक्षित है । ह 





अनेकान्त (भ्पेक्ष) वाद 


. अनेकान्त दृष्टि का अर्थ है--बस्तु. के अनेक धर्मों, स्वभावों, 
अनेक आकारों, प्रत्याकारों- का. सापेक्ष हृष्टि से विवेचन । 
, अनेक धर्मों में से किसी एक सापेक्ष-हृष्टि से किसी एक 
धर्म का वर्णन ही अनेकान्तवाद है। 

. जिस दृष्टिकोण से व्याख्या है उसे उसी रूप में ग्रहण 
करना हो जैन दर्शन का नयवाद या अपेक्षावाद है। 

. सापेक्षवाद यह कहता है कि समन्वय करो, उपेक्षा को 
सोचो, कहने का अर्थ समभो, भझंगड़ो मत । 

. एकान्त-हृष्टि आग्रह की जननी है । आग्रही व्यक्ति तत्त्व. 
को समग्र रूप से समझ नहीं सकता । अनेकान्त दृष्टि 
सब प्रकार के विरोधों की गुत्थियां सुलभाने वाली एक 
' महान्‌ दृष्टि है । 

. स्यादवाद पारस्परिक खींचातान व विग्रह को. मिटा 
कर जीवन की उलझी हुई गरुत्थियों को सुलभाने वाला 
दार्शनिक जगत का एक आलौकिक सिद्धान्त है । 


२१ 


5 


९९६ 
१२. 
१३. 


श्र 


* किसी वस्तु या पदार्थ को विविध पहलुओों से,- दृष्टियों 


से देखा जा सकता है और अपेक्षा भेद से उसका बहुमुखी 
निरूपण हो सकता है । 


. अनेकान्तवादी दृष्टिकोश संघर्ष और पारस्परिक कलह 


को मिटाता है । वह समन्वय तथा एकता का विज्ञापक है। 


 अनेकान्त विरोधी धर्मों का संगम है । 
१०. 


अनेकान्त के व्यवहार से राष्ट्रीय, सामाजिक और पारि- 
वारिक समस्‍यायें सरलता से सुलझ सकती हैं । 


अनेकान्तवाद समन्वय और सामंजस्य का बीज है । 
अनेकान्तवाद उदार चिन्तन को अवकाश देता है.। 
अनेकान्तवाद का श्रर्थ है--अ्रपेक्षा दृष्टि । 





मेतिक 


. भोगवाद और सुविधावाद ही अ्रवैतिकता के पनपने का 


मुख्य आधार है । 


, आक्रमणकारी सदा अनेतिक होता है । 
, यदि अभाव ही अनैतिकता का मूल होता तो धनिक वर्ग 


पापी नहीं होता । 


, अनैतिकता का कारण केवल भूख या दरिद्वता ही नहीं 


है । तृष्णा और 'लोभवृत्ति भी है । 


*. कं 
कनक 


. लोग अनेतिक और भअशुद्ध वृत्तियों की ओर धड़ाधड़ बढ़ते 


जा रहे हैं, इसको मुझे इतनी चिन्ता नहीं जितनी कि 
लोगों की यह निष्ठा और आस्था मिटती जा रही है 
कि नेतिकता, सच्चाई और अ्रहिंसा से व्यवहारिक जीवन 
में काम नहों चल सक्रत्ता--इस बात की है । 


शी छा. बन 


भमय (निर्मैय) 


 अहिसक वृत्ति में आये हुए व्यक्ति से एक को नहीं, सहस्नों 


प्राणियों को अभय मिलता है । 


» अभय का सम्बन्ध सिर्फ अपने से ही नहीं है । जो स्वयं 


अभय बनना चाहता है उसे दूसरों को भी अभय 
करना होगा | 


- जहां असहिष्णुता होती है वहां एक दूसरे को सहन करने 


की क्षमता नहीं होती वहां कोई गश्रभय नहीं हो पाता । 


» अभय के बिना स्वतन्त्र भावना विकसित नहीं होती । 
. जहां अभय है, विश्वास है, वहां शान्ति को कोई खतरा 


नहीं होता । 


 अणुत्रत ही मनुष्य को अभय बनाता हैं। 
७. भय से भय बढ़ता है। अणुबम ने मनुष्य को भयभीत 


बना दिया, तो विपक्ष के लोग हाइड्रोजन बम बनाकर 


र३े 


१३. 


१६४. 


(रे. 


+*3 


र्ड 


अभय बनना चाहते हैं। पर अभय का रास्ता -यह नहीं 
है अणुत्त श्रभय बनने का मार्ग है। .' 


अभय और विश्वास का साधन मंत्री है । 

* जीवन विकास के लिए भ्रभय की बहुत बड़ी उपयोगिता है। 
५१०. 
११. 
१२. 


आपका अभयभाव शत्रु को भी मित्र बनायेगा। 
शान्ति का प्रकाश अभय के सान्निध्य में फंलता है । 
मेरी दृष्टि में शान्ति और सुख का सही और अनुपम 
मार्ग है निर्भयता । ह 
निर्भय बनने का मार्ग यही है कि मनुष्य प्रमाद से 
दूर रहे । कम हे 
निर्भीकता तभी -पंदा होगी जब कि हम अपने को 
शक्तिशाली बनायें । शस्त्रों से शक्तिशाली नहीं बनाया 
जा सकता है । वह तो कमजोरी की निश्ञानी है । 
असली ताकत है भ्रात्मबल । आात्मबल अ्रहिसा और सत्य 
से पैदा होगा । ह ह 

दूसरों को भश्नमुक्त वही बता सकता है जो स्वयं निर्भय 


होता है । 





ब्रभाव--म्मगाव 


. जहां अतिभाव नहीं होता, वहां अ्रभाव भी नहीं होता । 


अभाव विवंशता से होता है । वह दुख देता है | 


“३. आज का संघर्ष श्रभांव और झ्विभाव का संघर्ष है, दोनों 


से बचकर चलने का मार्ग समभाव है । 


शक 


न्च्च्छ 


पं 


अभिभावक 


. जो अभिभावक दुव्य॑त्तनी हैं, वे श्रपती सन्‍्तानों को न 


चाहते हुए भी दुर्व्यसन का पाठ पढ़ा रहे हैं । 


'. जो अपनी सन्‍्तानों को सुधारना चाहे वे पहले अपने 


आपको सुधारें । 


नडककिलओलनाण-ण, 


अर्थ (घन) 


- जब तक श्रर्थ की गुलामी से इन्सान का गला नहीं छूटेगा 


तब तक हजार कोशिशें करने पर भी उसे शान्ति और 
राहत नहीं मिल सकेगी । । 


« आज अर्थ की समस्या है इसका अर्थ यह नहीं कि आज 


अर्थ या अन्न व वस्त्र की कमी है। वह इसलिए है कि 


एक मनुष्य आवश्यकता से अधिक संग्रह किये हुए है 


' - जिसका. दृष्परिणाम दूसरों को भोगना पड़ता है। 


२५ 


२३. आर्थिक समस्या का चिरस्थायी हल अपरिय्रह के सिवाय 


डे, 


दूसरा कोई नहीं 

मानव को अचन्तवृ त्तियाँ आज अपने मार्ग से भटक गई 
। उनको मार्ग पर लाने के लिए यह आवश्यक है कि 

मानव यह समझे कि श्रर्थ ही सब कुछ नहीं है, . सब 

कुछ है परमार्थ । 


अर्थ न तो असाध्य रहता है और न आदर्श | वह तो साधन 


मात्र है। मुख्य साधन भी नहीं, साधन का साधन है। 
मनुष्य जीवन का आदर्श और साध्य त्याग है 


« घन जीवन का साध्य नहीं है, लोक जीवन में वह एक 


साधंन है । उसे ही यदि जीवन का साध्य मान लिया 
जाय तो शोषण, उत्पीड़न, अताचरण और अ्रष्टाचार 


_ से व्यक्ति कैसे बंच सकेंगा -? 
« धनी बनना मुसीबत को मोल लेना है । 
. जहां अर्थार्जत ने लक्ष्य का रूप लिया वहां अनैतिकता, 


अनाचररणा, अप्रामासिकता और बेईमानी जैसे दुगुण 
पनपने लगे तो क्या आइचये ? 

ग्र्थ जीवन की प्रथम आवश्यकता है, यह मानते हुए भी 
यहं कौन नहीं मानेगा कि प्रेम, अभय, मैँत्री, शान्ति 
आर विश्वास जीवन की प्रथम श्रावश्यकताएं नहीं है । 


9०. अर्थ के लिए ब्रत को अपनाने वाला अर्थनिष्ठ हो सकता 


है ब्रतंनिष्ठ या अहिसानिष्ठ नहीं । 


». अर्थ में अनेक समस्याएं पनपती हैं । जिसकी जड़ ही 


समस्या समें से समाधान कहां से आएगा । 


, सामांजिक कार्यों के लिए प्र्थ का व्यय आध्यात्मिक नहीं 


ही सकता, पर वह आवश्यक हो सकता है 


अपनी तरफ से अर्थ की चिन्ता से मुक्त होना ही उसका 


: विसर्जन है । 


. अर्थ लोक़िक जीवन के लिए उपयोग) है, इससे इत्तकार 


, नहीं क्रिया जा सक्रता है। पर वह रोग को दवा है 


७9, 


दनिक भोजन नहीं । 


घन शान्ति का साधन नहीं है। यदि धत्त से शान्ति 


मिलती, तो आज धनवान इतने अशान्‍्त नहीं रहते । 


« जब तक लोग धन कुब्रेरों को 'महाच्‌' मानेंगे तब तक 


जगत की स्थिति निराप्रद नहीं हो सकेगी । 


» जब तक व्यक्ति धन संग्रह की भावना को नहीं छोड़ेगा 


तब तक उसमें धामिकता आना संम्भव नहीं । 


. मनुष्य यह समझे कि वह वस्तु के लिए नहीं अपितु 


वस्तु उसके लिए है । धंन के लिए मनुष्य नहीं, अपितु 
नुष्य के लिए धन है । 


, आज किसी दार्शत्तिक और चरित्रशील व्यक्ति की उतनी 


पूछ नहीं है जितनी धन सम्पन्न की । यह हदृष्टिंकोणश 


-. का -विपर्यास है, गलत मूल्यांकन है ; 
२०. 


अधिक धन संग्रह से कोई बड़ा नहों हो सकता ॥ 


अग्रान्ति 


* अशान्ति का मूल कारण आवश्यकताओं की वृद्धि है । 


अशान्ति की जड़ परिग्रह-विस्तार या अधिकार विस्तार ' 
की भावना है । 


२ 


“ क्रोध, अभिमान, दम्भ और असन्तोष ये चारों हो अंशान्ति रे 
के मूल हैं.। श् के. हज सप आत 
, भौतिक विकास के साथ नेतिक विकास का सन्तुलन 


रहे तो अज्ान्ति उभरती नहीं, किन्तु जब जीवन का 
आध्यात्मिक पक्ष दुर्बंल होता है, तो पग-पग पर अश्ान्ति . 
का अनुभव होने लगता है । ा । 


. समूचे विदव पर अधिकार जमाने वाला एक मुह॒त्त मात्र . 


भी सुख की नींद नहीं सोता, प्राणी मात्र को ग्रात . 


'तुल्य समभते वाला तुण मात्र भो उद्वविग्न नहीं होता । 
: इससे जाना जाता है कि हिंसा में शान्ति नहीं .है । 


. हिंसा, परिग्रह श्रादि जब जनता के जीवन निर्वाह की द 
» परिधि को लांघ कर तृष्णा के क्षेत्र में. श्रा जाते हैं तव 


सामूहिक अशान्ति का जन्म होता है । 


, आवश्यकताओं की पूर्ति करके शान्ति पाने का जो दृष्टि- 

कर हा बनता जा रहा है वह एक अआआामक दृष्टिकोण है 
जो. जगत पर अ्शान्ति: की चिनगारियां उछाल रहा है। 

. भौतिक विकास के साथ नैतिक विकास का सन्तुलन रहे 

, जो अशान्ति नहीं उमरती | पा 

| जब जीवन का आध्यात्मिक पक्ष दुर्बल होता हैं तो पग 


पग॒ पर अज्ञान्ति का अनुभव, होने लगता है। | 


. मनुष्य अभी नहीं जान पाया कि उसकी अशान्ति का 


मूल स्वयं वहीः है । उसकी वृत्तियां और प्रद्ृत्तियां उसका 
जीवन जटिल, बनाती है। ह ह 





7 व 3 । 


असत्य 


, जिस बाणी या भावाभिव्यंजना के पीछे पूरे विचारों 


का जाल बिछा रहता है वह स्थूल असत्य है १ 


. असत्य विश्वासी सदां भटंका सा रहता 
, विचारों को सरलता न होना ही माया है-असत्य है। 





असम्भव, 


. जो नियम के सामने जोबन को नगण्य मानते हैं उनके 
लिए असम्भव क्‍या है+कुछ भो नहीं है । 


ग्। 


+“व्यवहारिक प्रयोग है।... 
.. राजनीति और. समाज व्यवस्था 
पर नहीं टिक सकती .क्रि्तु उन प्र उसका अड्ठशा 


३०. 


अलिसा 


. अहिंसा- का अर्थ किसी को न मारने तक ही सीमित नहीं 


है । अहिंसा कहती है किसी को वलाव अपने नीचे मत . 
रखो, किसी का अधिकार मत कुच्ललो और, किंसी के , 


विचारों को तोड़ फोड़ कर अन्यथा. मत रखो । 
. अहिंसा शब्द जितना सरल है और जनव्यापी है, उसका- 


प्रतिपालन उतना ही कठिन और गहन है । 


. प्राणी मात्र के प्रति आत्मीय भाव अहिंसा का मूर्तरूप है। 
४. किसी को सुखी बनाए यह :हाथ्‌ की बात नहीं है । पर 


अपनी ओर से किसी को दुखी न बनाए यह अहिंसा का 


शुद्ध अहिंसा के आधार 
श रहे, 


अपेक्षित है । ह 


, अहिसा बिना मानव की सम्यता और संस्कृति का विनादय 
| निदिचत 8 न । 


/22: 


. किसी के न चलते से पथ अपथ, किसी कै न लेने से: 
दया अंदया नहीं बनती, वेसे ही किसी के व अपनाने से- 


अहिसां हिसा नहीं बेन सकेती । 


: प्रत्येक राष्ट्र परस्पर में अहिसा का प्रयोग करे तो विद्व: 
शान्ति दूर नहीं है । 


: अहिसा का आनन्द तब मिलता है जब उसका स्वतनत्र 
मूल्य सेमक में आ जाये । 

- सबके प्रति आत्मभाव हो जेन दर्शन की अहिसा है । 

१. अहिसा जीवन दर्शन का तत्त्व है ।.. 

 अहिसा मानव की वृत्ति में है--मरने और जीने में नहीं । 

प्रेम का मार्ग ही विश्युद्ध अहिसा का मार्ग है । 

* हिसा आग बरसाती है और अहिसा शीतल जल, हिसा 


“ बेर विरोध का उन्नयन करती है और अहिसा प्रेम, वात्सल्य 


और सौहाद्र का । 
 अहिसा ज्ञान की सार्थकता है । 
अहिंसा की उपयोगिता केवल मोक्ष आराधना तक ही 


सीमित नहीं है। जीवन के प्रत्येक कदम में उसकी 
उपयोगिता निविवादतया सिद्ध है ! 


' अहिसा जीवन को स्व्राभाविक परिणति 
- अहिसा का उद्देश्य किसी प्राणी की प्राण रक्षा नहीं 


बेल्किं आत्मशुद्धि है-पापाचररणों से कलुषित होती हुई 
आत्मा की रक्षां करना है। | 


* किसी के जिन्दा रहने, किसी को जिन्दा रखने या किसी 
के भरने से अहिंसा का सम्बन्ध नहीं है। अहिंसा कर 


५ 5 


- हुए 
ईंट 


२१. 
श३ 


२३. 


२६. 
' उसकी सुखद गोद में सारा संसार सुख की सांस लें 


अर्थ है हिंसात्मक प्रवृत्तियों: में परिवर्तन । 
. अहिंसा की. परियूर्णा या आंशिक साधना के लिए आत्मो- 


पम्य-बुद्धि श्रथवा आत्मा एकत्व बुद्धि. के सिद्धान्त का 
अनुशीलन्‌, करना ग्रावश्यक है । 5 
अहिंसा किसी व्यक्ति विशेष या किसी समाज विशेष की ' 
न्त होकर वह उसी की. है जो उसे जीवन में ढालते हैं। .. 
अहिंसा वह सारंपूरणो वस्तु है जिससे थके मांदे व. क्षत- .. 
विक्षत जगत को त्राण मिलता है। -« .. .- ह 
अहि उसा केवल. निषेधात्मक तत्त्व नहीं है, जहां दूंसरों की... 
हिंसा करने का .निषेध किया जाता है वहां संयम और .. 


'मैत्री रखना उसके विधानात्मक पहलू के अन्तर्गत आते हैं।. 


, अहं से, ममत्व से, क्रोध से बचें सबके साथ समता और 
' बन्धु भाव का व्यवहार करें यही अहिसा-की सीख. है ।* 
, अहिसा और सर्वोदिय का गहरा सम्बन्ध है । बिना 
 सर्वोदिय के अहिंसा नहीं और बिना अहिंसा के संर्वोदिय 
'नहीं । सर्वोदिय का: मतलब है--सबका उदय । संबका 


उदय अहिंसा से ही! सम्भव है । गा 
अहिसा धर्म का श्रारा है । श्रहिसा में अद्ूट शक्ति है। 


' संकता है| मानव ने अहिंसा को छोड़ हिंसा को जितना 


नं 
क्र । 


ज्यादा पकड़ा उसका जीवन उतने 
'से जजरित बना जब तक वह हि 


, अहिंसा का आदर है--सर्वथा, सर्वंदा 


ही संकटों और कलेशों 
हसावादी प्रवृत्तियों से 
: मनो, वाक्‌, कंमणा 


'क्ृतं, कारित, अनुमोदित किसी भी प्रकार की हिसा 


मुख नहीं मोड़ता: उसे शान्ति मिल नहीं . सकती । 


०९ 
० 


डं 


0 


नकरना । 


. पूर्ण अहिसक वह होता है जो सबके साथ मेत्री भाव 


रखता है। 


 अहिसा में सहज झ्रानन्‍्द है । पर जब तक बाहरी विकार 


बना रहता है तब तक उसकी अनुभूति नहीं हो सकती । 
अहिसा सन, वाणी और देह की निविकार स्थिति है। 


- अहिंसा का मर्म समभने वाला लड़ाकू नहीं सहिष्णु होगा। 
. अहिसा की आत्मा त्याग में है । 
१. अहिसा उपदेश की वस्तु नहीं, वह जीवन का आचार 


धर्म है। 


* अपने दोषों को स्वीकार करना अहिसा की साधना है । 
. निरपराध को न सताना अहिसा है किन्तु उसका सजीव 


रूप वहां है जहां विरोधी को भी नहीं सताया जाए। 


- सबकी पीड़ा को अपनी-सी पीड़ा समझना ही तो अहिसा है । 
- सत्य, अपरिग्रह, स्वावलम्बन इन सभी का बीज अहिसा है । 
- अहिसा का प्रयोग-स्थल व्यक्ति ही है । 

- एक व्यक्ति यदि महा परिग्रही होता है तो परोक्षतः वह 


दूसरों का शोषक हो ही जाता है । अत: अहिसक समाज 
में महा परिग्रही व्यक्ति को स्थान नहीं मिल सकता । 


* अहिसा वीर पुरुषों का घर्मं है । अहिसा वीरत्व की 


जननी है । मन, वाणी और कर्म इन तीनों को विशुद्ध, 
पवित्र रखना, कलुषित व अपविनत्र न होने देना ही 


अहिसा है । 


 अहिसा सातृभाव की दरी है । ऐसी दरी पर बेठे व्यक्ति । 


१० ॥ ०० 
का 


४२. 


४४. 


४५. 
४६. 


४9. 
४८. 


४६. 
. हिंसा अहिंसा की भेद रेखा परिस्थिति पर रहे, तब तो 


भू १. 


अर: 


३४० 


दो दिल नहीं हो सकते । 


अहिंसा में यह विशेषंता है कि. वह सुई का काम करती 
है कैंची का नहीं । 


?. किसी के प्रति झोंत्र भाव न रंखेना, किसी का बुरा न | 


चाहना श्रौर न अपनी ओर से किसी के प्रतिकुल झचरण 
करना अहिसा है । हज 
अहिंसा कायरों का नहीं, वीरों का धर्म है इसेके लिए 
बहुत बड़े आत्मवल और धीरज की अपेक्षा है । 
सहिष्णुता और सहभाव अहिंसा के दो पहलू हैं। 
अहिसा का भ्र्थ है स्वयं निर्भय होना और दूसरों को 
अभयदान देना । 

आत्मा-आत्मा में समानता है--यह भावना बने विना 
जीवन में अहिसा टिक नहीं सकती । 

सबके प्रति समभाव, शत्रु के प्रति भी प्रेम का व्यवहार, 
यही वास्तविक अहिसा है । 

अहिंसा का अर्थ है बाहरी आकर्षण से मुक्ति । 


अहिंसा बच्चों का खिलौना होगा । 

अहिंसके अपने अ्रधिकारों से सन्तुष्ट रहता है.वह दूसरों 
की सत्ता को निगलना नहीं चाहता । . 

अहिंसा हिंसा पर अंकुश है । यदि यह न रहे तो “जो 


मारे वही वीर” इस पशुब्ृत्ति का सूत्रपात होने में कुछ 


देर न लगे | 


: आग इसे मार रहे हैं, यह नहों हा सकता; या ता 


२००३०... 


आप इसे न मारें अन्यथा इससे पहले मुझे मार डालें” 
इस प्रकार किसी को विवश करना सांसारिक उदारता 


भले ही हो पर विशुद्ध अहिसा नहीं कही जा सकती । 


प्र, 
५५. 


५७. 


प्र 


९. 


अहिसा वीरत्व की जननी है । 


अहिसा का साध्यम है हृदय परिवर्तत । जब तक हृदय 
नहीं बदलता, तब तक अहिसा हो नहीं सकती । 


 अहिसा का पालन करना दूसरी भूमिका है । इससे 


पहली भूमिका है हिसा को हिसा और अहिसा को 
अहिसा समभता । 

मत करो' यही अहिसा का सिद्धान्त नहों, अहिसा का 
सिद्धांच्त है -असत कार्य मत करो--राग, हेष, मोह-- 
स्वार्थमय प्रवृत्ति मत करो । “सत्प्रवृत्ति करो” यह अ्रहिसा 
का दूसरा: पहलू उतना ही बलवान है जितना कि पहला। 
किसीः तरह से एक प्राणी के प्राण बचां दिये, इसका 
वह महत्त्व नहीं है जो किसी को अहिसा वृत्ति में लाना है। 
जहां भोग का त्याग हो, उनन्‍्माद का त्याग हो, अ्रावेग 
का त्याग हो, वहां अहिसा होती है । 


- जब तक प्रत्येक आत्मा के साथ एक्रत्व दृष्टि पेंदा नहीं 


होती तब तक अहिसा का पालन नहों होगा । 


. एक से सबका और सबसे एक का हित वहों हो सकता 


है जहां अहिसा है । 


६२. अपरिग्रह भी अहिसा है 


+-++0शन्एए->-+ 


जप 
नौ 


ल्‍्पैज 
क्र] 


, कौन अच्छा है 


अध्पुशय 


, कोई भी मनुष्य कभी अछूत नहीं हो सकता। द बुराइयां 


ही अछुत होती हैं । 


. काम के आधार पर किसी को नीचा और अस्पृश्य मानना _ 


हिंसा है और व्यवहार विरुद्ध भी है । अगर इसी प्रकार 
कोई अस्पृश्य होता तो मातायें तो कभी की अस्पृश्य 


और अपवितन्र हो जाती । 


, किसी को अछूत मानना क्‍या हिंसा नहीं ता 


आक्षेप 


कौन बुरा, यह व्यक्तिगत किसी को नहीं 


कहना चाहिए । यह एक श्रकार का आक्षेप हो जाता हैं । 


नए है 


आप्रहल-भनाशय्रल 


आग्रह तत्त्व को नहों पक्रड़ता, क्योंकि उसमें एक पक्ष 


ही रहता है। प्रत्येक वस्तु के दो पक्ष हैं। जहां एकान्तत: 
वस्तु का प्रतिपादन है वहां तत्त्वत: सत्य नहीं रहता। 


. ही और भी में बड़ा अ्रन्तर है | ही आग्रह का द्योतक 


है और भी अनाग्रह का । ही एक को पकड़ कर बेठ 
जाता है और भी भिन्न-भिन्न दृष्टियों से परखता है। 
इसीका नाम सत्य है। 


- “भी और ही ” में इतना अन्तर है कि जहां “भी है 


वहां ढील होती है और जहां 'हो' है वहां तनाव पंदा 
होता है, झगड़े पंदा होते हैं । 


* किसी एक विचार का आग्रह करने वाले अग्रहद्म के परि- 


णाम की भयंकरता को असमय, समय से पहले ही ला 
देते हैं। 


 अनाग्रही तक॑ और युक्ति वहां ले जायेगा जहां से सत्य 
खोजा जासके । 


३७ 


न्प् 


* आग्रह हुठ धर्मिता है उसमें तत्त्वा-तत्त्व का भान 


नहीं रहता । 


* आग्रहहीनता ही सबसे बड़ा धर्म है। " 
८. जहां एकान्तिकता है, वहां कगड़ा है, ढेष है, कलह है. 


चिनगारियां 


आचयहण 


» भले या बुरे आचरणों का जितना असर होता है उतना 
भली या बुरी शिक्षा का नहीं होता । 
संसार यह देखना नहीं चाहता है कि आप कितना-दान, 


पुण्य और जाप करते हैं तो यह देखना 
चाहता है कि आपके आ्राचर णा कितने पवित्र हैं.” शोषण 
का चक्र चलाते हैं या नहीं, ” आप मानवता का. मुल्य 


कितना आंकते हैं. ? 


. धामिक नियमों का आच रणा करना कठिन है, असंभव नहीं । 
- यद्वि धर्म का. आचरण किया. जाये तो वह विश्व को 
सुखी. करने के लिए. सर्व झक्तिमान है और यदि धर्म 


का आचरण न किया जाय तो वह कुछ भी नहीं . 


डैफ 


कर सकता । 


, उपदेश की अपेक्षा आचरण का प्रभाव अधिक पड़ता है । 


आयचारए--बक्याए 


. आचार आये, पनपे और फले; इससे पूर्व विचार-क्रांति 


आनी चाहिये । 


. आचार सबके लिए एक है । साधु के लिए जो कार्य पाप 


: ग्रहस्थ को वह धर्म कंसे होगा ? 


. दूसरों के आचार-विचार की मर्यादा को समभो, उसके 


प्रति न्‍्याय करो, विशेष न्‍्याय न कर सको तो कम से 


. कम अन्याय तो मत करो । 


न. #4 


- आचार और विचार ये जहां दो है | वहां एक भी है। 
विचार के अनुरूप ही आचार बनता है अथवा विचार 


ही स्वयं आचार का रूप लेता है । 


शुद्ध विचार के बिना शुद्ध आ्राचार नहीं बनता । 
विचार के बिना आचार पूरा फलता नहीं । उसमें वह 


ग्रोंज और वेशिष्ट्य नहीं श्राता जो विचार पूरित आचार 
में आता । 


. आचार के बिना' केवल विचार कोई सार नहीं रखता । 


३६ 


१५०. 


११. 


र२्‌. 


: जो स्वयं श्राचारशील नहीं होते, उतका प्रचार लोगों में 


क्या असर लाता है, कुछ भी नहीं । 


- स्वाध्याय, मनन और चिन्तन के बिना विचार विकास 


नहीं पाते, विचार के बिना भ्राचार स्थिर नहीं बनता । 


आचारवान्‌ यदि थोड़े से भी हों तो अपारशक्ति और ग्राकंपरा 
के केन्द्र हो सकते हैं। श्राचार ऋष्ट बहुत से होकर भी 
निकम्से और निष्प्रयोजन 


आचार और आचार का कार्य श्रद्धा नहीं कर सकती । 
दोनों का समन्वित रूप ही लक्ष की प्राप्ति का सही 
साधन है । 


ग्रात्मधमं-लेोक धर्म 


, आत्मथर्म और लोकधर्म में मुख्य अन्तर है--आ्रात्मवर्म 


आत्मशुद्धि का साधन है । वह अ्रहिसा और सत्य के 
माध्यम से चलता है जबकि लोकथर्म में अनिवारय आव- 
इयकता के प्रसंग में अहिसा और सत्य के विरुद्ध भी 


आचरण होता है। आत्मवर्म शाश्वत है अपरिवर्तेनीय है। 


ग्रात्मर्म और लोकधर्म आगम सिद्ध है | दोनों का अन्तर 
समभने के लिए आत्म निर्मलता, अपरिवर्तंनीयता और 
सर्व साधारणता ये तीन हैेतू हैं । 


. लौकिकधर्म जहां परिवर्ततशील है वहां पारमाथिक धर्म 


 सर्वदा सर्वत्र अपरिवर्ततशील व अटल है । 


ल्‍्दत 


न्त्जा 


- पारमाथिक धर्म कभी और कहीं नहीं बदलता । वह जो 


कल था वही आज है और जो आज है वही आगे रहेगा । 


, पारमाथिक धर्म की गति जब आत्म विकास की ओर 


है तब लौकिक धर्म का ताँता संसार से जुड़ा हुआ है। 


- जो समाज का अभ्युदय करे वह समाज की मर्यादा है 


और जो आत्मा का अभ्युदय करे, वह धर्म हैं। 


. किसी को भोजन, वस्त्र की कमी में सहायता प्रदान करना 


या रोग आदि का उपचार कराना अध्यात्म धर्म नहीं, 
किन्तु पारस्परिक सहयोग है । 


आत्म निरीक्षण 


- आत्म-निरीक्षण में वंचता नहीं चल सकती । 
- आज समाज में आत्म-निरीक्षणा का अभ्यास नहीं है यही 


वीमारी है । यदि इस बीमारी को भिटाना है तो हमें 
समाज में आत्म-निरीक्षण की भावना पंदा करनी होगो । 


 आ्रात्म-निरीक्षण सुधार का आच्तरिक एवं अमोघ उपाय है। 
' दर्पण में चेहरा देखने पर जेसे उसकी सुन्दरता एवं 


असुन्दरता के विषय में स्पष्ट आभास हो जाता है और 


२ 


ष्ट 


उसको संवारने में मनुष्य समर्थ होता है उसी' प्रकार 

आत्म-निरीक्षण अपनी योग्यता अयोग्यता का साफ़ प्रति- 

बिम्ब सामने ला देता है और उसके बाद व्यक्ति को 

अपने में सुधार करने का पर्याप्त श्रवकाश मिल जाता है। 

५. आत्म-चिन्तन अपने द्वारा हुई भूलों को सुभाता है और 
आञ्रागे के लिए जीवन का पथ प्रशस्त करता है । यह 
एक प्रकार से ब्रतों को अच्छे रूप में निभाने के लिए 
प्रहरी का काम करता है । 

६. आत्म-निरीक्षण, आत्म-परीक्षण और आत्म-नियमन, ये 
तीन विचार जहां नहीं आए हैं वहां मनुष्य अपने श्रापका 

में पहचानता । 

७. अपने आपको देखने वाले के लिए उपदेश की आरावश्यकता 
नहीं है । 

८. दूसरों की आलोचना के बजाय यदि ग्रात्म लोचन किया 
जाय तो उससे निर्माण हो सकता है । 





आत्म-विकाय 


१. स्वयं को त्याग की कसौटी पर कसना ही आत्मोन्नति 
का मार्ग है । 
२. आत्मा का विकास तब सम्भव हो सकता है जब उसके 


अस्तित्व को स्वीकार किया जाय और उसे समझने का 
प्रयास किया जाय । 


. आत्मोन्नति और आत्म विकास विचारों की उच्चता एवं 


श्रेष्ठता पर आधारित है । 


आत्म विक्रास की दिशा में प्रव्न॑त्त होने वाले व्यक्ति का 


यह भव और परभव दोनों उज्ज्वल है । 


आत्मा को विशुद्ध बनाने के लिए पहले उसको संयम 


हारा बनाश्रव बनाकर फिर तप द्वारा उसमें संचित कम 
कदम को निकाला जाता है । 


. आत्म विक्रास का पगडंडो पर चलने वालों के लिए 


प्राथंना एक पावन पाथेय है, संबल है। 


- युवकों में भ्रदम्य उत्साह है, साहस है और काम करने 


की क्षमेतां है । पर इन सबकों सार्थकता तभी है जबकि 
वे सही माने में जीवन का उद्देश्य समभंते हुए चरित्र 
विकास और ं पात्मं निर्मारों के पुनीत लक्ष्य में इनका 
प्रयोग करें । 


- आत्म उत्थान होगा सदुज्ञाव और सत्क्रियां के आचरण 


से, जिसे किसी संम्प्रदाय-विंशेंष की चहार दिवारी से 
बांध नहीं सकेते । 


« मस्तिष्क-विकास, चरित्र विक्रास के माध्यम से ही आत्म 


विकास. तक पहुंच जाता है । 


 आत्म-विकांस का चरम रूप ही वास्तविक मंगल है। 


४३ 


आत्मा 


आत्मा के संरक्षण के लिए या मानवीय शक्ति के विकास 
के लिए सदाचार और नेतिकता का आश्रय आवश्यक है। 
, विशुद्धात्मा में ही विशुद्ध धर्म का निवास हो सकता है । 
| आत्मा अनन्त शक्तियों का तैज उुत्त है पर जब तक 
वह आवररा/मय है, वे शक्तियां अभिव्यक्त नहीं हो पाती। 
उनकी अभिव्यक्ति के लिए आत्मा पर छागे हुए कर्मा- 
बर्ण तोडक मूलक चिर साथना की अपेक्षा है । ज्यों ही 
आवरण दूर हुए, आत्मा की असीम शक्ति व्यक्त हो जाती 
है, जीवन ज्योतिर्मय बन जाता है । ह 

| अध्यात्म तत्त्व का गवेषण, परिज्ञान, अ्नुशीलत जीवन 
का अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू हैं ! जिसने श्रात्मा को नहीं 
जाना उसने कुछ भी नहीं जाना । जिसने एक आत्मा 
को जाना, उसने सवको जान लिया । 

आत्मा अमर है । उसकी स्थिति में कोई भी इसरो 


हस्तक्षेप नहीं कर सकता | व्यक्ति की वह स्वतन्त् 


दि 


सम्पत्ति है जिसको अगर वह चाहे तो सुरक्षित रख 
सकता है, उसका विनाश भी उसीके वश में है । 


- भव तत्त्व, द्रव्य को समझ कर सम्यकृत्व प्राप्त कर 


उन्नति करती हुई आत्मा परमात्मा बन जाती है। 


. आत्मा का पूर्णा विकसित रूप ही परमात्मा का स्वृदूप है। 
जो पूर्वापरिभूत ज्ञान है वही आत्मा 


६. आत्मा और शरीर एक नहीं दो हैं । आत्मा की सेवा 


१०. 


अपनी सेवा है । शरीर की सेवा अपनी सेवा नहीं, 
जड़ की सेवा है । जड़ की सेवा में इष्ट की प्राप्ति 
सम्भव नहीं । 

आत्मा का सबसे महत्वपूर्ण गुण और लक्षण ज्ञान है 
जो आत्मा के सिवा अन्यत्र कहीं नहीं देखा जा सकता । 





आत्मा की त्रय- पशालय 


- सुख का वियोग और दुख का संयोग मत करो - यह 


भावना आत्म विजय का प्रतीक है । 


- सुख मत लूटो और दुख मत दो--इस उदात भावना में 


आत्म-विजय का स्वर जो है, वह है ही । उसके अतिरिक्त 
जगत की नेसग्गिक स्वतन्त्रता का भी महान निर्देश है। 


सही अर्थ में बाहरी वस्तुओं पर विजय की भावना ही 


ड्श 


ग्रोत्मा' की पराजय है। 


. आपद्ध्म कां सहारा लेकर यह कहंता. कि क्या करें ! 


स्थितियां ही ऐसी बंन गई औरे कोई चारों ही नहीं . 
था | यों अपने साधना मार्ग से हटना एक बंहुत बड़ो 
पराजय है। 


, परिस्थितियों के अआंगे घुटने टेकनां मानतंवें की चार 


पराजय है । 


आत्मानन्द 


, शत्र-मित्र के प्रति और दुःख सुख में व्यक्ति सम रहे तो 


बहुत कुछ आत्मानन्द मिल सकता है । 


. सुखानुभूति को आननन्‍्दानुभूति से जीतना चाहिये । 


व्यक्ति जब गरृहस्थ जीवन के भमेले से ऊब कर धामिक 
उपासना व क्रिया-कर्मों में लगता है ता उसे आत्मानन्द 


की अनुपम अनुभूति होती है । 
, पदार्थ जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक है किल्तु जब वे 


मात्रा से अधिक हो जाते हैं तब उनसे जीवन का सात्विक 
आनन्द दव जाता है । 


आत्मानुग्मासन 


वह विचलित होना नहीं जानता, जिसने कि अपनी आत्मा 
पर अनुशासन स्थापित कर लिया 


 आत्मानुशासन के बिना कोई भी कार्य सफल नहीं 
हो सकता । 

मेरा यह निश्चित अ्भिमत है कि चाहे कोई व्यक्ति हो या 
समाज, कोई योजना हो या कार्यक्रम, सारे ही तब तक 
सफल नहीं हो सकते जब तक कि आत्मदमन औौर आंत्मा- 
नुशासन को बल व प्रश्नय नहीं दिया जाता । 

« आत्मसंयम का अ्रर्थ है-अपने द्वारा अपने लिए अपना 
नियन्त्रण ।' 

* आत्मसंयम सें जो आनन्द मिलता है वह .नियन्त्रश 
में नहीं । 

- जहां आत्म नियन्त्रण और आत्म 'संयमन नहीं मैं वहां 
मृत्यु देखता हूँ । 

७. संयत्त और आत्म-नियंता जिस आत्म तुष्टि का अनुभव 
करता है, वह असंयत के लिए कहां सुलभ हो सकती है। 


४७ 


आदई 


* वह आदर्श आदर्श नहीं जहां तक आम जनता न पहुंच 


सके । आदर्श एक लक्ष्य, एक केन्द्र बिन्दु हुआ करता 
है जहां तक पहुंचने की सबकी कोशिश होनी चाहिए । 


* आदर्श वही होता है जिसका आ्रचरण किया जा सके । 
* जो वस्तु किसी के भी व्यवहार में. न आये, वह आदेश 


भी नहीं हो सकती । 


. जीवन का आदर्श वाह्य प्रदर्शन एवं फंशन-परस्ती नहीं 


के 


है । जीवन का वास्तविक आदर्श तो सात्विक, उज्ज्वल 
और परिमार्जित जीवनचर्या तथा त्याग एवं साधना है । 


विचार भेद होना एक वात है लेकिन उसको लेकर मत 
भेद पेदा करता और विरोधी वातावरण को उभाड़ना 


. मानवीय आदर्शों के सर्वथा प्रतिकूल है । 

- जैन धर्म के आदर्श केवल आदर्श नहीं हैं वे जीवन व्यवहार 
“को छूने वाले हैं। उनकी साथना दो तरह से हैझाएक 
 महाव्रत और दूसरा अरखुब्रत । 


आंधह्ोप वाद 


. १. आरोप वाद' को मिटाने से वास्तविक शान्ति और सुख 
सम्भव है | आरोप वाद का भअर्थ: है-वाह्य पदार्थों में 
सुख दु:ख की कल्पना करना या यों कहिये कि काल्पनिक 

,. सुख दुःख ही आरोप वाद है। 

२. मनुष्य. का सबसे बड़ा दोष दूसरों पर अपराध्र मढ़ना 
है । वह अपना दोष स्वयं नहीं टटोलता । यह आरोप 
वाद ही विश्व शान्ति का सबसे बड़ा शत्रु है। 


आलोचना 


१. अपनी बुराईयों को निकालने का प्रयास करें तो आलोचना 
की सांर्थकता हो सकती है । 


डर 


३६ 


आवश्यकता 


» जीवन में जितने अन्न, जल व वस्त्र की आवश्यकता है- 


चरित्र, सदाचार और सदवृत्तियों की “उससे भी अधिक: 


- आवश्यकता है । 
(२ 


आ्रावश्यकता के उपरांत यदि अर्थ संचय न किया. जाये 
तो दूसरों की आवश्यकताएं अपने आप पूरी हो सकती हैं। 
आवश्यकताओं को- रोक कर हम नाना दुःखों से त्रांण - 
पा सकते हैं । ४ 


४. ज्यों-ज्यों साधना का और अधिक विस्तार होगा त्यों-त्यों 


आ्रावश्यकताएं भी और आगे बढ़ती चली जायेगी फिर 
मानव इतना दिग्मूढ़ वर्नें जायेगा कि वह सही मार्ग पर 
पहुंच न सकेगा । 


. आवश्यकता की पूर्ति क्रना-कैवरल रोग की बाह्य चिकित्सा 


मात्र है--सुख नहीं । 


. जीवन की आवश्यकताएं संयम की उतनी वाधक नहीं दि 


जिलेनी” भोग और ऐश्क्यं की श्राकांक्षा में है | ' 


8. 


ना 


जीवन की अनिवार्य आवश्यकताञओ्रों की पूर्ति हो सकता 
है किन्तु लालसाओं की पूर्ति सम्भव नहीं । 


विलन--*क्‍ पीवी. + 5 


आग्रक्ति-भनाग्रक्ति 


: दूसरों में प्रतिष्ठा बढाने या बनाये रखने के लिए नहीं, 


सच्चाई पर चलने के.लिए सत्य, अहिसा और अनाशक्ति 
भाव रखना आवश्यक है । 


. भौतिक उन्नति के भवन का निर्माण आश्षक्ति की ईटों 


से होता है । जहां श्राशक्ति है, राग-ह्ेष का प्राबल्य है 


' और है तव मम का सीमातीत भेद, वहां उद्देंग है, संघर्ष 


है, दमन है, युद्ध है और अशाचन्ति है। 





इन्द्रिय-नियहल् 


आंखों पर,पट्टी बांवने मात्र से ही चक्षु इन्द्रिय का निग्नह 


नहीं हो जाता । यदि इसी प्रकार निग्नह हो पाता तो 
सब पर्दा नशीन महिलाएं इन्द्रिय निग्रह कारिणी हो 
जाती । पर परे में भी भरसक देखने का प्रयत्न कंसे कहा 
जा सकता है ? 


२१ 


ईंडव्ट भक्ति 


१. जिस प्रकार मेढ़ी बलों को अपने चारों ओर घुमाने में 


श्र 


सहायक है पर चलाती नहीं उसी प्रकार हमारां चंचल : 
मन वहां स्थिरता प्राप्त कर सके यही हमारे ईह्वर स्मरण 


'का रहस्य है । 
: ईश्वर के स्वरूप चिन्तन के सहांरे हम भी उन गुणों को . 


प्राप्त कर सकें यही उसकी. उपासना का लक्ष्य होता है। 


- ईश्वर से जो प्रार्थना की जाती है उसका उद्देश्य भी 


यही होता है कि उनसे प्रेरणा प्राप्त की जा सके । ईश 
स्तुति का यदिं-यह-सही अर्थ समझ लिया गया भर उसके 
ग्रनुसार आचररणा किया गया तो निश्चित ही व्यक्ति 
अपने कतृ त्व को दुनियां के समक्ष प्रस्तुत कर सकेगा । 


५ 


र्‌. 
. ... उठना तो अपने हाथों में. है । ह 
. ईश्वर से कभी: ऊपर उठने की भीख नहीं मांगनी चाहिए 


उठनाा 


जो खुद नहीं उठे वे. दनियां को क्‍या उठायेंगे. ? . 
साधु-संत तो सिफ्फं मार्ग दे सकते हैं, प्रेरणा दे सकते 


परमात्मा तो सिर्फ आधार है । 


- आप सभी खुद अपने आख़रणों से ऊंचा उठने की कोशिश 


करो, श्रमनिष्ठा से कार्य करो । 


ााााक आाााओं। 


उद्धण्डता 


* उदृण्डता से व्यक्ति बहुत नीचे स्तर पर चला जाता है। 


२. वातावरण स्व नियमन से प्रभावित हो जाये तो बढ़ती 


हुई उच्छु खलता की रीढ़ .टूटः सकती है । 


५३, 


उदय 


१. वह उदय उदय नहीं, जिसमें अपना उदय और दूसरों 
का तिरोभाव हो । 5 
२. वह उदय भी उदय नहीं, जिसमें अपना उदय भूलकर 
दूसरों के ही उदय की कल्पना हो । ह 





उदाए 


१. उदार बनेंगे पायेंगे, संकुचित बनेंगे खोयेंगे । 


घर 





श्ड 


उन्नति (त्यान) 


' -कैवल पद प्राप्ति ही उत्थान नहीं है । ै 
: उत्थान अमीरी और गरीबी में नहीं, वेह तो जीवन के 


व्यवहार से सम्बन्ध रखता । 


: वस्तुत: जीवन की उन्नति व्यक्ति के आचार-विचार पर . 


निर्भर है । 


- हम स्वयं नियन्त्रित होकर चलें, तभी हम अपना उद्धार 


कर सकते हैं । 


जो उत्कर्ष-शील होता है, उसे लज्जा भी उतनी ही 


अधिक महसूस होती । 


६. धर्य उन्नति का प्रतीक है । | 


4 


* उन्नति तो अन्त:करण में सोई पड़ी है, उसे जगाने की ' 


आवश्यकता है । 


 मेरों यंह प्रबल विश्वास है कि आध्यात्मिक,.उन्नति ही 


भारत की और विश्व की उन्नति है। 
जीवन शोधन के अतिरिंक्ते यदि धर्म के नाम पर फूट, 


श्र, 


१०. 


११. 


९१ 


हद 


कलह, कदाग्रह ओर ऋर व्यवहारों को बढ़ावा दिया जाता 
है तो वहां मनुष्यों का पतन ही है, उत्थान नहीं । 

जीवन का स्तर भौतिक अभिसिद्धियरों से ऊंचा नहीं बनता, 
वेभव और सम्पदा से नहों बढ़ता, वह तो सत्य, प्रामा- 
णिकता, नेतिकता, न्याय और सदाचार से ऊंचा उठता है। 
जिनके विचार जितने अ्रधिक शुभ्र हैं वे उतने ही भ्रधिक 
समुन्नत होते हैं |... ' । ह 
जो कार्य एक व्यक्ति के लिये आत्म उत्थान का कारण 
होता है वही दूसरे के लिये पाप बन्धन का कारण भी 
बन सकता है। इसी तरह वहं एक॑.के वन्धन का तो 


- इूसरे के आत्मोत्थान का भी कारण है । 


>> 9॥2/2०-० 


उन्माद 


) 


, उनन्‍्माद अ्रसंयम की उपज है। | 

. एक ओर कम दाम देकर अधिक-काम कराने की भावना 
है, दूसरी ओर झ्धिक दाम लेकर काम से जी चुराने का 
'भावँना है-यहं वैयक्तिके उनन्‍्मांद का दोष है.। अंतिविलास, 


अतिभोग आदि चरित्र को लांछितं करने वॉली सारा 
बूत्तियां उसीसे पंदा होती हैं । 


>*ब) 


उपकाए 


- किसी के दुगु रा को छुड़ा देना, हृदय बदल कर उसे 


बुराइयों से बचा देता ही सच्चा उपकार है । 


. संसार की चिन्ता छोड़ कर अपने जीवन की चिन्ता करें 


यह स्वार्थ नहीं; सही परमार्थ है । 





उपवादत 


आत्म शुद्धि के लिए और वातावरण की शुद्धि के लिए 


उपवास आवश्यक है। 


- उपवास शारीरिक सुख नहीं देता, किन्तु उपवास में जो 


आनन्द आता है, वह आनन्द खाने में नहीं आता । 


रे >ॉ 9८539 5-७» -- 


प्र 


उपासक--उपातस्तया 


* उपासना के साथ आचार शुद्धि और सम्यक बोध भी 


नितानत आवश्यक है । 


- आचार और विचार शून्य उपासना व्यक्ति को जड़ वना 


डालती है । 


* यदि जीवन भर माला रटते रहने पर भी आपके आचरण 


और वृत्तियों में अन्तर नहीं आया तो ऐसी उपासना से . 
क्या होने वाला है ? 

उपासना स्वयं में जड़ है वह दूसरों में चेततन्यता का 
प्रसार कैसे करेर्ग 


. मन्दिर में जाने, सन्‍्तों के दर्शन कर लेने. और गंगा में 


गोते लंगाने मात्र से ही धर्म नहीं हझा करता । ये सव 
तो सिर्फ उपासना के वाह्मय और थोथे रूप हो सकते हैं ! 


उपासना आत्मा पर लगे आवरण का अपवतन क र उस्तक_ 


परिष्करण का साधन है । 


. मौलिक अभिसिद्धि के साधन को भूल कर देवी देवताग्रों 


ह १०. 


११. 


१२. 


१३. 


१४. 


१५. 


की पूजा करना भूल के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? 


. उपासना की ऐसी विधि होनी चाहिए जिसमें मत, कर्म 
और वाणी का यथासम्भव एक्य हो । साथ ही उपास्य 


के सही निर्शंय होना चाहिये । 


. उपास्य वह हो जो सभी के प्रति समभाव रखता हो 


और पापियों को पावन करने वाला हो । 


उपासना स्वयं को कृृतार्थ करने के लिए होनी चाहिये । 
उसका उद्देश्य यह न हो कि उससे दूसरे क्रृतार्थ हो । 


भगवान का चरणामृत लेने वाले आज बहुत मिल सकते 
हैं; उसकी सवारी पर फूल चढ़ाने वालों की भी कमी 
नहीं है, पर जरा सोचिये, भगवान के पर्थ पर चलने 
वाले कितने हैं ? हम अपने आराध्य द्वारा बताग्रे गये 
पथ पर चलने का प्रयास करें; उनकी सही आराधना 
इसीमें है । 


'उपासक के लिए उपासना के प्रति अच्तरं प्रढ्ंत्ति का 


होना आवश्यक है । यह आवश्यक नहीं कि उपासक 


वीतरागी हो । वह पापी से पापी हो सर्कता है पर 


वर्तमान. में उसकी अन्तर प्रवृत्ति उंपासंना की ओर होनी 


आवश्यक है । 


परमात्मा की उपासना, पूजा, स्मरण करना चाहिये, 
पर उससे सोदा नहीं । 

भौतिक सिद्धि और लालसा पूर्ति के लिए परमात्मा को 
उपासना करना अज्ञान है । 

यदि कोई व्यक्ति कितने भो मन्दिरों में जाता हो और 
पूजा करंता है पर दुंव्य॑सनों में लिप्ठ रहता हो तो पूजा 


न& 


१६. 


१७. 


श्ष, 


१६. 
२ 0. 


हे 


अर्चना सभी व्यथे है। संबसे बड़ी पूजा भगवान के बताए 
मार्ग पर चलना है । 

आत्मा चेतन है, उसे चेतन की उपासना में लगाइये, यही 
वुद्धिमानी है तथा इसीमें मानव जीवन की सफलता है। 
उपासना धर्म का अंग हो सकता है, किन्तु उपासता ही . 
धर्म है, यह मानना भूल है । उपासना के साथ-साथ - 
वासना का विकास होना चाहिये । उपासना के साथ- 
साथ जो वासना का विनाश हो रहा है वह एक द्वन्द 
है । दन्द से धर्म की उपासना नहीं हो सकती | 
चारित्रवान के लिए उपासना केन्द्र और धर्म दो नहीं . 
हो सकते । 

धर्म सब जगह सदा एवं सब कार्यों में उपासनीय है । 
केवल शाब्दिक स्तवना से क्या बनेगा, यदि जीवन को 
ऊंचे आदर्शों में ढालने का प्रयास न किया जाये । 
साधक प्रत्यक्ष में तो वीतराग भगवान की उपासना करता 
है, परन्तु प्रकारान्तर से वह अपनी आत्मा की ही 
उपासना है । 


. उपासना के प्रतिकुल आचररा से व्यक्ति अपनी उपासना 


का महत्त्व कम कर देता है । 





उपेक्षा 


, दैनिक जीवन में सदाचार को भूला देने से वढ़कर वतमान 


की उपेक्षा और क्‍या हो सकती है ? 


नी 


अत 


एकतन्ब्र 


« एकतन्‍्त्रीय शासन में निस्‍स्वार्थ नेता का होना सबसे अधिक 


आवश्यक है 


- एकतन्‍्त्रीय प्रणालो रहेगी, तब ही संघ सुचारू रूप से 


चल सकेगा । 


एकाथ्रता 


स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए चित्त की एकाग्रता, स्थिरता 


श्र सतकंता की आवश्यकता है । 


* एकाग्रता गम्भीर अध्ययन के लिए पहली अपेक्षा है. । 





द१ 


धर 


कठिनाई 


. कांटों पर चलने वाला ही फूल का सौकुमार्य और सुरक्ि 


पा सकती है । 


, धैर्यंधारी मनुष्य सभी कठिनाइयों से साधारणतः मुक्त 


हो जाता है और घैर्यहीन व्यक्ति अपने आपको खो. 
देता है । 


, कठिनाइयों पर विजय पाना है तो जीवन को वदलना होगा । 
| कठिनाइयों से घबराओ्रोगे- तो वे बढ़ेगी | उत्तका सामना 


करो वे मिट जायेंगी । 


 अभीष्ट मार्ग कठिन जरूर है, काँटों का है, फिर भी 


वह अभीष्ट है अते:ः उसे पर निर्वाध चलते जाता हीं 
अपने आपको सफलता के निकट पाना है । 


| बिना कठिनाई तो रोटी भी नहीं खाई जाती तो साध्य 


को बिना किसी कष्ट के कैसे पाया जा सकता हैँ? 


| किसी भी कार्य के प्रारम्भ में ही बड़ी बड़ी विपतियां, 


बाघाएं और कठिनाइयां खड़ी होती हैं । 


20-+०---३--पुजकी-नलनभ-«म 


ही 
कचग्प 


- हर व्यक्ति को आत्म निष्ठा के साथ यह ठान लेना होगा 
कि. उसका सबसे पहला और जरूरी कार्य है -- अपने 
जीवन को बुराइयों के गड्ढे से बाहर निकालकर भलाइयों, 
: संद्वृत्तियों, एवं सदगुणों में ढालना । 





कलह 


* केलह दरिद्र का लक्षण है जिस घर, परिवार, समाज, 
नग़र और राष्ट्र में. कलह है. वह .पनप.नहीं. सकता । 


* विचार भेदों से तो कलह को अवकाश नहीं मिलता 


.... पर वह सनोभेद और छींटाकशी से. उमड़ जाता है.। 


जो व्यक्ति इन्द्रिय, मन और: वाणी: पर नियन्त्रण नहीं 
रख पाते वे ही कलह आदि को जन्म देते 


हरे 


कलछ7-कलाक7? 


, कला आदि साधन केवल. कला के प्रदर्शन करे लिए हो 


इसमें सार नहीं । उनसे त्याग, वैराग्य व अध्यात्म की 
प्रेरणा ली जाय, इसी में सार है। 


, जीना एक कला है । कला के बिना जीवन जीवन नहीं, - 


मरणा है । 


, जीने की तरह मरना भी एक कला है । अस्वस्थता 


और अशकक्‍यता में फंसा एक मनुष्य जहां रोता है, विलखता 
है, जीवन के लिए तरसता है, मनौतियां मानता है, वहीं 
ग्रात्मा की अ्रमरता में विश्वास रखने वाला धर्मनिप्ठ 
मृत्यु के सामने धर्य और हिम्मत के साथ सीना ताबकर 


'  खड़ हो जाता है । 


द्ड 


, कला का सत्य स्वरूप है--जीवन के श्रत्तरतम की सज्जा, 


परिष्कार या संस्कार । 


| जीवन में आध्यात्मिक कला का विकास करने के मार्ग 


हैं -- श्रवण, दर्शन, अ्रहएा और श्राचरण में कला 


का समावेश । 


. काव्य-कला की सृष्टि आत्म प्रेरणा का प्रतिफल है । 
: कला गृढ़ की अभिव्यक्ति है। गूढ़ को अ्भिव्यक्त करने 
वाला कलाकार है । 

 नोरस को सरस, दुःख को सुख ओर कुछ भो नहों को सब 
कुछ बनाने वाला कलाकार है । 


आविफिल+ 


कल्याण 


» जीवन प्रामारिक, हल्का व संयमित बनाना ही कल्याण 
का सोपान है । 


. ज्ञान, दशेत और चारित्र इन तीनों रत्नों की आराधना 
से कल्याण की अभिसिद्धि होतो है । 


« कल्याण तो तब होने वाला है, जब धर्म गुरूश्रों के द्वारा 
बताए गए मार्ग का अनुसरण किया जाएगा । उन्होंने 
जो पथ अपनाया है, उसे अपना पथ बनाया जाएगा । 
. जैसे खाना खा लेने के बाद उसे पचाने, हजम करने की 
नितान्त आवश्यकता होती है क्योंकि उसको पचाने से 
ही मनुष्य बलवान बनता है केवल खाने मात्र से नहीं । 
उसी प्रकार विमल विचार सुनने मात्र से हो कल्याण 
नहीं होता, उसको अपने जीवन में रमाने, आत्मसात करने 
से जीवन विकास होता है । 


६५ 


. . जबकि .वह विषमता-मूलक वातावरण को बदल कर 


न 


हर ।| 
ल्‍५ी) 


* चाहे कोई व्यक्ति मन्दिर में जाए, पूजा करे, सं।मायिक 
करे, साधुओं के दशन करे, लेंकिन जंब तके धर्म का संही 
रूप जीवन में नहीं आएगा, कल्याण होना दुंध्कर है। 

: जिस प्रकार प्रशंसा करने वाले के लिए प्रशंसा करना : 
कल्याण का कारण है उसी प्रकार आलोचना करना 
भी जिसकी आलोचना की जाती है उसके लिए कल्याण 
का मार्ग ही है । | | । 
. मौलिक तत्त्व की आराधना में ही सच्चा श्रेयस्‌ है, वाह्म 
उपकरणों में नहीं । 

८. जीवन में संयम और नियमितता के बिना कल्याण नहीं है। 
. समाज व्यक्तियों का समूह है । ञ्रतः समाज कल्याण के 
लिए व्यक्ति कल्याण अपेक्षित है । व्यक्ति कल्याण के 
: बिनो समाज कल्याण असम्भव है । 


०७. 


४2 


: कवि. अभ्यास से नहीं बनता, प्रकृति ही उसकी निर्मात्री 
होती है । सही अर्थ में कवि बनने -की सार्थकता तब है, 
प्रा 


नेतिकता-मुलक- बना. दे । . ः 
. कवि समाज और राष्ट्र के निर्माता होते हैं । कवि की 


न 


शक । 


न्प्ए 


रचना केवल मनोविनोद व हास्य के लिए ही नहीं होनी 
चाहिये । वह जन-जीवन विकास की प्रेरणा के लिए 
हो, जो जन म[नस को छूते हुए विकास की एक सजग 
प्रेरणा दे सके । 


कषफाय 


* जब: तक कपषायों- का अन्त' नहीं, तब तक ' जन्म मरण 


का अन्त नहीं होता । 


- लोग चाण्डाल से परहेज करते हैं । किन्तु उनके घर में 


ही एक नहीं दो-नहीं, बल्कि चार-चार-चाण्डाल (क्रोध, 
अभिमान, दम्भचर्या और लालच) विराजमान हैं । 


. वास्तविक. चाण्डाल तो-कषाय है--ग्रुस्सा है.। गुस्से को 


छूने मात्र से हानि और विनाश का कोई पार नहीं रहता । 
घणा- गुस्से से- करिये । 


प्रभाव मात्र हैं । 


- जितने ही विग्रह जगत में हैंवेःसब कषाय चतुष्क के ही 


द्छ 


ियई 


कहना-करनी 


» कहनी और करनी को समान बनाओ । आ्राचार-विचार 


और व्यवहार शुद्ध करो । अपना व्यवहार ही दूसरों को 


खींच सकता है । 
. कहने, करने और समझने का भेद शिखर पर नहीं 


चढ़ने देता । 


* केहनी और करनी -में जहां एकता है, जीवन का सत्त्व 


: वहीं है 


. यदि जन-जीवन को उठाना है तो कथनी और करनी 


को समान बनाना होगा । 


. करनी से पूर्व कथनी प्रकृति-विरुद्ध है । एक बच्चा भी 


तभी बोलता है, जब वह करना सीख लेता है । महू 
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । 


>> 


न्ध्ण 


०<्‌ 


4९ 


कानून 


- आज कानून के बल पर लोगों की बुराई छुड़ाने की. 


कोशिश की जाती है, लेकिन जो कार्य-हृदय परिवर्तेन 
से बनता है वह कानन से नहीं होता । कानून से जहां 
व्यक्ति बचने की चेष्टा करता है वहां हृदय-परिवत्तेन 
के द्वारा मनुष्य के दिल में बुराई के प्रति घणा पंदा 
हो जाती है 


- कानून बनाने वाले बनाते रहते हैं लोग उसकी शव-परीक्षा 


करते हैं, नाना रास्ते खोजते हैं । 


- समाज-सुधार के और राष्ट्र-सुधार के कानून बनते हैं. 


पर अपनी आत्मा को समझे बिता उनसे बनने का 
कया है ? 


* कानून या डंडे के बल पर मानव को मानव नहीं बनाया 


जा सकता ॥ 


* कानून बुराई छोड़ने के लिए जोर डालता है किन्तु बुराई 


के प्रति घृणा पैदा नहीं करता । 


७-<., 0 दि 


कायहश्ता 


* भीरूता ब्रत पालने में बाधक है । 

: परिस्थितियों के हाथ बिक जाना कायरता है। 

. परीक्षा के समय कष्टों,को देखकर घबरांना.कायरता है। 
४. परिस्थितियों की. दुहाई. देकर न्याय के मार्ग, पर स्थिर 


: न रह सकने. कीः बात, कहने. वाले. सचमुच. हीन बल 


$ 


हे कठिनाइयों और, बाधाओं को देखकर अपना घर्य छोड़ 


कायर है, असाहसिक है । 
घबराता कायरता है, हिँस्ता है: ।. 


. दूसरों को सताने वाला तो बहुत बड़ा कायर, कमजोर 


और. .बुजदिल , है:।. 


के 


सत्पथ से विचलित हो जाना मनुष्य की कायरता का 


- निशानी. है .। 
. प्रतिकुल परिस्थितियों के समक्ष घुटने टेकना मानव की 
- सबसे. बड़ी. कमजोरी , है. । 


, कायरता अहिंसा का अंचल तक. नहीं छू सकती । 


छ 


१ 


११- 
(२. 


१३. 


. हिंसक बने रहना पहले दर्जे की कमजोरी है । 


हिसा का उत्तर हिसा से देने में कोई वीर वृत्ति नहीं है। 
व्रत पालन के लिए अपने आपको चहार दिवारी में बन्द 
करना कया कायरता नहीं है ? 


यह कहना कमजोरी का द्योतक है कि धर्म और व्यापार 
साथ नहीं चल सकता । 


कं।यकरचों 


: प्रत्येक कार्यकर्त्ता में चरित्र, लगते और काम कंरने की 


उचित तरकीब का होना जरूंरी है । जिस मिशन में . 
वह काम करे, तत्सम्बन्धी तत्त्वज्ञान का होनां भी उसको 
अपेक्षित है । 


* कार्यकर्त्ता वही बन सकते है जो अपनी मंस्तिष्के शक्ति 


से अंधिक पुरूषार्थ को काम में लांता है। 


' ३. एक सार्वजनिक कार्यकर्ता या कार्यकर्त्नी का जीवन विनय, 


त्याग, सरलता और नेतिकेतां से विमंडित होना चाहिए 


* भेला जो अपने आप में समाधिस्थ नहीं है, वह दूसरों 


को क्या कल्याण कर सकेगा ? अतः सबसे पहले कार्ये- 
कर्त्ता को स्वयं नि:संशयें होना है । 


५. आज ज्ञानी या पंडितों की उतनी अपेक्षा नहीं है, गितनी 


नदी 


७२ 


, क्रांति का सूत्र सदा जनता के हाथ में रहता 


क्रियाशीलों की, कर्मठों की, करने वालों की । 


, कार्यकर्त्ता अपनी वाणी को अपने कार्य में देखे तो उसका. 


ग्रधिक प्रभाव पड़ेगा । 


लक ने >>:>5 


क्रांति 


, क्रांति एक ऐसा दर्पण है जिसमें राष्ट्रीय भावनाओं की 


प्रतिच्छाया सहज ही अंकित होती है । 


, कौनसा राष्ट्र कित॒वा चेतनशील है ओर कितना मूर्चित है. 


यह हमें समय-समय पर होने वाली क्रांतियां बतायेंगी | 


. वही क्रांति स्थायीत्व ग्रहण कर सकती है जो व्यक्ति 


व्यक्ति के हृदय की आह को दूर करने की क्षमता 
रखती है । 


| क्रांति किसी पर बलात्‌ नहीं थोपी जा सकती । बला 


क्रांति का श्रर्थ होता है-प्रति क्राति के निमन्त्रण । 


, जहां रक्त क्रांति परिस्थितियों को केवल बदलती 


वहां अहिंसक क्रांति समस्या का समूल-उन्मूलन चाहती है | 


आ्राज की क्रांति आने वाले समाज के लिए प्रमाणित 


होती है । 
ठ्ै 


हैँ । 


>ॉचफि- मठ 9225० -- 


क्ररत7 
० 


- ऋ रता सब अन्यायों का मूल है । 

. कोई किसी की हत्या करता हैं या उसमें भाग लेता है, 
... किसी मनुष्य को अछूत मानता है, किसी का तिरस्कार 
.. करता है यह सब अ्रपने अन्तस्थल में छिपी हुई क्र रता 
के परिणाम हैं । 


. ऋरता का प्रतिफल क्र रता और विरोध का प्रतिफल 
विरोध है । 


. अधिकारों के उपार्जन में ऋ्ररता बरतनी पड़ती है। उनकी 
सुरक्षा के लिए और भी अधिक । 


५. अ्रधिकार-दान या धन-दान ऋ रता के ऊपर आवरण है । 


. आशिक प्रलोभनों का प्रभाव इतना भयंकर होता है कि 
उसके प्रभाव में अच्छा व्यक्ति भी ऋर बन जाता है। 


७३ 


हि 


. क्रोध में विवेक नहीं रहता, धैर्य छूट जाता है 
. क्रोध के वश बने व्यक्ति सचमुच दया के पात्र 


क्रोध 


. क्रोध आत्मा को दुःख पहुंचाने वाले दुग णों में. अपना 


मुख्य स्थान रखता है । क्रोध आ्रात्मा का अबःपरतेन करता 


है उसे भव-भव में भटकाता है । 
» घास-फूस रहित स्थान में पड़ी हुई अग्नि भक्ष्य न पाकर 


अपने आप शान्‍्त हो जाती है । इसलिए दुष्ट: और 
गुस्सेबाजों से भिड़ने में कोई लाभ नहीं होता । उनमे 
तो दूर रहने में ही फायदा है। 


| 
न 
ह्। 





खतरनाक 


. स्वप्रशंसा सुनकर प्रसन्न होना और स्वनिनन्‍्दा सुनकर 


नाराज होना दोनों ही खतरनाक हैं । 


बांच्रपांन 


१. अंशुद्ध, तामसिक खांनपोन विके रोत्तेजंक होता है। जीवन 


२. 


उससे उत्तरोतरं गिरावेट की ओर जाता है । 


व्यक्ति का जीवन आहार पर निर्भर होता है । जीवन 
की व्यवस्था बनी रहे-यह आहार का मुख्य कार्य है। 
आ्राहार का सम्बन्ध स्वास्थ्य से, स्वास्थ्य का सम्बन्ध 
सानंसिक सच्तुलल से और उसका सम्बन्ध जीवन की 
सुव्यवस्था से है। “इससे भी महत्त्वपूर्ण बात है कि 
कभी कभी शरीर के लिए लाभकारी वस्तुएं भी मानसिक 
वृत्तियों के लिए लाभकारक नहीं होती । इसलिए आहार 
के चुनाव में केवल शारीरिंक स्वास्थ्य की ही नहीं, 
मानसिक स्वास्थ्य की भो दृष्टि होनी चाहिये । 


- मानसिक विक्ृत्तियां पेदा कर शरीर को स्वस्थ बनाये 


रखने की दृष्टि जघन्य है । मांसांहार मानसिक क्रूरता 
का प्रतीक है । 


पा रा 


७५ 


गंवार 


१. गंवार वह है जिसके श्राचरणा, व्यवहार, खानपान और 
विचार बुरे हैं । फिर चाहे वह ब्राह्मरा हो, वैश्य हो या. 
अन्य कोई भी । 


यणतमन्ब 


१. अगर आपको गणतनन्‍त्र-दिवस सफल बनाना-है तो उत्तकी 
भूमिका चरित्र पर आधारित करनी होगी । 

२: गणातन्त्र-दिवंस मनाने का यही मतलब है कि व्यक्ति 
अपने जीवन को टटोले, जीवन में पड़ी खाइयों को मिठाये | 


ये. धप्रश्ज + 2०7- 


9६ 


मु १ ड 


२. 


गलती 


छोटी-छोटी गलतियां ही वड़ी-बड़ी गलतियों के द्वार 
खोलती हैं । 


वास्तव में कोई भी गलती छोटी नहीं है, गलती मात्र 
बड़ी होती है, पर उसकी अपेक्षा द्वारा छोटी मान ली 
जाती है । । 


काल 


| जंण 


. व्यक्ति की उच्चता और नीचता का माप-दण्ड गुण से 
' होता-है, जाति से नहीं । 


गुणों का विक्रास जाति की अपेक्षा नहीं रख कर व्यक्ति 


की योग्यता पर निर्भर रहता है । 


व्यक्ति नहीं पूजा जाता, गुण पूजे जांते हैं । 


99 


. मनुष्य-मनुष्य के प्रति घृणा करे इससे बढ़ कर सर 


» आत्म ऋजुता, सरलता, अटिलता आदि जीवन को परि- 


सा्जित करने वाले सदुगुण हैं । 


 अच्छाई की कसोटी एकथात्र सदगुण है। ह 
, विनय, शालीनता, सरलता, सादगी, सत्य, निष्ठा आ्रादि 


सदगुणों में वह शक्ति है जो जीवन को सच्ची प्राणवत्ता - 
देती है । | ॥ 


७. ऊंच नीच की विवक्षा याति के आझ्राधार पर नहीं, गुणवाद . 


से ही होनी चाहिये । 


घुणा! 


. किसी व्यक्ति से घुणा करना महाच्‌ पाप है । क्‍ 
, यदि मैला उठाने से ही व्यक्ति घुशित हो जाता है तो. 


सबसे पहले घुरित होंगी माताएं, जो नित्य बाल-बच्चों 


-का मेला उठाती हैं । | 
, किसी के प्रति घृणा करने वाला क्या सबके प्रति घृणा 


नहीं करता ? 


. मनुष्य घुणा का आरम्भ किसी दूसरे से करता है पर 


चलते-चलते अ्रपनों तक तथा अपने तक पहुंच जाती है | 


+*. 


रि 


 'अमनुष्यता क्या होगी ? 


छ्प 


न 


न्प्ण 


* एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के प्रति घणा का मनोभाव रखे 


यह कितनी दयनीय मनोदशा है । 


प्रेम का अभाव होता है, तभी घणा बढ़ती है । 
घृणा करो बुराई से, बुरे से नहीं; पाप से, पापी से नहीं । 
« गन्दगी को गन्दगी समभता और उससे बचना तो ठीक 


है, पर उससे घृणा करना उचित नहीं । 


आदमी के काम अच्छे बुरे हो सकते हैं, पर व्यक्ति 


घृरितत नहीं हो सकता । 


: घ॒णा बुरे आदमी के प्रति न होकर, 'बुराई के प्रति होनी 


चाहिए, क्योंकि व्यक्ति बुरे से अ्रच्छा बन सकता है, पर 
बुराई कभी अच्छाई नहीं बन संक्रती । 





चक्व्रि 


. चरित्र-सम्पन्नता के बिना उच्चपद जीवन के लिए भार- 
मत है । 
* संसार को विनाश के मुख से बचाना है तो चरित्र का 


उत्थान करना होगा । 


' सतृश्रद्धा और सद्ज्ञान के सहारे पनपने वाला चरित्र दिव्य 


जीवन का प्रतीक है । 


७६ 


, चरित्र जीवन की सम्पत्ति है। जिन्होंने इसे सम्भाव - 


कर नहीं रखा उनके कार्यक्रमों की सफलता में बहुत कुछ 
असम्भावनाएं हैं । ह 


५, चरित्र मानव जीवन की मूल-पूजी है । 


. चरित्र ही तो जीवन की सच्ची निधि है, सच्चा वैभव है । 


७. चरित्र की उत्कृष्ठता, मातृहृदय का स्नेह और बुराई 


१०. 
११. 


१२: 


से बचाने का सहज आकर्षण बाल-वच्चों को अवश्य _ 
ही चरित्रनिष्ठ बना सकता है । 


, उच्चता और नीचता की कसौटी जाति और वर्ण नहें, 


उसकी कसौटी है-चरित्र व अन्तवृ त्तियां ।. 


आज संसार एकमात्र अभाव के कारण ही दुःखी नहीं. 


अपितु मुख्य कारण है मैतिक अथवा चारित्रिक पतन। 
चरित्र के लिए धर्म स्थात और घर दो नहीं हो सकते | 
चरित्र का सम्वन्ध्र केवल व्यापार शुद्धि तेक ही सीमित 
नहीं है । उसका सम्बन्ध उन सब कार्यों से हैं, मी 
मनुप्य को हिंसक बनाते हैं । 

खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों को यदि चरित्रवान 
नहीं कहा जा सकता तो आशणविक अस्त्रों का निर्माण 


. करने वालों को भी चरित्रवान् नहीं कहा जा सकता । 


:. शोपरा, अन्याय, असहिप्णुता, श्राक्रमरा, दूसरे के अभुत् 


का अपहरण या उसमें हस्तक्षेप और असामार्णिक 
प्रवृत्तियां-ये सव चरित्र के दोप हैं । 


हा] 


चरित्र और शान्ति दो नहीं, एक ही सत्य की दिख 


(६ रए *ः के 3 ःि दा न छः 
अभिव्यक्ति है । चरित्र है वहां शान्ति और द्वान्ति 
वहां चरित्र । कह ०7३७ ४ 


जा 
्ज 


श्छ 


ए८. 


 दु:खी होने का मुख्य कारण है चारित्रिक पतन । 
:, यदि दृष्टि बिन्दु ठीक रहे तो चरित्र सुधार में कोई 


विशेष कठिनाई नहीं होती पर उसके बिना सदाचार की 
आशा कंसी 


बिना चरित्र बल के कोई भी संस्था अधिक दिनों तक 
चल नहीं सकती । 


चश्त्र न तो किसी दूसरी जगह से आता है न खंरीदा 


. ही जा सक्रता है। वह अपने आप में ही है और स्वयं 


२०. 


र२्‌ 


न 


२४. 
२९. 
२६. 


ही उसका विकास किया जा सकता है । 


. चरित्रवान के सम्पर्क में रहने से चरित्र की शुद्धि हो 


सकती है । 


अंक के बिना शुन्य का कोई मृल्य नहीं होता--यह श्राप 
जानते हैं और यह श्रापको जानना है कि चरित्र निर्माण 
की योजना के बिना शेष सारी योजबाएं श्रर्थ शून्य 
हो जायेगी । 


« चरित्र विक्रास के बिना कोई भी सपाज और राष्ट्र उन्नत 


नहीं हो सकता । 


« चरित्र जीवन की गति है । 
२३. 


चरित्र जीवन की बुनियाद है | जीवन का ऊंचा प्रासाद 
उसी पर आधारित है 


- चरित्र के स्तर का मापदण्ड अहिंसा है । 


शस्त्र में निष्ठा रखने वाला चरित्र निष्ठ नहीं हो सकता। 
भयंकरता शस्त्र में नहीं, व्यक्ति के चरित्र में होती हैं .। 
शस्त्र तो उसका प्रतिविम्व मात्र होता है । 


प्र 


२७. 


रे, 


ग्रन्थों के ग्रन्थ रट डाले, बड़ी-बड़ी उपाधियां पाली, पर 
यदि जीवन में चरित्रश्शीलता नहीं आई तो यह सारा 
ज्ञान बेल की पीठ पर लदे पुस्तकों के वोरों ज॑सा है। 

ज्ञान श्रद्धा के कंधे पर बंठे, क्योंकि वह पंगु है। श्रद्धा 
चले और ज्ञान सम्यक्‌ दर्शन दे । इन दोनों के सहयोग 
से जो क्रिया (आचररा) होगो वह सम्यक्चरित्र है। 


. संसार को विनाश के मुख से बचाना है तो चरित्र का 


उत्थान करना होगा । 


चोषा 


. अपने काम धन्धे में ईमानदारी नहीं वरतना चोरी है । 
. अपने जिम्मेवारी के काम से दिल चुराना चोरी है । 


न--्छ-स्शियफ्शसफारब+छ- 


_तयनन्‍ती 


, जन्म-जयन्ती की वनिस्पत चरम-जयन्ती का विशेष महर्रेँ 


है.। जन्म-जयन्ती में जन्म दिन के बाद का मविध्य 


ग्रनिश्चितता की सीमा में बंधा रहता है । जबकि चर 


>त9 


गे । 


ना 


जयन्ती में चरम-दिवस तक के जीव॑न का पूर्ण उपसंहार 


. और जीवन की घटनाओं का सजीव और असंदिग्ध लेख 


सामने मौजूद रहता है । 


. जन्म-जयन्ती की श्रपेक्षा दीक्षा-दिवस, बोधि-दिवस और 


निर्वाश-दिवस का विशेष महत्त्व रहता है। जन्म के सामने 
जीवन का सारा भविष्य रहता है और निर्वाण के दिन 
सारा भविष्य अतीत हो जाता है । 


>> ऑषण्पओस॑म्ककी ++--- 


नातिवाद 
. ऊंचापन और नीचापन जाति पर नहीं, कर्म पर 
आधारित है । 
. जातिवाद अहंकार का पोषण करता है और हीनता को 


जगाता है । 


नीवीनन-समममविफलन-++नन भा. 


लिज्ञाग्मा 


श्रवण के पहले जिज्ञासा का होना अत्यन्त आवश्यक है। 


: “जिज्ञासा के अभाव में केवल सुनने मात्र से ही. कोई 


उपलब्धि नहीं हो सकती । 


परे 


२. आज विश्व के देशों में कया हो रहा है, आदि आदि 


प्र्ल्के 


- बातें जानने को मानव उत्सुक रहता है लेकिन स्वयं ु 


अपनी तरफ नहीं देखता । 


. हर मनुष्य को जिज्ञासु होना चाहिये, जिगीषु नहीं । 


आकर 2 हल 


ब्वम्मेदार! 


, जिम्मेदारी एक ऐसी चीज है, जो तोली नहीं जा सकती 


और मापी नहीं जा सकती । किन्तु जो इसको वहन 


- करते हैं, उन्हें ही जिम्मेदारी का वजन मादुस होता है। 


तप 


तीवन 


. वह जीवन सूना है जो अपनी ही सोचे | 
, जीवन वह है जो अध्यात्म दृष्टि से जागृत एवं उद्बुद्ध है | 


जो धन, वैभव, सत्ता और अधिकार के भूल-भू्या ५ 
गुमराह न वन संयम, सात्विकता और चारि््य के मार्ग 
पर अग्रसर है । ह ह | 


स््क््दा 


* त्याग ओर भोग जीवन के दो पहलू होते हैं । मुख्य 


पक्ष त्याग है, भोग गौरा और नगण्य है। त्याग को 
मुख्यता और भोग को तिल्लांजली देने से ही व्यक्ति, 
समाज और राज्य की समस्त व्यवस्थायें सुन्दर रूप से 
संचालित हो सकती हैं । 


- वतेमान जीवन शुद्ध नहीं हुआ तो अगला जन्म शुद्ध 
कैसे होगा ? 
- जीना ही जीवन नहीं बल्कि संयमपूर्वक जीना ही जीवन 


है । मरना ही मृत्यु नहीं बल्कि भ्रष्टाचार में जीवन को 
खपाना ही मृत्यु है । 


- नदी तब तक नदी है जब तक उसमें संयम है। जीवन 


भी तब तक जीवन है जब तक जीवन में संयम है। 


» सफल जीवन के चार तत्त्व हैं -- शान्‍्त जीवन, सन्तुष्ट 


जीवन, पवित्र जीवनं और आनन्दमय जीवन । 


. जीवन की सार्थकता धन, वेभव और मालमता की पवे॑त 


राशियां खड़ी कर लेने में नहीं है, वह तो उज्ज्वल- 
आचरणा, सात्विक वृत्ति और निरछल व्यवहार में है। 


» जगत में सबसे अधिक दयनीय वह है जिसका जीवन 


विकारों में फंसा है, जिसकी वृत्तियां असत्य, हिसा, प्रमादे 
और मात्सयय से भरी हैं, जो दुव्यंसनी है । 


८८८, 


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ब्<्‌ 0 >>) “७ 


तीवम का? लक्ष्य 


, रोटी और रोजी ही जीवन की लक्ष्य नहीं है । 

| मानव जीवन का ध्येय संयम की साथना है न कि विलास। 
 अन्तरतम का परिशोधन ही जीवन का लक्ष्य है । 
जीवन में सत्य की खोज की जाय और वह सत्य जीवन 


में उतरे । आचरण में आये । 


व्यक्ति आत्म-दुर्बलता के कारण भौतिक अभिसिद्धियों में 


फंस जीवन के सही लक्ष्य से हटता है | यह उसकी 
बहुत बड़ी भूल है जो उसे गिरावट की ओर ले जाती € । 


, जीवन का साध्य है-श्रत्म स्वरूप को समभना । 


७. जीवन का लक्ष्य आनन्द है। आनबन्‍द शान्ति के बिना 


मिलता नहीं । हृदय में अशान्ति है तो आनन्द की कल्पना 
भी व्यर्थ है । 


, मानव जीवन वहुमूल्य जीवन है। इसका चरम 


है--आत्म स्वरूप की प्राप्ति, आत्मा पर लगे कर्म ऑर्वे- 
रणों के परिमार्जन दारा शाश्वत घान्ति का साक्षात्कार 


९ 


० 


] 


508 


ई्‌ छू 


(ठ 


मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य भौतिक अभिंसिद्धियाँ नहीं 
अपितु मोक्ष है । 


कि | ०] (5 
तंग आर लनधम 


. जिन (वीतराग) के द्वारा बताये मार्ग को ग्रहण करने 


वाला या उस पर श्रद्धा रखने वाला जन है । 


जन वह है जो अपनी आत्मा को जीतता है । 
पीढ़ियों से जेनी कहलाने वाले में यदि जेनत्त्व के आदर्श 
है तो सही रूप में वह जेनी नहीं है । 

जन धर्म का मंतव्य अनेकान्त है । अनेकान्त का अर है 
सापेक्ष दृष्टि । 

भाषावाद और जातिवाद में जैन धर्म विश्वास नहीं 
करता । उसके सिद्धान्तानुसार एक ग्रुणयुक्त चाण्डाल 
भी पूज्य है और शुझ शून्य द्राह्मण भी अवन्‍्ध । 

जेन धर्म में व्यक्ति का महत्त्व नहीं, गुरा का महत्त्व 
वीतरागता का महत्व है । उसमें पर विजय का नहीं 
आत्म विजय कां महत्त्व है । 


जन धर्म में यहां तक व्यापकता है कि एक हरिजन भी 
मुंनि और वीतरागी- बन सकता है । 


पंछ 


. जन धर्म किसी व्यक्ति या जाति परक. नहीं पर गुण 


और क्रिया परक है । 


' जन धर्म स्याद्वादी है, वह कहता है सवका समन्वय 


करो, सबको समभो, उदार बनो, विशाल बतो, छोटे- 
छोटे मत्त भेदो को लेकर लड़ो मत, सहिष्णु बनो। 





७ 
त्रन तत्व 


. तत्त्व शब्द में नहीं, आचरण में रहता है । 
- जैन तत्त्व का उपदेश है-पुरुषार्थी बनो । 


जैन तत्त्व किसी व्यक्ति के नहीं, ये तो बीतराग के 


.. तत्त्व हू । 


द््ष 


३३ 6 | 
'लान दान 


. जैन दर्शन आंत्म कतृ त्ववादी है। 
. जन दर्शन पुरूषार्थवादी दर्शन है । 
. जैन विचार घारा .की बहुमूल्य देन है. संयम । 


०८ 


: जेन दर्शन भारत के प्राचीन ऋषि-मह॒षियों के विचारों 
की अनुपम. निधि है । रा 

- जन दर्शन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त जो विश्व बन्धुत्व का 
है, वह हमारी अमूल्य विरासत है । 


जो 


हक 


. जन दर्शन अनेकानन्‍्तवादी दर्शन है। अनेकान्त समन्वय 
का प्रतीक है । 
७. प्रत्येक आत्मा स्वतन्त्र है। उनके अलग-अलग अस्तित्व 


हैं। व्यक्ति-व्यक्ति के पृथकृत्व होने से आत्मा अनेक है 
और प्रत्येक आत्मा अनन्त धर्म वाली है, प्रत्येक में चेतन 
गुण का अस्तित्व है, प्रत्येक को सुख दुःख का अनुभव 
होता है, प्रत्येक दुःख की अनभिलाषा और सुख की 
अधभिलाषा रखती है, प्रत्येक में आत्मत्व है। इस तरह 
जेन दर्शन एकान्तवाद व अनेकान्तवाद दोनों सिद्धान्तों 
को अपनी अपनी जगह सही मानता है । 


८. जन दर्शन के स्वृतन्त्र आत्मवाद के सिद्धान्त ने भारतीय 

. मानस को इतना प्रभावित किया कि व्यक्ति स्वातन्त्रय 
का स्व॒र जन-जन का मंत्र पाठ बन गया । 

९. जैन दर्शन राग-द्वेष को जीतने वालों द्वारा आविष्कृत 
तत्त्वज्ञान का मार्ग है । 

१९०. जैन दर्शन में जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष है। जिसे उत्कृष्ट 
आत्म-साधना पूर्वक प्राप्त करने का जितना अ्रधिकार पुरुषों 

- को है, उतना ही नारी को भी है। .' 

११. जन दर्शन का चरम लक्ष्य मोक्ष है । इसके लिए अंतर- 
तम के परिमार्जज की आवश्यकता है । . 

१२. जेन दृष्टिकोण से कला क्षयोपशम भाव है अर्थात्‌ 


न 


१३: 


१४. 


१५. 


१६. 


सत्संस्कारों को प्रतिफल है; पर उसकी उपादेयंता-अनु- 
पादेयता उसके उपयोग पर निर्भर है। 

जैन दंशंन पुनर्जन्म, श्रांत्मो, ,ईईवरं, कर्मफेल, मुक्ति भर 
स्वर्ग-सकी पर विश्वास करंता है । उसकी मान्यता है- 
जब तक आत्मा कंर्मशरीर-वन्ध॑न युक्त हैं; तंबे तंके वह 
वद्धात्मा और इनसे मुक्त ही परमात्मा है । 

स्याद्गाद, अपेक्षावाद, नयवाद या अनेकान्तवाद जैन दर्शन 
की निरूपण पद्धति है ।' । है: 
जैन दर्शन ईश्वर का अस्तित्व मानते हुए भी आत्म- 
पुरूषार्थ पर ही बल देता हैं । कर्ता-हर्ता कोई अन्य 
ईश्वर न माौन कर उसके स्थान पर आत्मा को हीं कर्ता- 
हर्ता स्वीकार करता है । | 
जैन दर्शन जीवन की या यों कहूँ विश्व भर की मुत्यियां 
सुलभाने के लिए दो दृष्टियों का निरूपण करती है- 
एक आचार और दूसरा विचार | आचार और विचार 


डर 


65 का गहरा सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरा अधूरा है। 
१७. 


जैन दर्शन अनेकान्तवाद पर आधारित है, जो विश्व 
समस्त विचारधाराञ्ों के समन्वय आर सामंजस्य की 


“- संमुचितं पथ प्रस्तुत करता है । वह बताता है कि एंक 


(६. 


ः १ & 


ही वस्तु ह अनेकों अपेक्षाओं अथवा हंष्टियों से.परखा 


जो संकंता हैं । 


जैन देंशन बताता है कि कोंई मनुष्य यदि जन बनना 


-चाहता है तो उंसके लिए यह आवश्यंक है कि वह विजेता 
के पंथ पर अपंने कंदर्म बढ़ाये । ह 


समूचे जैन देशन में संबसे' बड़ा तत्त्व जीवन झोंवन की 
प्रक्रिया का है । 


लेनागम 


१. जेन-आगम ज्ञात्त-विज्ञात के अमुल्य तिधान हैं । ज़ीवन 
को विकास के निर्मल मार्ग पर ले जाते के वे अ्मोघ 
साधन हैं । 


झूठ 


१. यदि मनुष्य अपने घर में भूठ बोलने लग जायें तो परिवार 
नाम की कोई चीज ही नहीं रह जायेगी । ४ 
. समाज का आधार भी श्राखिर सत्य हैं। यदि. मनुष्य 
समाज में सच्चा नहीं रहे तो समाज छिन्न-भिंन्न ही रहेगा । 
३. वही राष्ट्र संमुच्नंत होगा जहां के निवासी 'भूठ नहीं बोलते। 


<-कण्डी ५ (कह /2७० 


ष्‌ 


ध्र्‌ 


तपरया 


| तपस्या आत्म-परिष्कार के लिए सफल साधन है । 
, तपस्या आत्म-शक्ति को बढ़ाती है आत्म तेंज उदीप्त करती 


है । अन्तर शुद्धि का यह अमोघ सावन है । 


, तपस्या पूर्व संचित कर्म बन्धनों को तोड़ती है। अर्थ, वेभव 


पुत्र व सांसारिक सुख जैसी भौतिक अभिसिद्धियां उसका 
सही लक्ष्य नहीं । तपस्या का सही और शुद्ध लक्ष्य है 
जीवन शुद्धि । का 


, तपस्या का सही अर्थ मानव के अन्तरतम में व्याप्त 


विकृत्तियां -- विजातीय तत्त्वों को निकाल कर बाहर 
करना है । कर | ॥ 


- वह तप, तप नहीं जिस तप के कारण औरों की हत्या 


होती है ।: कि । 


, तप वही है जिससे किसी को. मी संताप और किसी की 


हनन न हो 


, राग, द्वेष, प्रमाद और स्वार्थरहित जितने आचरण हैं 


न 


वे सब तपस्याएं हैं । 


« तपस्या से मनुष्य को कष्ट जरूर होता है, लेकिन वह 


कष्ट परम सुख की ओर ले जाने वाला है । 


, कोरी तपस्या से अभीष्ट लाभ तब तक सम्भव नहीं जब. 


तक क्षमाशीलता नहीं हो । 


"+-पहिगकिनही( ३-७० 


दुष्णा 


: तृष्णा भ्नन्‍्त है, संसार की वस्तुएं सीमित हैं, परिमित-हैं। 
पदार्थों का विस्तार हुआ, फलतः परिभोग बढ़ा, लाल- 


साए बढ़ी । 


. इच्छा स्वल्प होती है तब हिसा अपने आप स्वल्प हो 


जाती है। आरम्भ आवश्यकता के सहारे चलता है, तब 
वह असीम नहीं बनता । उसकी गति इच्छा के अधीन 
हो जाती है, तब वह सीमातीत बनता है । 


. जीवन की अनिवाये आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती 


है किन्तु लालसाओं की पूर्ति कभी सम्भव नहीं । 


 ज्यों-ज्यों व्यक्ति पदार्थों के माध्यम से तृप्ति की ओर बढ़ना 


चाहता है अतृप्ति की परम्परा और लम्बी बनती . . 


चलती है। 
 ज्यों-ज्यों साधनों का और अधिक विस्तार होगा त्यों- 


त्यों आवश्यकतःएं भी और आगे बढ़ती चली जायेगी 


धरे 


१०. 


११. 


&ड 


फिर मानव इतना दिगूमृढ़ बन जायेगा कि वह सहो 
मार्ग पर पहुंच न सकेगा । 


 तृष्णा, का ग्रास बना हुआ मानव सावेभौम चत्रवर्ती होने 


पर भी सुखी नहीं होता और सनन्‍्तोषी मानव अ्रकिचन 
होते हुए भी सुखी रहता है । 


. हिंसा, परिग्रह आदि जब जनता के जीवन निर्वाह की 


परिधि को लांघकर तृष्णा के क्षेत्र में आ जाते 
सामूहिक अशान्ति का जन्म होता है । 

हां लालसा है वहां दुःख निश्चित है 
जिसको ज्यादा तृप्तियां होने लगती है, उसकी अतृतप्तियां 
भी उसी वेग से बढ़ने लगती है । 


पदार्थ के प्रति मानव में जो अत्याधिक लोलुप वृत्ति पंदा 
हो गई है, वह उसे औचित्य-अनौचित्य, न्‍्याय-अन्याय की 
परख नहीं करने देती । 


त्याग 


, धन से त्याग सदा ऊंचा रहा है और रहेगा । 
. त्याग' का महत्त्व इसलिए. है क्वि भविष्य में घन के. प्राप्त 
करने के प्रति आकर्षण मिटता है। हा 


न्श्ए. 


, सही रूंप में त्यागी वही है जो सर्व साधन सामग्रियों. 


के उपलब्ध होने पर भी उनको ठुकरांता है औरं त्याग 
के मार्ग पर आगे बढ़ेता है । 


 श्रध्यात्म जगत में संम्नाटों की, राजाओं को और धन 


कुबेरों की प्रतिष्ठा नहीं किन्तु त्यांगियों की प्रतिष्ठा है । 


. पुरुष जाति में जितनो त्याग निंष्ठां है उससे कहीं अधिक 


नारी जाति में आजं भी पायी जाती है | 


. सादेगी व सरलंता निर्धनतां की पराकाष्ठा नहीं किन्तु 


: त्योग की महिमा है । 


११. 
श्र 


१३. 


संग्रह की वृत्ति तीतन्र होती है, तब त्याग शाब्दिक बन 


जाते हैं । 


, आजकल लोग आउडम्बर, आरम्भ व फिजूल खर्ची में 


होड़ करने के लिए तैयार रहते हैं। उन्हें चाहिये कि वे 
त्याग में होड़ करें । 


त्याग हीं सच्ची सेवा, सच्चा उत्थान और संच्ची जागृति है । 
- जहां भोग छूटने पर भोगी दुःख पाता है, वहां त्यागी 


आनन्द का अनुभव करता है । त्यागी स्वयं भोगों को 
ढुकराता है, भोगी उनके लिए मारा-मारा फिरता है। 
जिन्हें त्याग का अभ्यास नहीं उन्हें नश्वर भोग लीलाझओं 
के आवतंन-प्रत्यावतंन में बड़ी यातनोएँ भेलनी पड़ती हैं । 
संयतता का मार्ग त्याग है इसलिए दान की नहीं, त्याग 
की वृत्तियों की आवश्यकता है । 

उपलब्ध सामग्री का त्याग करना त्याग है और अप्राप्त 
को प्राप्त न करना भी त्याग है । 


४ 


१४. 
१५ 
१६. 


१७. 


श्८. 


१६. 


2 


ऐयाग का आदर्श तो वह है.कि मनुष्य अपनी आंवश्यंक . 
. अनिवार्यताओं से अधिक रखने की चेष्टां न करे । 


आत्म दमन के लिए किये. गये अनशन से अगर व्यक्ति 
की मृत्यु हो जाये तो वह त्याग है । 

जितना-जितना आत्म संयम है, असद्‌ आचरणों का परि- 
त्याग है, वह निदृत्ति है । ह 

त्याग के पांच मार्ग हैं-अहिस।, सत्य, अचौयय, व्ह्मचय, . 
और अपरिग्रह । इनको आदर्श मान कर उन्हें यथाशक्ति ' 
अपने जीवन में उतारना होगा ॥ तभी. मानव सुखी 
होगा और उसे शान्ति मिलेगी । ह 
त्याग की परम्परा अक्षुण्ण रहने से ही जीवन की विषम - 


और गहन खाइयों को पाटा जा सकता है। 


प्राप्त भोग-सामग्री को ठुकरा कर संयम मार्ग में प्रवृत्त 
होना ही सच्चा त्याग हैं । 


. पूजी का आनन्द क्षणिक है और त्याग का आनत्द 


स्थायी है । 





 च्ए.. 9. 


। 


दया--दानर 


« संसार यह देखना नहीं चाहता कि आप कितना दान, 


पुण्य और जाप करते हैं। वह तो यह देखना चाहता 
है कि आपके आचरण कितने पवित्र हैं ? शोषण का 
चक्र चलाते हैं या मानवता का मूल्य आंकते हैं ? 


- जहां दया नहीं वहां धर्म नहीं है । पर दया के नाम पर 


पाप और अत्याचार पलते हैं । लोगों ने गहराई में 
उत्तरने का प्रयास तो कम किया और केवल ऊपर को 
पकड़ा । किसी को टुकड़ा देना और मरते को बचा देना 
ही धर्म मानता । 


- अन्याय और बुराईयों से पेसा पंदा कर उस पाप से मुक्ति 


पाने के लिए दान देना चाहते हैं। जनता आपके दान 
की भूखी नहीं है । वह चाहती है अ्रन्याय और अत्याचार 


* की कमाई बन्द हो । जनता दान नहीं अधिकार मांगती 


है । मजदूर दान नहीं अपने श्रम का फल चाहता है। 
दया दूसरे की नहीं, अपनी ही होती है। आप -अंपने 
पर ही दया करके दूसरों को कष्ट पहुंचाना छोड़ दें । 


था 


पट 


१०. 


११. 
:. बहुत श्रेष्ठ हैं । 
१२ 


१३. 


व्यक्ति की आत्मा को उन्नत ओर उज्ज्वल बनाना 


जहाँ आध्यात्मिक दया का सम्बन्ध हृदय परिः 
.:.. वहाँ लौकिक दया का सम्बन्ध केवल बचा लत मात्र से 


, दान ऐसा देना चाहिये जिससे अ्रहिसा का पोषण हो। 


दया ऐसी करनी चाहिये जिसमें हिंसा का समावेश न 
हो । वह दान-दान नहीं जिससे अहिंसा का पोषण न 
होता हो । वह दया-दया नहीं जिसके करने में हिसा हो । 


, लौकिक दया का मुख्य आधार समाज व्यवस्था एवं दुःखित 


व्यक्तियों का अनुग्रह है । उसमें हिंसा-अहिंसा का विचार 
नहीं किया जाता । इसलिये वह लोकोत्तर दया से दूसरे 
शब्दों में अहिंसा से पृथंक्‌ है। 
ही 
विशुद्ध दया का सही लक्ष्य है।. 


. जिसे तू मारना चाहता है; वह तू ही है-यह दया की 


मौलिक मंत्र है । 


' ग्पनी ओर से किसी प्राणी को न मारना, संतप्त ने 


करना और क्लेश न देना तात्त्विक दया है । 


व 


रिवर्तनं से है 


ही है, हृदंय परिवर्तत से नहीं |. ह 

शोषणा का पोषरा करने वाले दानियीं की अपेंक्षा अंदानी 
शोषरा का द्वार खुलां रख कर दान करने वाला, हजारों 
को जूट कुछ एक को देने वाला कभी धन्य नहीं हो सकता । 
केवल देना ही दान नहीं है । दान में दांतो, पात्र और 
दान की वस्तु का विवेचन और शुद्धि अत्यन्त आवश्यक 


» और अपेक्षित है । 


श्द 


जिसे प्रकार कृषि में वीज, खेत की मिंट्टी और खेती के 


१५. 


१६. 


नियमोपनियम आवश्यक होते हैं उसी तरह दान में 


दाता, देय और पात्र की उपयुक्तता तथा पात्रता आव- 


श्यक है । 


जिस व्यक्ति में सम्यकज्ञान, सम्यकृद्शंव और सम्यक्‌- - 
चारित्र मिलता है, चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय या पंथ 
का हो वह शुद्ध साधु व शुद्ध साध्वी है और उसको दान 
देने में एकान्त-धर्म है। 

मरने वाला मर कर भो कुछ खोता नहों, मारने वाला 
जीवित रह कर भी खोता है । भरने वाले का प्राण 
ताश होता है मारने वाले की आत्मा का । 


दश्द्विता 


: पैसा नहीं होने से ही कोई दरिद्र नहीं हो जाता । वास्तव 


में तो अनाचार ही दरिद्रता है। 


- यदि पैसा नहीं होने से कोई दरिद्र हो जाता, तो सबसे 


बड़े दरिद्र तो साध्ठु होते । पर उन्तके सामने तो सम्नाटों के 


भी सिर झुक जांते हैं । 


कल आिकी कल-++ 


| 
दडध्च 


, दर्शन जीवन की व्याख्या है, विश्लेषण है, सत्य की 


खोज है । 


, दर्शन का तात्पर्य है-जीवन की खोज, अन्तरतम कीं 


अन्वेषण । 


, बैदिक, जैन और बौद्ध तत्त्वज्ञान के रूप में भारतीय दर्शन 


की त्रिवेशी दार्शनिक जगत में अ्रपना महत्त्वपूर्ण स्थान 
रखती है ! े 


भारतीय दर्शन का चरम लक्ष्य है--आात्म स्वरूप की 


प्राप्ति, समस्त बन्धनों से छुटकारा । सत्‌,चित्‌ और बन 
का साक्षात्कार | भारतीय दर्शन की यह विशेषता रही 
है कि वह साध्य की शुद्धि पर जिंतना जोर देता है, 
साधन की शुद्धि पर भी उतना ही बल देता है | 


. धर्म वह चीज है जो व्यक्ति-व्यक्ति के जीवन का विकास 


करता है । 


, सभी दर्शनों का मूल बीज है-दढ्ंःख के गअभिषात सुझ्ष 


' के लाभ की आकांक्षा । 


१००. 


१०. 


११. 


१२. 
१३. 


« दर्शन केवल विद्वानों तथा विचारकों के दिमागी व्यायाम: 


का विषय नहीं, यह तो व्यक्ति-व्यक्ति के जीवन का एक 
आवश्यक और व्यवहारिक पहलू है । | 


- दर्शन संसार की आध्यात्मिक भूख को शान्त करने का 


एक अमोघ साधन है । 


. जो दर्शन तत्त्वों पर टिका हुआ होता है, उसके अनुयायी 


चाहे कम हों पर मूल्य की दृष्टि से वह अधिक वजनदार 
होता है । 

भारतीय दर्शन निर्माण और सृजन का दशंन है। विध्वंस 
का नहीं । वह लोक जीवन को एक ऐसे निर्मिति में 
ढालना चाहता है जो सत्य, शौच, सदाचरणा की निर्मिति 
है । यदि एक शब्द में कहूँ तो संयम की निर्मिति है । 


भारतीय दर्शन ज्ञान और आचरगरा के समन्वय का दर्शन 
है । उसका निर्घोष है --तत्त्व को जानो, सत्य का 
साक्षात्कार करो, अपने जोवन में उसे ढालो और तदनुरूप 
क्रियाशील बनो । 


भारतीय दशशनत पुरूषार्थवादी व श्रमवादो दर्शन है। 
भारतीय दर्शन अन्तर्देशन है। वह केवल बाहरी पदार्थों 
को ही नहीं देखता, जीवन के अन्तरतम की गुत्तयियों 
हे भी देखता है और उन्हें सुलकाने का पथ-दशेन 
ता है 


आह 2:72: 


दासवा 


१. दासता बुरी है पर इन्द्रियों की दासता बहुत बुरी है। 
दूसरों की दासूता से मुक्त होना सहज है १९ झपनी 
इन्द्रियों की दासता से मुक्त होना जरा टेढ़ीं खीर हैं । 


अन>>ः«»मममाडिलमम+कनमा--, क 


द्शि! 


१. दिल्या]की स्पष्टतां पर प्रत्येक चरण गंतिमांत होती चला 


“ जाता है | हे 
२. जीवन को अनिश्चित दिशा ही उसकी अ्रकमण्यता का 


मूल हेतू है । 


| 
.._क- पीडि++2पॉए-बडि 2०7 


श्०२ 


दीक्षा 


दीक्षा का ग्रर्थ है--जीवनं निर्माण । 
दीक्षा का अर्थ केवल साधु वेष पहन लेना मात्र नहीं 
है। दीक्षा संस्कार का उद्देश्य है--सम्पूर्ण संयमी जीवन । 
- दीक्षा का मतलब है--भोगों को ठुकरा कर यावज्जीवन 
के लिए त्यागमय जीवन बिताना, अपने जीवन में सत्य, 
अहिसां, अचोौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरियग्रह जेसे कठोर ब्र॒तों 
को पूर्ण रूपेरणा उत्तारना । 
. दीक्षा जीवन का महाच्‌ आदशे है । चिर संचितं शुद्ध 
संस्कारों के बिना इस ओर मनुष्य कां मत नहीं जाता । 
५. दीक्षा का आदर्श है--अपने आप में रमण करना। 

६. ब्रतों को जीवन में उतारना ही दीक्षा है । 
.७. दीक्षा योग्य व्यक्ति को देनी चाहिये । अयोग्य दीक्षा का 
... मैं स्वयं कंट्टर॑ विरोधी हूँ । उसके विरोब में मैं क्रांति 
... करने को तैयार हूँ, किन्तु मैं यह मानने को बाध्य नहीं 
हैं कि बालक दीक्षा योग्य हो ही वहीं सकता । ' 


१०३ 


८ 


१०४ 


दीक्षा उसी बालक को दी जानी चाहिये जिसके संस्कार 
परिपवव हों । | 


. स्वतंत्रता के युग में बाल दीक्षा पर प्रतिबन्ध लगाना 


बालकों की स्वतंत्रता पर प्रहार करना है |. उनको 
सर्वथा अ्रयोग्य करार देना है । ह 


दुः ब्व ह 


, स्वयं को दुःख जितना अभ्रिय है उससे कम औरों को नहीं। 
अपने स्वभाव को भूल कर विभाव में जाना दुःखहै। 
, दुःख एक कसौटी है जिसमें मनुष्य परखा जाता है कि. 


वह कंचन है या पीतल, श्रच्छा है या बुरा ! 


, बड़े से भो कोई बड़ा होता है । और छोटे से भी 


कोई छोटा । 


, संसार में दुःख अधिक है, सुख कम । सुख स्ववशता- 


आत्मवशता में है, दुःख परवशता में । संसार में पग- 
पग पर परवशता है फिर सुख की आशा कसी ! 


, संसार दुःखी है और वहं इसलिए ढें:खी है कि आज 


व्यक्ति-व्यक्ति की.मांनसिक स्थिति असंतुलित बनी हैंई 
है । मनुष्य अपने गुण अवगुरा को पहचान नहीं सकता। 


: दुःख को दूर तो तभी किया जा सकेता है जबकि. मनुष्य 


गुण पर गव॑ न करे और अवगुरों से पल्‍ला छुड़ाए + 


७. दुःख की जड़ अशान्ति है। 
झ८- ऐहिक सुखों की परिणति दुःखों में है । 
९. आज व्यक्ति धन संग्रह में लगा हुआ है । लालसाओरों 


१७०. 
११. 


१२: 


पर उसका नियंत्रण नहीं है । यही दुःख का मूल-है। 
जहां लालसा है वहां दुःख निश्चित है । 

ज्यों-ज्यों लोग आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और इच्छाओं 
को बढ़ाते जायेंगे, सुख और शान्ति दूर भागती जायेगी, 
दुःख और अशान्ति समीप आती: रहेगी । 


तुम जीना चाहते हो, मरना नहीं । तुम सुखी बनना 
चाहते हो, दुःखी नहीं । तो भला औरों को मारता और 
दुःख देना कहां का न्याय है ? 


वि 


देव “>मुलढ्ल-५ मे 


जीवन में अत्यन्त आवश्यक वस्तुएं हैं --देव, गुरु और 


धर्म । देव उपास्य है जिससे कि तदनुरूप ग्णावलि के 
विकास के पथ पर प्राणी अग्रसर हो सके । गुरु पथ- 
प्रद्शक है, वह सही राह दिखाने वाला है । धर्म आत्मा 
की शुद्धि का साधन है । 


१०४ 


» देव कोई पत्थर की मूर्ति नहीं । जिंन्होंने राग, ह्ेष को जीता 


और वीतरागी होकर शाश्वत सुखों को प्राप्त किया, | 
वेहै। ह ह 


, गुरु वही हो सकता है जिसमें गुरुता हो जिसमें गुरु के 


लक्षण हों । बिना सदलक्षण के गुंह कसा? ॥#& 
घोर अनैतिकता में फंसे मानव को निकालने के लिए 
भी ताकतवर, तपस्वी, संयमी गुरु की आवश्यकता है। 


जो अपने तपोबल के आधार पर, त्याग के बल पर नीति 


_ अ्रष्ट मानव को कीचड़ से त्िकाल सके । 


न 


, अपने दोषों को छिपाना कायरता है |. 
* ४; बुरा. कार्य स्वयं करके दूसरे को दोष देना उसके प्रति 





क्‍ दोष ' 


, दोष अन्ततः दोष ही है चाहे वह कंहीं भी क्यों न हो | 
. दूसरों को दोषी न मात कर स्वयं को दोषी मानता 


और किसी के प्रति राग, द्वेष नहीं-करना;। भरता के 
शुद्ध और स्वाभाविक स्वरूप का द्योतक है । 


५ अन्याय है । 


१०६ 


[० 


धम 


२. आत्म शुद्धि के साधन का नाम धर्म है। 


२. धर्म वह चीज है जो व्यक्ति-व्यक्ति के जीवन का विकास 


करता है । 


* धर्म विश्व मंत्री, विश्व बन्धुत्व और विश्व के साथ सम- 
भाव का प्रतिरूप है । 


- धर्म प्राणी मात्र के लिए हर समय आवश्यक है। 
- धर्म एक सार्वजनिक वस्तु है उसे हर कोई व्यक्ति अपने 
जीवन में उतारे । इसी में मानव जीवन का सार है। 

धर्म वह है कि जो यों सिखाये कि किसी को मत सताओ 
किसो का शोषण मत करो तथा किसी के साथ अन्याय, 


. अत्याचार और दुंव्येवहार मत करो । पर सबको अपनी 
.. आत्मा के तुल्य समझो । 


* घ्म वह होता है जो आत्म शुद्धि आत्म शोचन व आत्म 
परिमाजन की ओर जन-जन को उन्मुख करे । जिंस 
किसी. साधन से आत्म शोधन हो वह निविवाद रूप से 


१०७ 


१०. 
११. 
श्र: 


१३. 


१४. 


धर्म के रूप में सहर्ष अंगीकार है । - 


, सत्य अहिंसामय जो धर्म है वह सबका है। 
, धर्म विह्व मैत्री की भव्य भित्ति पर टिका हु्ना है । 


वह अपने बन्धुओं, मित्रों भर पड़ोसियों के साथ ही प्रेम 
करना नहीं सिखाता, वह प्राणी मात्र के प्रति विशुद्ध 
प्रेम करना सिखाता है। 

अपने आपको पहचानने का तरीका धर्म है । 

धर्म वह है जिसके स्मरण मात्र से शान्ति मिलती है। 
जीवन में सत्य, शील और दया होनी चाहिये । उनसे 
आत्मा उज्ज्वल बनती है | यही धर्म है। .. 

धर्म तो वह विज्ञाल तथा निर्धधन्द राजमार्ग है जो अपने 


: “ धर चलने वाले को शान्ति और सुख की स्पृहणीय मंजिल 


तक पहुंचाता है । ५ 5 के । 
धरम हर समय किया जा सकता है इसका प्रतिफल तत्काल 
नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। धर्म का वास्तविक फल 
तो धर्म करते ही मिल जाता है। धामिक क्रिया करने 


:.. . बोले की आत्मा उज्ज्वल बनी । बुरी क्रिया करने वाले 
: की आत्मा बुरी बनी, यही तो वास्तविक फल हैं। 


१५. 


धर्म न तो इस लोक को सुधारने के लिए करना चाहिये 
और न परलोक सुधारने के लिए ही | वह तो केवल 


:... कर्मों की भिर्जेरा के लिए--आत्मा को निर्मल 'करने के 


१ 


७ 


लिए करना चाहिये ।....:. । ह 
धर्म का त/त्पये है--सोचो और जीवन में उतारी | 


में ऐसा. नहीं चांह्ता, जो केवल विचारों तक हैं 


0 


श्प 


१६. 


२०. 


२१. 


२२. 


* २४. 


सीमित रहे । मैं तो ऐसा धर्म चाहता हूँ जो प्रतिदिन 
के जीवन में उत्तरे और जिसके द्वारा व्यवहार और विचार 
के बीच आई हुई खाई को पाटा जा सके +॥ 

धर्म की बुनियाद है मैत्री, बन्धुता, जो कि सत्य, शील, 
सनन्‍्तोष, सहिष्णुता आदि सदुगुणों से आगे बढ़ती है। 


धर्म वह है जिसके प्रयोग से किसी भी प्राणी को कष्ट 


न होता हो । 

वस्तुतः सच्चा धर्म वही है जो जीवन में उतरा हो। 
धर्म वह है जो त्रेकालिक है। आज जो धर्म है वह कल 
अधर्म बन जाए और ञआ्राज जो अधर्म है वह कल धर्म 
बन जाए, मेरे विचारों में वह धर्म नहीं होगा । धर्म, 
धर्म ही था, धर्म ही है और धर्म ही रहेगा । 

युग धर्म वह है, जो जन-जन को प्रेरणा देता रहे, जन- 
जन को खुराक देता रहे । 


. धर्म .वह वस्तु है जो व्यक्ति के जीवन को विकसित 
' करती है । ह 


जिस प्रकार फसल के लिए पानी और बीज की आव- 
श्यकता होती है, उसी प्रकार धर्माराधना अहिसा और 


. सत्य पर आधारित है । 
श्र 


धर्मं- का सत्य स्वरूप बाहरी प्रदर्शन और दिखावे में 


. नहीं -है । वह तो जीवन में सत्य, शौच, शील, विनय, 


र्‌६. 


सदभाव और. मैत्री जैसे सदुगुरणों की संकलना में है। : - 
जिससे आत्मा- उज्ज्वल' तथा पवित्र बनती है - वेह 
धर्म है । प् ह ७ 


१०६ 


१०. 
११. 
१२. 


१३: 


१४. 


:.. . बोले की आत्मा उज्ज्वल बनी । बुरी क्रिया के 


धर्म के रूप में सहर्ष अ्ंगीकार है । 


, सत्य अहिंसामय जो घर्म है वह सबका है। 
धर्म विश्व मैत्री की भव्य भित्ति पर टिका हुम्ना है । 


वह अपने बन्चुओं, मित्रों और पड़ोसियों के साथ ही प्रेम 
करना नहीं सिखाता, वह प्राणी मात्र के प्रति विशुद्ध - 
प्रेम करना सिखाता है । 

अपने आपको पहचानने का. तरीका धर्म है । 
धर्म वह है जिसके स्मरण मात्र से शान्ति मिलती है। 
जीवन में सत्य, शील और दया होनी चाहिये । उनसे 
आत्मा उज्ज्वल बनती है | यही धर्म है। .. हि है. 
धर्म तो वह विज्ञाल तथा निरद्वन्द राजमार्ग है जो भपते 


८“ धर चलने वाले को शान्ति और सुख की स्पृहणीय मंजिल 


तक पहुंचाता है । 08 का, उमर ह 
धर्म हर संमय किया जा सकता है इसका प्रतिफल तत्काल 
नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। धर्म का वास्तविक फल 


तो धर्म करते ही मिल जाता है।' धामिक पे ' 
वा 


: की आत्मा बुरी बनी, यही तो वास्तविक फर्ल है । 


१५- 


/. धर्म न तो इस लोक को सुधारने के लिए करना चाहिये. 


और न परलोक सुधारने के लिए ही । वह तो केवल 


,. ,'कंमों की निर्जरा के लिए-आत्मा को निर्मल करने 


१७. 


लिए करना चाहिये । आम] 
धर्म का तात्पर्य है-- सोचो और .जीवन में उतोरो.] 
में ऐसा धर्म नहीं चाहता, जो केवल विचारों तक हैं 


कं 


१ 


२०. 
२१. 


सीमित रहे । मैं तो ऐसा धर्म चाहता हूँ जो प्रतिदिन 
के जीवन में उतरे और जिसके द्वारा व्यवहार और विचार 
के बीच आई हुई खाई को पाटा जा सके । 

धर्म की बुनियाद है मैत्री, बन्धुता, जो कि सत्य, शील,. 
सनन्‍्तोष, सहिष्णुता आदि सदुगुणों से आगे बढ़ती है। 


. धर्म वह है जिसके प्रयोग से किसी भी प्राणी को कष्ट 


न होता हो । 


_बस्तुतः सच्चा धर्म वही है जो जीवन में उतरा हो । 


धर्म वह है जो त्रेकालिक है। श्राज जो धर्म है वह कल ह 
अधर्म बन जाए और आज जो अधर्म है वह कल धर्म 


* बन जाए, मेरे विचारों में वह धर्म नहीं होगा । धर्म, 


२२. 
२३. 


२४. 


ररः 


धर्म ही था, धर्म ही है और धर्म ही रहेगा । 

युग धर्म वह है, जो जन-जन को प्रेरणा देता रहे, जन- 
जन को खुराक देता रहे । 

धर्म .वह वस्तु है जो व्यक्ति के जीवन को विकसित 

करती है । 

जिस प्रकार फसल के लिए पानी और बीज की आव- 

इयकता होती है, उसी प्रकार धर्माराधना अहिसा और 
सत्य पर आधारित है । ह 

धर्म का सत्य स्वरूप बाहरी प्रदर्शन और दिखावे में 


. नहीं -है । वह तो जीवन में सत्य, शौच, शील, विनय, 


... सदभाव और. मैत्री जैसे सदगुणों की संकलना में है। ' ' 
र्‌९- 


जिससे आत्मा- उज्ज्वल तथा पवित्र बनती है -- वह 
घम है । 


१०६ 


गा 


मैं तो उसी-धर्म का प्रच्नार व प्रसार करने में संलग्न . ; 


हैँ जो तरस्त, दुःखी व व्याकुल. मानव जीवन को आत्मिक | 
सुख, शान्ति व सौजन्य की ओर मोड़ने वाला है, जो 


नारकीय धरातल पर पड़े जन-जीवन को स्वर्गीय धरातल. 


“की ओर ले जाने वाला है.। 


र्‌प. 


२€. 


जिस साधन से आवरणायुक्त आत्म स्वभाव निरावरण 
बने वह धम्ं है । 


धर्म चर्चा का विषय नहीं है । वह आचरण. का विषय : 
है और उसका आचरण वही मनुष्य कर सकता है. जिसका 


४” हृदय सरल हो, निष्कपट हो.। 


३०. 


* ३१ 
३२. 
३३५ 


३४. 


जिस प्रकार चिंत्र का मनुंष्य जरा:भी हल-चल तहीं कर 


संकता उसी प्रकार वह धर्म भी पंग्रु है जो बुराईयो का 


प्रतिकार नहीं कर सकता । 


: स्वयं को तथा दूसरों को भी उंच्नेत, पवित्र भर स्मार्गी. 


बनाना धर्म कार्य है । ह 

जिस धर्म से इस जन्म का सुधार नहीं, हो, कैवल उन 
जन्म का हो, वह अधूरा है।. .. : 

धर्म इस जन्म को उन्नत बनाने. में समर्थ -है, उससे परलोक 
कभी नहीं बिंगड़ सकता ।, . . ह 

धर्म वह है जिसकी साथ्रना में. किसी को कोई रोक-टोक 


नहीं हो उसका आ्राधार विश्व, बन्छ॒त्व..होता है; 


: धर्म हृदय परिवर्तेन का मार्ग है जो विश्व-की समस्याश्रों : 


के समाधान के लिए नहीं, ,बल्कि. जीवन को- शुद्ध 


: . पवित्र बनाने के लिए होता है । 


११० 


३९. 


३७ 


धर्म के ऊंचे सिद्धान्त जब तक जीवन में नहीं उंतरते, 
तब तक केवल उसका नाम रटने से कुछ बनने का नहीं । 


“शरीरु की स्वच्छता के लिए जैसे पानी और साबुन की * * 


जरूरत होती है, उसी तरह जीवन की स्वच्छता के 


- लिए (अन्तरतम के परिमार्जन के लिए) धर्म कीःआव-. - 


. इयकता है। 


ह ३८. 


३९, 
४०. 


4 


न 


४२. 
४३. 
४४. 


डेप. 


४६. 


“धर्म-का मूल समता है.। वह मानव मानव के बीच में 


ही नहीं प्राणी मात्र के साथ होनी चाहिये | * 
धर्म की प्रतिष्ठा धामिक प्रवृत्तियों से ही बंन सकंती है.॥ .. 
धर्म केवल निवृत्ति नहीं है। निबृत्ति के साथ निवृत्ति- 


 मूलक प्रवृत्ति का भी वहां स्थान है। बुराईयों से निदृत्ति - ' 
है तो भलाइयों में प्रवृत्ति भी । । 


. जीवन को विकारों और बुराईयीं से बचा कर" भलाई 


की ओर ले जाना धर्म का अ्भिप्रेत है । 


धर्मः आडम्बर में नहीं है वह तो जीवन की सावना में है, ' 


आत्मा को मांजने में है । 


घर्स साधना. में अपने मन को रमा. देने वाले अन्तरंतम . 
में. वह: चिनगारी प्रेदा.: हो जाती: है जी: हर दम- उसे 
कुमार्ग से बचने. के लिए सजग और उद्बुद्ध रखती है । 
सबसे :अंच्छा धर्म: वही है. जो. धर्मातनुयायियों -के * जीवन- 
में अहिसा और सत्य की व्याप्ति लाएँ 

धर्म का. उद्दे् जीवन .को विकसिंत-करना- है श्रत: वह 
सब जगह सबके लिए एक है। रु 
धर्म रूढ़ि नहीं किन्तु वास्तविकःसंत्य है।.. .. 


,. शह१ 


४७. 


एप. 


४६. 


भर, 


भर. 


२३- 


प्र्ड. 


श्र. 


श्श्र 


घर्म हृदय परिवर्तन की अपेक्षा: रखता. है, विवशता 
का नहीं । । ह की 5 
जहां सांसारिक संघर्ष से घबड़ा कर भोग, लालसा वे. 
निराशा से अभिभूत होकर आत्महत्या करता घोर पाप 


है । वहां आत्म शुद्धि. के लिए अत्यन्त समाधिपवेक _ 
गे 


बे 
+ 


हंसते-हंसते प्राणों का बलिदान करना महान धर्म: 
धर्म करने का समय केवल पर्युषण ही नहीं, जीवनका .. 
प्रत्येक क्षण है । ह | 


| थदि धर्म का आचरण किया जाये तो वह विश्व को 


सुखी करने के लिए सर्व शक्तिमान है, और यदि धर्म 
का आचरण न किया जाय तो वह कुछ भी नहीं 


कर सकता । 


धर्मे के नाम पर फैली हुई बुराईयों को मिटाना झाव-.. 
इयक हैं न कि धर्म को । । 
धर्म समाज को व्यक्तिवादी दृष्टिकोरा देता है यह कहने 
वाले उसकी सीमा को हँष्टि से ओभल किये देते हैं । 
धर्म ध्वंस की नहीं, निर्माण कीं दिशा देता है | निर्माण 
ही तो जीवन की सच्ची शक्ति, स्फूर्ति सौन्दर्य और 
सौष्ठव है । बा ह 
धर्म जुदे-जुदे व्यक्तियों को सुई की तरह मेत्री, सौजस्य 
और समता के धागे: द्वारा जोड़ने का जरिया है । 

धर्म व्यक्ति की आध्यात्मिक अपेक्षा या स्वभाव की ओर 
गति है | वह इतनी सहज है कि उंससे सर्वती भावेन 
कोई विमु्ख नहीं हो .सकता । हे. कक अप क । 


५६. 


, शछ. 


आज धर्म को धर्म स्थान की चीज नहों, जीवंन की 
चीज बनायें । उसे जीवन के हर क्षण में उत्तारें । फिर 


न. साम्यवाद का डर रहेगा और .न- किसी अन्यवाद 


का ही। 
गगों को चाहिये कि वे धर्म को अपने जीवन की एक 
आवश्यक वस्तु समभें। वह जीवन सुधार का एक उत्सकृष्ट- 


. त्म साधन है । 


| भप, 


५९. 


धर्म जीवन की सम्पति है, जीवन की सफलता है और 
जीवन को संयत बनाने, जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का 
साधने है । - 


आज के लोग धर्म स्थान में जितना धार्मिक ख्याल रखते 


: हैं वेसा ही ख्याल हर समय रखें तो धर्म उनके आाच- 


६१. 
धर 


हु 


. रण में आयेगा। उससे उन्हें शान्ति मिलेगी, सुख मिलेगा। 
हे 


धर्म का सम्बन्ध शरीर रक्षा के साथ न होकर आत्म 
रक्षा के साथ जुड़ा हुआ है । 


दोष धर्म में नहीं; प्रयोग और प्रक्रिया में है । 


धर्म मानव को वास्तविक मार्ग बताता है। वह लोगों 
को ईर्ष्या, ढेष, कलह, आक्षेप आदि के लिए कभी प्रेरित 
नहीं करता । 


धर्म जीवन के सभी भागों में उपयोगी है । कहीं वह 
अवरोधक, कहीं उत्तेजक और कहीं वह व्यापक रूप से 
उपयोग प्रस्तुत करता है। बुरे कर्मों के लिए अवरोधक 
है, सत्कार्यों में वह उत्तेजक है, विश्वशान्ति के -उपयोग 
प्रस्तुत करता है । 


शक 


६४. 


६६० 


६७. 
द््प- 


७१- 


छ३- 


धर्म जीवन में उतारने का- तत्त्व है। उसे जितना ही उतारा. 


जाय -उत्तना ही कल्याणकारी है । 


धर्म की विजय केवल उद्घोषों से नहीं होती, उसकी. 
विजय होगी नैतिक आचरणों से, सदाचारी बनने से । 
जैसे प्रकाश दीपक से प्रथंक्‌ नहीं हो सकता, उप्णाता | 
अग्नि से भिन्न नहीं हो सकती,. उसी प्रकार ही धर्म . 
व्यक्ति की आत्मा से अलग नहीं हो सकता पर आ्राइचय 
की बात तो यह है कि. व्यक्ति उसकी प्राप्ति के लिए 
अन्तर को न मांक कर बहिमुंखी बनता है 

धर्म पुस्तकों की या केवल सुन लेने की -चीज नहीं है 
बल्कि व्यवहार में. अपनाने की च्रीज है । 


व्यक्ति को मिटाया जा सकता है पर किसी के हदें से. 
धर्म को बलात्‌ नहीं हटाया जा सकता । 


आपने यदि धर्म को भूला दिया तो आप अवरय खतरे 


में हो जायेंगे । 


, जीवन में हवा, पानी और खुराक की तरह धर्म की भी 


आवश्यकता, है । कि का 
धरम की वास्तविक आराधना उसके प्रादर्शों- को , जीवन 
में ढालने में है । । लक,» कि 

धर्म अपनी मर्यादा से दूर .हट कर राज्य की सत्ता में 
बुंलमिल, कर विष. से भी अश्विक घातक बंत जाता हैं ! 


. धर्म वहीं कुठित होता है जहां कि धार्मिक व्यक्ति धर्म 


की अपेक्षा मतवादों की प्रतिष्ठा, का अंधिक ख्याल, 
लग जाते हैं । हा 8 


|. १९४ 


७४. 


धर्म भी घातक बन जाता है, जब उसमें कोॉमवासना 


' और लालसा का सन्निपात हो जाता है। 


७ए. 


0 


9७. 


छ्प. 
७६. 


है 
हक 


सर 


'जहां- तलवार चले, वहां धर्म होना मान लेना, धर्म के- 


वास्तविक अर्थ को नहीं समभने का सूचक है.। .. 
सदाचरण धर्म का प्रथम सोपान है । 


धर्म की सच्ची आराधना अपने आचरण और व्यवहार 
को शुद्ध और परिमार्जित बनाने में है । 


धर्म का अर्थ है--स्वसन्धान करना । 
धर्म का साधन तो त्याग है, तपस्या है, साधना है। 
धन से धर्म नहीं खरीदा जा सकता । 


केवल रूढ़ि धर्म नहीं है। समय बदल रहा है । धर्म 


का वास्तविक रूप क्‍या है ? इसे पहिचानो । 
धर्म का वास्तविक रूप सदाचरण है। जिनको उपेक्षा कर 


: अपने को धर्मोपासक कहने वाला धर्म की और अपनें 


पर. 


८३, 


पड. 


पर. 


आपकी विडम्बना करता है । 
धर्म लड़ाना नहीं सिखाता । वह तो मैत्री, बन्धुता और 
भाइचारे की सीख देता है । 
धर्म को जो संघ, कलह और वेमनस्य का साधन बना 
लेते हैं वास्तव में धर्म के नाम पर वे अधर्म को पोषण 


देते हैं । 


धर्म की सच्ची उपासना तदनुकुल जीवंन बनाने में है । 
धर्म न तो खान से निकलता है और न वह वाड़ो में पदा 
होता है । वह न गोदाम में रखा जाता है और न मेंजूषा 


: मैं ही, न वह बाजार में मिलता है और न घर में ही । 


११५ 


प्‌. 


59 


१. त्याग धंमम है, भोग अ्रथर्म । सरलता धै्म है, 


उसका एकमात्र स्थान शुद्ध पवित्र आत्मा है। 2 
धर्म तो वह है जिसके श्राचरण से जीवन पवित्र बने। . . 


: बलात्कार में धर्म नहीं है । यदि बलावू में धर्म होता. | 


तो सबसे .बड़ी धामिक पुलिस बनती । 


घरम-अधम 


कुटिलत | 
अधम । ० व 


: जबरदस्ती या श्राथिक प्रलोभने से चोर की चोरीः हिंसख 
| की हिसा, व्यभिचारी का व्यभिचार द्र करना : ध्ध्म 


प्रचार” करना न कहा जाकर “अर्म प्रचार” की कक्षा 


में भ्रा जाता है और अन्त में वही: अश्रशाच्ति या युद्ध का. 


कारण बन जाता है । 


, जहां आशक्ति के फलस्वरूप बलवानों को पोषण भौर 
-अमेत्री के फलस्वरूप दुबलों का शोषण होता है. वहीँ 


धर्म माना जाये तो फिर अबर्म की क्या परिभाषा होगी 
और किस प्रकार अधर्म का अस्तित्व जाना जायेगा :. 


: कहने को  धम, और करते को पाप यह धर्म नीति को, 


मान्य नहीं है । 


. धर्म का .उद्गम स्थल, प्राणीं की आ्रात्मा है. ।. झ्रधर्म का 


ना 


ल्ध्प 


उत्पत्ति स्थान भी वही है । जिस प्रकार प्रदीप से उज्ज्वल 


. प्रकाश और. कृष्ण कज्जल द्वोनों, ही निष्पन्न होते हैं 


उसी प्रकार ही अंत्मा की सतृ-असंत्‌ प्रवृत्तियों' द्वारों 
धर्मे-अधर्म । 


. मानव द्ारीर में दानव की आत्मा उतनी खतरनाक नहीं 


होती जितनी खतरनाक धर्म की पोशाक में अधर्म की 
पूजा होती है.। | 


मु था ९-3 
घर और नाति 


: धर्म की बुनियाद है मेत्री और बन्धघुता । उसमें जाति- 


पांति, वर्ग-वर्णा का भेद नहीं हो सकता । 


धर्म का द्वार सबके लिए खुला है। उसमें स्त्री--पुरुष, 
- महाजन--हरिजन, सेठ--नौकर, पू जीपति-श्रमिके को 


भेद नहीं हो सकता । 


“धर्म उसी का है जो उसकी आराधना करे । धर्म की 
मर्यादा में जाति, रंग, देश, स्पृश्य--अस्पृश्य आदि का 


: कोई भी भेद नहीं हो संकता । 


ह 


धर्म का आधार जाति, रंग आदि से परे विश्व वन्दुत्व 


होती है । कि 


५. धर्म का तत्त्व लिंग, जाति आदि वाह्य सीमाओं से परे 


११७: 


न्प्ण 
कक 


मनुष्य की आन्तरिक शुद्धि पर निर्भर हैं। 


- धर्म सत्य स्वरूप एक है। सम्प्रदाय, जाति या कौम उसे 


बांध नहीं सकते |. 


कस ० अन्‍्क की 


धर्म और घने 


पैसों से धर्म होता ही नहीं है । धर्म करना है तो जीवन 


को त्यागं-तपस्या के मार्ग में लगा दीजिये । 


: अर्थ के द्वारा धर्म को नहीं पकेड़ा जा सकता । धर्म तो 


तभी आ सकता है जब हम मानव जीवन के तत्त्वों को 
अपने व्यवहार में लाएं । 


धर्म के लिए धन की भी आवश्यकता नहीं होंती. हट 


४. धन जहां जड़ है वहां धर्म आत्मा की वस्तु है।. 


: वास्तव में धर्म साधना में है | आाडम्बर, स्वार्थ-सावना 


तथा धन में नहीं । 


कु 


. धर्म आत्मा की चीज है, आत्मा से होता है । यदि धर्म 


में घन की आवश्यकता हो तो- उसे फिर धनवान ही 


कर सकेंगे, गरीबों के लिए उसमें स्थान नहीं रहेगा । 
धर्म में धन की कोई आवश्यकता नहीं |. 


अखिीीत कि सन लता *े 


श्श्दः 


धर्म भौर धर्मस्थान 


, धर्म नाश की आशंका को उत्पन्न होने का अवकाश 
इसलिए मिलता है कि उसे आप जीवन से बाहर कहीं 
ढूढ़ते हैं अथवा आपने सोच रखा है कि धर्म मन्दिर, 
. मस्जिद, गिरजाघर और क्रिया-कांडों में ही है. अतः 
- उत्तके मिटते ही धर्म मिट जायेगा। 

, धर्म मन्दिरों, मस्जिदों, गिरजों, धर्मस्थानों में नहीं है । 
वह तो प्रत्येक व्यक्ति की अन्तरात्मा में सन्चहित है। 
धर्म सिर्फ तीर्थ, मन्दिर और सन्तों के इद-गिर्दे ही रहने 
वाली वस्तु नहीं, वह आत्मीय तत्त्व है हर कहीं हो 
सकता है.। मन्दिर में जाने, सन्‍्तों. के दर्शन कर लेने 
और गंगा में गोता लगाने मात्र से. ही धर्म नहीं हुआ करता । 
ये सब तो सिर्फ उपासना के बाह्य और थोये रूप हो 
सकते हैं । 


. »४, हमें धर्म का सिहनाद करना है पर. उस धर्म का नहीं, 


५. जिसका अस्तित्त्व केवल धर्मस्थानों और मन्दिरों तक ही 
: » सीमित है ॥. न 


१६६ 


. धर्मस्थानों में. आकर दर्शन और अध्यात्म की बड़ी-बड़ी 


कि को सुलभाए और दुकान पर बैठ कर असहाय 
व्यक्तियों के गलों पर छुरी चलाए। वह कैसा धामिक ? 


* पूजा आदि परम्पराओं को पालना मात्र धर्म नहीं है । 


धर्म का श्रर्थ है नेतिक आचरण । 


. केवल मन्दिरों में जाने मात्र से, साधुशों के दर्शन मात्र 


से, तीर्थ स्थानों में चक्कर लगाने मात्र से क्या बनेगा, यदि 
धर्म के मूल आद्शों को जीवन में प्रश्नय ने दिया जाय । 


. मैं यह नहीं चाहता कि मनुष्य धर्मस्थान में आकर तो 


“बाोमिक बन जाये और व्यवहार के. समय “उसे बिलकुल 


ही भुलादे | . 


हे ऐसे धर्मस्थानों में मेरा विश्वास नहीं, जहां बाहर तो 


धर्मस्थान का साइनबोड लगा हो और भीतरं खून खराबी 


होती रहती हो । धर्मस्थान उसी समय तक नंन्‍्दनवन 


- है जंब तक उस स्थान पर धार्मिक क्रिया चलती हो, 


३२० 


त्यथा हम उसे नन्‍्दनवन नहीं कह सकते । : 





- घर्म यो? शननीवि -: 


« धर्म नीति का प्रभाव राजनीति पर प्रवश्य रहे, किन्तु 
वह उसमें घुले मिले नहीं । जब 'धर्म नीति अपनी इस 


मर्यादा को लांघ कर राजनीति में घुल मिले -जांती है, 


ही 


तब उसका दुरुपयोग होने लगता है । फलत: धर्म नीति 


और राजनीति दोनों हो घातक एवं खतरनाक बन 
जाती है। 


धर्म और राजनीति एक नहीं है । जहां इन दोनों को 


एक कर दिया जाता है वहां धर्म, धर्म न रह कर स्वार्थ- 
सिद्धि का एक जरिया बन जाता है । यह अवश्य है कि 
राजनीति अपने विशुद्धिकरण के लिए धर्म से प्रेरणा 
लेती रहे । फिर राजनीति में अन्याय, शोषण, ज्यादती, 
बेईमानी और धोखेबाजी जैसे दानवीय दुगु ण नहीं रहेंगे। 
वही राजनीति संसार को शान्ति की श्रोर बढ़ाने 
वाली होगो । 


धर्म अन्याय को नहों सह सकता, वेसे ही राजनीति भी । 


पर इत दोनों में अन्तर यही हैं कि धर्म अन्याय को हृदय 
की शुद्धि से निवृत्त करता है और राजनीति में सभी 
सम्भव उपायों का प्रयोग करता उचित माना गया है। 
अतः धर्म और राजनीति दो पृथक्‌ वस्तुएं हैं । 


. यदि बलपूर्वक प्रवृत्ति से भी धर्म हो जाय, तो फिर 


राजनीति ही धर्म नीति हो जायेगी । 


« संयम आत्म साधना के आध्यात्मिक मार्ग में जितना 


आवश्यक और कल्याणकारी है, उतना समाजनीति और 
राजनीति में भी है । 


धर्म राजनीति के नियंत्रण में कभी नहीं रह सकता । 


बस 


१२६ 


१ 


धर्म और समाते 


धर्म यद्यपि आत्म-शुद्धि के लिए है, फिर भी काफी दूर तक 
उससे समाज का कल्याण होता है । इसलिए वह उससे 


_ सर्वथा असम्बन्ध नहीं रहता । 


१4 


श्र्र्‌ 


धर्म--करच ठय 


जो धर्म है, वह कत्तंव्य है और जो कर्तव्य है, वह धर्म 
है भी और नहीं भी । 


- कैसेव्य धरम हुं यह भो हम कह सक पर वह कत्तव्य 


आत्म-विकास का साथन होना चाहिये । 


- जो: कत्तंव्य प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक जाति के भौतिक: स्वार्थों 


से सम्बन्बवित है और प्रत्येक परिस्थिति में परिवर्तन शील 
है, वह धर्म नहीं । 
धर्म और समाज का सामंजस्य होना अत्यन्त श्रपेक्षित है । 


धर्म की गवलेलना 


१. सचमुच में यह सही तथ्य है कि धर्म की अध्वूरी समझ 
और अयोग्य धर्माधिकारों ने संसार में धर्म को बद- 
नाम किया । | 

२. धर्म की अवहेलना होने का कारण भी यही है कि धर्म 
को जेसा चाहा वैसा बना लिया गया । 

३. धर्म की अवहेलना जो हुई वह अधिकांश धर्मगुरुओं के 
द्वारा ही हुई है | धर्म बतलाया बहुत ऊंचा, मगर उसको 
ग्र।चार में नहीं लाया गया । ह 

४. जिस धर्म की श्युखला के पीछे सत्य व अहिंसा नहीं, . 
वह धर्म-धर्म नहीं ढोंग है । धर्म के नाम पर धोखा 
व पाखंण्ड हैं। शक 

५. धर्म के विषय में आज लोगों की सबसे बड़ी जो मूल. 
हो रही है वह यह है कि धर्म को अपना उपंकारी समझ 
कर उसे कोई बंधांई दे यो ने दे परल्तु दुंत्कार उसे सबसे 
पहले दी जाती है । ४५ 


। 


प्स३रः 


१०. 


११. 


१२: 
१३. 


१४. 
१५. 


१२४ 


: धर्म के नाम पर होने वाली पूजी के खर्च व आढ- 


म्बर -ये ही धर्म के प्रति अश्रद्धा का सही: कारण बन 


रहे हैं । 


- भौतिक सुख आत्मा का स्वभाव नहीं है, इसलिए वह 


न तो धर्म है और न धर्म का साध्यं ही । इसलिए उसकी 
सिद्धि के लिए धर्म करना उद्देश्य के प्रतिकूल हो 
जाता है । ह 


. सत्य सिद्धान्तों एवं विचारों के प्रचार के लिए भी जो 


कलह, युद्ध या प्राण नाशकारी ज्ञास्त्रादिक का प्रयोग 
करता है वह निश्चय ही धर्म को उच्च॒स्थान से गिराने 
वाला और संसार शान्ति को भंग और विनाश करने 


वाला होता है । 


. मेरी हृष्टि में वह धर्म ही नहीं है जो अ्रगले जन्म को 


सुधारने के लिए इस जीवन को संक्लिष्ट बनाये, विगाड़े। 


'वस्तुतः धर्म की कसौटी अ्रगला जीवन नहीं यही जीवन है। 


धर्म का आधार अहिसा और सत्य है । जहां इनका 
व्याघात है वहां धर्म कसा ? 

धर्म आत्म वृत्तियों को सुधारने में है । केवल वाह्म 
परम्पराएं और स्वार्थ पोषण में नहीं । 

जहां आसक्ति है, अमेत्री है वहां धर्म नहीं । 

जहां तलवार चले, वहां धर्म होना मान लेना; धर्म के 
वास्तविक अर्थ को नहीं समभने का सूचक है । 
निबल की रक्षा के लिए सबल को मार देना धर्म नहीं है । 
जहां कोई मनुष्य अधामिक को भी विवश्ञ करके धार्मिक 


+ बात 


न 


बनाने की चेष्टा करता है वह धर्म नहीं । 


धर्म तो मनुष्य को मिलना सिखाता है, मनुष्य को आपस 


में लड़ाये वह धर्म नहीं । 


क्नअ  क.____+ 


घधम-पाप 


« वह कार्य जो साथु के लिए पाप होता है श्रावक के लिए 


धर्म नहीं हो सकता । 


. साधु और ग्ृहस्थ का धर्म अलग-अलग नहीं हो सकता । 


वह एक है । साथु उसे पूर्णरूपेश अपनाते हैं तो गृहस्थ 
उसे आंशिक-यथाशक्ति जीवन में उतारते हैं । ह 


><>र देश घयचच+ 


घामिक 


* पर्मनिष्ठ व्यक्तियों को यह चिंता करने की अपेक्षा नहीं 


कि उनकी संख्या कितनी है । उनके लिए सबसे अधिक 
चिन्ता करने और सोचने का विषय यह है कि वे अपने 
जीवन को टटोलते रहें कि उनका आचरण उच्च बन 
रहा है या नहीं । वे कहीं अ्बःपतन की ओर तो नहीं 


'जा रहे हैं । 


२२ 


२. धर्म जीवने में रहे । जीवन के प्रत्येक कार्य में धर्म की 
पुट रहे; _यह आज के मानव के लिए आवश्यक है । 

३. धामिक किसी को मिटाने क्री नहीं सोचता उसका लक्ष्य 

, होता है दुरुपयोग का अन्त करना । 

४. फूटे घड़े में पाती कभी नहीं टिक सकता । उसी प्रकार 
धर्म के लिए भी पात्रता की आवश्यकता है । 

५. आय-व्यय के आंकड़े मिलानां जांगरूक व्यापारी के लिए 
जितना आवश्यक है उतना ही धामिक के लिए जीवन 
के गुण, दोषों का पर्यालोचन करना । 





6 
य्त 


५ 


१. प्रारंभिक स्थिति को घैर्य से पार करने पर आगे का 
पथ सरलता से पार किंयां जाँ सकता है । 
२. धीर और कमंठ वे हैं जो प्रतिकुल परिस्थितियों को 
रौंदं कर न्याय के मांग पर अग्रसर होते हैं । 
३. कार्य के स्थांयित्वे के लिये चिन्तन अपेक्षित है और 
... चिन्तन -के लिए धरर्य । 


न नी3०क+>-+ 


१२६ 


नय वाद 


. प्रत्येक वस्तु के अनच्त धर्म है । उनको जानने के लिए 
... अनन्त हृष्टियां हैं । प्रत्येक दृष्टि में सत्यांश है | सत्र 


ः धर्मों का वर्भक्कित रूप अखण्ड वस्तु है और सत्यांझों का 
, वर्गीकरण अखण्ड सत्य होता है-। । हु 


० 


. कोई वस्तु या कोई झब्द सही है या गलत -- इसकी 


प्रख करने के लिए एक दृष्टि की अनेक धाराएं चाहिये । 


. अखण्ड वस्तु जानी जा सकती है, किन्तु एक शब्द के 


द्वारा एक समय में कही. नहीं जा सकती । मनुष्य जो 
कुछ कहता है उसमें वस्तु के किसी एक पहलू का निरूपण 
होता है । वस्तु के जितने पहलू: हैं, उतने ही सत्य हैं । 


: जितने सत्य हैं उतने ही हृष्टा के विचार हैं । जितने 


: विचार हैं उतनी ही आाकांक्षाएं हैं, जितनी आकांक्षाएं 


हैं उतने ही कहने के तरीके हैं, जितने कहने के तरीके 


- हैं, उतने ही मतवाद हैं, मतवाद एक केन्द्र बिन्दु हैं । 


5 


एक से अनेक के सम्बन्ध जुड़ते हैं । सत्य असत्य के प्रश्न 


१२७ 


खड़े होने लगते है, यहीं से विचारों का स्रोत दो धाराओं . 
में बह चलता है। अनेकान्त या सतृएकान्त हृष्टि- . 
अहिसा, असत्य, एकान्तदृष्टि-- हिसा' । 





नये-- पृथने 


१. अ्रति पुराणपंथी गतिहीन और जड़ होते हैं । वहां श्रति 
उदार पंथी उतावले होकर काम को बिगाड़ देते हैं। - 

२. नये और पुराने की भेद रेखा अनुभव ही तो है। केवल 

: ज्ञान नहीं अनुभव भी चाहिए | ' 

३. एक मार्ग पर चलने का दुराग्रह रूढ़िवाद है। एक पथ 
चलते चलते अगर दूसरा पथ आकर मिल जाय और वह 
सुगम व सफल पथ हो तो उसे अवश्य ही अपना 
लेना चाहिए । 


न आकलन भा 


नश्क-ख्गे 


१. जहां कलह, ईर्ष्या, ह्वेष, बेई मानी, अभिमान और परिग्रह 
है, वहीं नरक है और जहां आतृभाव, स्नेह.और झआापसा 
प्रेम है वहीं स्व है | 

>चछ#32'2:- ७ --- 


श्र्८ 


६. 


ज्ा्यार्क 


. राष्ट्र की सबसे बड़ी सम्पत्ति वहां के सत्यनिष्ठ और 


संयमशील नागरिक होते हैं । 


. नागरिक वह होता है जो नागरिकता के कत्तंव्य एवं 


उत्तरदायित्व को पालता है । उसमें विवेक, चिन्तन, 
कत्तंव्य-निष्ठता एवं मैत्री-भावना का होना अत्यन्त 
आवश्यक है । 


चरित्र नागरिकता की कसौटी है, उसके अभाव में सच्चे . 


नागरिकता की कल्पना ही नहीं की जा सकती । 


आज नागरिकों के सामने बड़ी समस्या अथे की है । 


आज का नागरिक अर्थवाद की दुद्दम बेड़ियों में बुरी 
तरह जकड़ा हुआ है । परच्तु अर्थ अनर्थ का मूल है। 


. सच्चा नागरिक वही है जो अपने पर नियंत्रण और अंकुश 


रखता है । 


नागरिक जहां सामाजिक-हृष्टि से अपने उत्तरदायित्वों 
के प्रति जागरूक रहता है, धामिक-हृष्टि से भी उसके 


१२६ 


तेव्य हैं जिनका अनुवर्तत करना. उसके लिए अत्यन्त 
आवश्यक है । 


* अशुत्रता का स्तर उस सीमा को छूने वाला है कि . 


जिससे बाहर रहने वाला व्यक्ति सही भ्र्थ में मानव और . 
नागरिक नहीं कहला सकता । 


* नागरिकता की कसौटी प्रामाणिकता, सच्चाई और ईमान- 


दारी है, बाहरी आडम्बर और दिखावा नहीं । 


* नागरिक वह है जिसमें सत्य, शोच, श्रद्धा, शील और 


समता जेसे नागरिक जनोचित सदगरुण हों । 
+-+०३+०९००-- 


नारी 


- कोमलंता, करुणा, विनयशीलता और श्रनुशासनप्रियता 


नारी जाति के सहज गुण हैं । 


* नारी जाति स्वभावतः धर्मपरायण एवं श्रद्धानिष्ठं 


होंती है । 


 जाशंत नारी जहां अभ्पने जीवन का विकोस कंरती है 
वहां संसूचे- परिवार पर उसकी सात्त्विकता की छाप 


'पड़ती है । उसके आ्रादर्श जीवन का ज्योति पिड चोरों 


श्रोर अपने प्रकाश की किरणों विखेरता है । 


- सहिष्णुता, अनुझासनप्रियत्ता, लज्जाशीलता और वुराईयों 


के प्रति घृणा- भारतोय नारी के सहज गुरा हैं.। 





रैर१प 


मावक्तिकता 


, सत्य के प्रति अविश्वासी और निष्ठाहीन बनना ही तो 
नास्तिकता है । 


न्न्‍नीलुँनह 


भमियनवब्रण 


, नियस्त्रण दो प्रकार के होते हैं -- वाह्मय नियंत्रण और 
आत्म नियंत्रण, बाह्य नियंत्रण ढुःखमय होता है । उसमें 
. नियंत्रण होने पर भी आत्म-शान्ति का अनुभव नहों 
होता लेकिन आत्म-नियन्त्रण करने के बाद में शान्ति 
मिलती है । यही सुख का साधन है । धर्म भी इसी में 
है । आत्मोज्ज्वलता भो इसीमें है । 

९. नियंत्रण तीन तरह से होता है-मन-संयम, वचन-संयम 
और इन्द्रिय-संयम । 


१०, 


११. 


१३- 


३२ 


* जहां आत्मनियंत्रणा और आत्मसंयमन नहीं, मैं वहां. 


मृत्यु देखता हूँ । 


. संयत्त और आत्मनियंता जिस आत्म-तुष्टि का अनुभव 


करता है, वह असंयत के लिए कहां सुलभ हो सकती है ! 


* आत्म-संयम में जो आनन्द मिलता है वह नियंत्रण 


में नहीं । 


 आत्म-संयम का अ्रथ है --अपने द्वारा अपने लिए 


अपता नियंत्रण । 


, जीभ पर नियंत्रण किये बिना दमन का पाठ अदूरा 


रहता है । 
इच्छानियंत्रण की वेदी पर सब संघर्ष अपने आ्राप- स्वाहा 


हो जाते हैं । 


. अपनी सुख सुविधा को सर्वोपरि मान कर चलने वाला 


अपने पर नियंत्रण रख नहीं सकता । 

यदि सही श्र्थ में सुख और शान्ति की आकांक्षा है तो 
व्यक्ति-व्यक्ति आत्म संयम का अ्रभ्यास करे । आावश्य- 
कताओों को कम करे । 

व्यक्ति अपनी सहज मर्यादा से बाहर जाता है तब वाहरा 
नियंत्रण उसे झा दबाता है । 


. जिसने अपने आप पर नियंत्रण किया और आपको वश्ञ 


में किया, सचमुच उसने जीवन-शुद्धि के मार्ग में गतिशील 
कदम रखा है । 
शेशव की चज्चलता और यौवन के जोश में गति पर 


' नियंत्रण अति आवश्यक है । 


न 


"2, 0 


, लाखों रुपये देना इतना कठिन नहीं है जितना आत्म- 


वृत्तियों पर नियंत्रण करना है । 





; निर्माण 


, ध्वंस सहज है, निर्माण कठिन है | - 
, नव-निर्माण के लिए शान्ति, समन्वय और सहृदयता की 


अपेक्षा है, आपसी विरोध की नहीं । 


अपने को शनैतिक वृत्ति और दुव्येसनों में डालकर मानव 


जीवन को नष्ट न करें । वे किसी तोड़-फोड़ मूलक 


: हिसात्मक कार्य में भाग न लें । आज विध्वंस की नहीं, 


ःनन्च् 


निर्माण की आवश्यकता है । 


, जहां जोवन ओर आत्मा का निर्माण होता है, वही 


निर्माण श्रेयस्कर है । 





निष्ठा. 


| निष्ठा में “करो या मरो ” के सिवाय दूसरा, विकल्प 


नहीं होता । 


लक्ष्य की सिद्धि के लिए जिसमें मृत्यु का वर्स करने 


श्३३ 


की 'उमंग्र' हो, वह जीतां है श्रौर उसकी निष्ठा जीती है। 
३. निष्ठा ही एक ऐसी वस्तु है, जिसका अन्त नहीं होता। 
४. निष्ठा को पाना सहज बात नहीं; पर. जिम्में निष्ठा 

होती है, वह कुछ कर गुजरता है । है 
५. निष्ठा आचरण से हो सकती है, दुहााई मात्र से नहों। 





नेतिकता 


“१. नेतिकता एक ऐसा तत्त्व है जो किसी कानून के द्वारा 
नहीं; शिक्षा के द्वारा, हृदय परिवर्तन के द्वारा पनप 
सकती है । 

२२ नेतिक-समस्या एक मुख्य समस्या है । जब. तक लोगों 
का नेतिक उत्थान नहीं होगा तब तक उनका विक्रास 
अध्वूरा रहेगा । ह 

है. भारत में अनेक दुष्काल पड़े । अनेक विध कठिनाइयां 
आई । पर वे सब इतने दुःखद नहीं हुए जितना दुःखद 
आज का नेतिक दुशभिक्ष है । ! 

४. भारत में नेतिकता आज भी मरी नहीं है, वह मूच्छित 
है । यदि उसे चेतन्य संजीवनी बू टी मिले तो मैं समभता 

. हैं उसकी उज्ज्वल अतीत वंतेमान में कलक सकता है। - 

५- आध्यात्मिक भित्ति सुहृढ़ बने बिना नैतिकंता भी नहीं 

: “पनप पाती । 7. ४ 


श्ह्ेड 


ल्‍्शी 


नैतिक व्यक्तियों का संगठन जितना बलवान होगा, उतना 
हो समाज, देश और राष्ट्र का नैतिक स्तर उन्नत और 
सांस्कृतिक बनेगा । 

हमें यह नहीं सोचना है कि हमारे कार्यक्रमों में कितने 
नेता इकठ्ठे होते हैं । हमें यह भी नहीं सोचना है कि 
हमारे कार्यक्रमों की क्‍या २ प्रशंसाएं होती हैं । परन्तु 
हमें सोचना यह है कि. हमारे कार्यक्रमों से लोगों को 
क्या मिलता है और हम .नैतिक-उत्थान में कितने सहायक 
बन सकते हैं ? 


छ 





पट्तंव्र 


१. जिसे अपने स्वार्थ और तज्जन्य गुट में ही ईइवर दर्शन 
होता है, विश्व शान्ति और भलाई दीख पड़ती है, वह 
_परतन्त्र है । ह 

२. मानसिक परतन्त्रता बाहरी नियन्त्रण से आती है और 
उसके आने का हेतू है अपना असंयम । 


- >च््!पिप्फध्-+ 


१३४ 


न] 


व्यय 


6 
पद़। 


तत्त्व चिन्तन की हृष्टि से पर्दा चक्षु-दर्शन का पालिमन्धु 


(अवरोधक ) ठहरता है । 


- पर्दा ज्ञान एवं विवेक के विकास में स्पष्ट रूप से बाधक है 
« पर्दा कायरता का प्रतीक व जीवन विकास में बाधक है। 


शील की रक्षा के लिए आत्म-वल के विकास की अपेक्षा 
है, पर्दे की नहीं । 


* पर्दा आवश्यक नहीं बल्कि अनुशासित जीवन भाव 
शयक है । 





पशक्चिल 


* आरम्भ और परिग्रह-ये व्यक्ति को धर्म से दूर किये 


रहते हैं । 


१३२६ 


२. परिग्नह से विरक्त होकर अपरिमग्रह में आने के कार्य से 
जीवन का पय-पग पर सम्बन्ध है। आज जीवन-शा सत्र 
करोब-करीब अर्थशास्त्र बन गया हैं किन्तु अर्थ परिग्रह 
के त्याग से ही व्यक्ति पारमाथिक बन सकता है । 

३. वृत्तियों की अप्रमाशिकता का हेतु महा परिग्रह है। 

४. अशान्ति की जड़ परिग्रह विस्तार या अधिकार विस्तार 
की भावना है। 


५. पूजी का वेयक्तिक केन्द्रीकरण बन्धचन और परिग्रह है, 
उसी तरह राष्ट्रगत केन्द्रीकरण भी उससे परे नहीं । 
दूसरे राष्ट्रों के लिए वह ईर्ष्या का विषय बन जाता है | 
अतः इत सबसे परे होने के लिए मैं बहुधा कहा करता 
हूँ कि साम्यवाद इन सब समस्याओं का स्थायी हल 
नहीं, वरन वह सामयिक पूर्ति है । स्थायी हल तो तभी 
निकल सकेगा जब पूजी के प्रति प्रतिष्ठा भाव न रहेगा 
वरन त्याग और संयम के प्रति प्रतिष्ठा भाव रहेगा। 


पश्चिवेम 


१. परिवर्तत करना कठिन होता है, परन्तु उसके होने पर 
लोग बहुत सारी कठिनाइयों से सहज ही बच जाते हैं । 

२. मानव जीवन परिवतंत झील है | जैसे बचपन के बाद 
यौवन और यौवन के बाद बुढ़ापा आता है उसी प्रकार 


३७ 


०९ 


* परिस्थितियों का श्रृष्टा स्वयं मनुष्य होता है । 
* परिस्थितियों के आगे घुटने टेकना मानव की घोर 


सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रीय जीवन में भी परि 
वर्तन होना अनिवाय॑ है । 


: विचारों का परिवतंन ही क्रियात्मक परिवर्तन बनता है। 
: वेतमान सामाजिक सृल्यों में मौलिक परिवतंन अपेक्षित है। 
* दुनिया में परिवर्तत होता रहता है। हर चीज परिवतंन 


शील है। अ्रवस्थाञ्रों का बदलते रहना ही परिवततंन है। 


: परिवर्ततशीलता बुरी नहीं है । बिना परिवर्तन के जीवन 


निर्माण नहीं । 


*.परिवर्तन की मूल भित्ति व्यक्ति का परिवतंन है। 
- देष्टिकोश का परिवर्तन ही वास्तविक परिवतंन है और 


वह है भोग से त्याग की ओर, विलास से सादगी 
की ओर । ह 


पाशिग्रथि त्वि 


पराजय 


* परिस्थिति के बदल जाने से जीवन बर्दल जाये, यह 


. एकान्ततः सम्भव नहीं है । 


: संहार की स्थिति पैदा करने वाला कोई भी थञ्रच्छा नहीं 


। भले फिर वह असाम्यवादी हो या साम्यवादी | 


पविव्रता-भपवित्रता 


१. मुह की आवाज हृदय की आवाज हो तब वह दूसरों 
के हृदय तक पहुंच सकती है । 

२. सर्वोपरि लक्ष जो जीवन की पवित्रता है उसे श्रमुखता 
देना है, इसके बिना और कार्य सफल नहीं हो सकते । 

३. ब्रत जीवन की पवित्रता है । । 

४. पवित्रता बाहर से नहीं आती, अपवित्रता बाहर से 
आती है । 

५. आवश्यकताओं की श्रसीमा जीवन में घोर अपवित्रता 
लाती है । इसे जो नहीं सोच सकते वे विश्वास मान 
कर चलें और जो सोच सकते हैं वे श्रनुभव की कसोटी 


प्र कस कर देखें । 


हा 7-24 अं 


श्३६ 


पदुता 


१. जब पश्ुता का. उदय होता हैं तब व्यक्ति का विवेक 

. दब जाता है और उसमें भलाई को पकड़ने का सामर्थ्य 
नहीं रहता । 

. २: पाशविक शक्ति का विकास हुआ । फलत:ः महायुद्ध हुए 
अ्रशान्ति बढ़ी, कठिनाइयां बढ़ी । 

३. अनीति और अन्याय पर आधारित जीवन पाशविक 

.. जीवन से भी गया गुजरा है । 

४. जीवन की अनिवार्य आवश्यकता के बिना ही हिंसा करना 

नृशंसता है, पश्चुता है । 


४७0७४ 
4 
पढ्षाय 
2, 
१. पृरुषाथ का सहारा लेकर मनुष्य कठिन से कठिन कार्य 
को भी सरल बना सकता है। 


2४0. 


न्प्प 


>> 


न] 


. अपने पुरुषार्थ के द्वारा मनुष्य जो आंत्मं-मिन्न तत्त्व का 


आत्मा के साथ सम्पर्क कर बेठा है उनको मिटांकर परम 
विजय प्राप्त कर सकता है । ः 


: महापुरुषों की कार्य-सिद्धि उनके पुरुंषार्थ में हीं रहँती है-- 


वे बाहरी उपकरणों (सामग्रियों) की अपेक्षा नहीं. रंखते । 


+>-हनरऑिशी लए 2इाननत 


पूनीवाब--झ्ाम्यवाद 


, संसार की दो परस्पर विरोधी विचारधाराएं जो आास्तिक 


और नास्तिक, पूजीवाद और साम्यवाद के नाम से 
चल रही हैं, उन दोनों में संगम हो, समन्वय हो तो 
मानव सुख की सांस ले सकता है । 


. पूजीवाद और साम्यवाद के समन्वय का मार्ग है -- 


अहिंसा और अपरियग्रह की भावना का श्रसार | 





प्रकृति 


. प्रकृति में जो सहज सौन्दर्य होता है वंहं विक्ृति में नहीं । 
, प्रकृति से उपलब्ध सामग्री के उपयोग में मुंके जो आनन्द 


मिलता है वह कृत्रिमता में नहीं । 


श४४ 


8 


“:विक्वति. से वापस प्रकृति में आने में जोर पडता है। द 


४. मनुष्य को प्रकृति में ही रमरा करना चाहिये, चाहे 


कष्ट ही क्‍यों न उठाना पड़े । 


* विक्ृति के आवरण को हटाने से प्रकृति स्वयं रह जायेगी 


: , मिट्टी को दूर करने से स्वर्ण मूल रूप में आ जाएगा। . 


न 


६++--+-->++«__क ैंक०-०.... व. 


प्रतियोगिता 


: ९. उत्तेजना तो वहां होती है जहां प्रतियोगिता होती है। 


«बैंक >> 


प्रात्श्ोतत 


* जिसे कुछ करना है, कार्यशील बनना है उसे प्रतिश्रोत ' 


में चलना होगा । - 


* अनुश्रोत का मार्ग यद्यपि सरल है और प्रतिश्रोत का 


दुःसाध्य; फिर भी अनुश्रोत में चलने वाला सागर में 
विलीन हो जाता है और प्रतिश्रोत में चलने वाला अपने 


: .. अभीष्ट स्थान को प्राप्त कर लेता है। 





प्रमाद . 


 असावधानी प्रमाद है, प्रमाद हिसा हैं.। 

२. प्रमाद भय है, दोष है और वर्जनीय है । प्रमाद चरित्र 
को नीचे गिराता है और आत्मा का भयानक शगत्र है। 
अतः मानव अप्रमाद का सहारा लेकर प्रमाद को जीते । 
जिससे उसमें निर्भयता आयेगी और उसका आत्म-बल 
जाग उठेगा । 

« मद्यपान से प्रमाद गाता है। प्रमाद सबसे बड़ा पाप है। 
४. प्रमादी सर्वदा सभय है और अप्रमादी निर्भय । 





प्रशसा 
: प्रशंसा कांटों का ताज है । जिस व्यक्ति के सिर पर 
' यह ताज रखा जाता है, उसे बड़ा सोच संमक कर चलना 


पड़ता हहै.। 


श्ड३ 


५ 
प्रम- 


१. प्रेम के बिना विवाद का कभी अन्त नहीं होता | 
२. प्रंतिशोध की भावना पैदी किए बिना किसी को पराजित 
करने को कोई उपांय है तो वह प्रेम है। 


प्रेएणा 


१. में उस सावक, सावना और प्रगति को अधिक म 
शील मानता ह# जो केवल अंकेला ही उत्थान पथ पर 
न बढ़ता हुआ औरों को भी उस विकास और प्रगति 
की राह पर बढ़ते रहने की प्रेरणा दे। 


२. अपने को .हीन समझता भ्रात्मशक्ति को कुठित करना 
हैं । वास्तव में उनमें वह अदम्य उत्साह और अपरिमित 


शदढ 


शक्ति है, जो विकास के पथ परे आगे बढ़ने में उन्हें 
बड़ी प्रेरणा दे सकती है । 

३. चलते सब. हैं पर उनका चंलंनों चैलंनों है जों इंसरों के 
लिए पगडडी बन जाए बोलते सब हैं पंर उनका बोलना 
बोलना है. जिससे दूसरे प्रेरणा पाये । 

४. जिस मार्ग में जो स्वयं स्पष्ट होता है, वंह उसेकी प्रेरणा 
देने का अधिकारी है । 


बलातकाए 


१. बलात्कार से शरीरें पकड़ा जायेगा, पर आत्मा नहीं । 
तुम्हारा डंडा किसी तैंने की रोक सकता है पर मन को 
नहीं । तुम्हारा पैसा किसो को खरीद सकता है पर 
अधिकृत नहीं कर सकता । बलात्कार, डंडा और पेसा 
किसी को हंरां सकता हैं पर दूसरों को जीते नहीं 
“सर्कती-। 

२. सत्य सिद्धान्तों एवं विचारों के प्रचार के लिए जो भी ' 
करता है, वह निश्चय ही धर्म को उंसंके उच्च स्थान से 
गिराने वाला और संसार की शांति को भेंग औरें विनाश 
करने वाला होता है..। 

३ जबरदस्ती: या: आश्िक प्रलोभ॑न से चोर की चोरी, हिसक 


हि 2 


हिसां, व्यभिचारी का: व्यभिचार दूर करना “धर्म प्रचार 
नहीं किन्तु अ्रधर्म प्रचार” की कक्षा में ग्राता है. और 
अन्त में वही अशान्ति या युद्ध का कारण बन जाता है। 


* जिन वादों, शासन सत्ताश्रों व धर्मों का अस्तित्व और - 


प्रचार प्रतिशोध, हिसा तथा पशुबल के आधार पर होता 


: है वे संसार में चिरस्थायी एवं वास्तव्रिक शान्ति की 


स्थापना नहीं कर सकते । 


- वामिक स्वतन्त्रता का अपहरण करना या धर्माधिकारों 


पर कुठाराघात करना मनुष्य के जन्म सिद्धि अ्रधिकारों 
पर आघात करना है । 


 ब्रह्मचर्य 


« अह्मचर्य साधना का मुख्य अंग है ।- वह भोज और ग्रात्म 


तेज का प्रतिबिम्व है । इसके अ्रभाव में जीवन वास्तव 
में एक भार है । 


- अह्मचर्य-साधना के लिए यह आवश्यक है कि साधक रस 


भोगी न बने । 


- ब्रह्म में लीन रहने से जीवन में ओज और तेज रहता 


४. त्रह्मनय एक बहुत बड़ी शक्ति है । ब्रह्मचर्य का मतलत्र 


है. सब इन्द्रियों को जीत कंर-आ्रात्म रमंण-करना4 * 


पर 


80 
७. 


ह् 


व्यक्ति ऋहाचारी न बन सके फिर भी उसे व्यभिचारी 
तो कतई नहीं बनना: चाहिये । 


ब्रह्मचर्य अहिंसा का स्वात्म रमणात्मक पक्ष है।।. 


-जिस , किसी ने अपना हृष्टि-संयम, मानसिक-सन्तुलन 


और खाद्य-संयम खो दिया, आंशिक रूप में वह ब्रह्मचये 
से स्खलित हो चुका । 


जिस प्रकार मकान में दरार पड़ जाने पर यदि उसकी 


मरम्मत का खयाल नहीं किया जाता है तो वह गिर 


जाता है। इसी प्रकार यदि कोई अपने मन, वचन और 
: काया पर अंकुश नहीं रख सकता तो वह ब्रह्मचर्य की 


साधना में सफल नहीं हो सकता । 


. भीरूता ब्रह्मचर्य पालंन में बाधक है । 
. ब्रह्मचर्य और इन्द्रिय-निग्नह से खाद्य संयम पृथक्‌ 


. नहीं है । 


११. 


ब्रह्मचर्य. साधु की अपेक्षा दम्पत्ति ब्रह्मचारी को धन्यवाद 
है जो अनुकूल व उपलब्ध सुविवा को त्याग कर आगे 


आते हैं । 


ना 


बालक 


बालक, दिखने में छोटे-छोटे लगते हैं पर उनमें बहुत 
बड़ी शक्ति निहित है । आवश्यकता इस बात की हे 
कि उन्हें सही पथ-प्रदर्शन मिले । 


श्ड 


* छोटा बालक सबको प्रिग्न॑ं होता है। क्योंकि वह कत्रिमता 


से परे होता है । उसमें भ्र॒प्तत्य, व्रिव्वासधात, विषमता, : 
घृणा आदि विपरीत भाव तहीं होतेत. 


: जहां बड़े होने पर जीवन में विक्रेतियां और विकार भर 


जाने की सम्भावना रहती हैं, वहां: बाल-जीवन किसी 
भी प्रकार की कालिमा लिए' नहीं होता । 


- बचपन संस्कार जमने का सबसे अधिक उपयुक्त समग्र 


है । बचपन में जमे संस्कार जीवन भर के लिए अमिट 


होते हैं । 


 बाल-जीवन में जितने अच्छे बे संस्कार बनते हैं, उतने 


अवस्था पकने पर नहीं .बनते । 


: जन्मताः बच्चा न उद्ृण्ड होता- है, न उछ ड्खल,। जसे 


संस्कार उसे मिलते हैं, जंसे वातावरण में वह. पलता 
है. अभिभावक़ों, और अध्यापकों; का: जैसा: स्वभाव, होता 
है, बालक के: जीवन: में उसी; प्रकार के: संस्कार ढलने 
लगते है । 


* बाल-मानस कोरा कागज, ,कच्ची हांडी, सफेद कपड़ा व 
उगता हुआ पोधा है। वह इच्छानुसार लिखा जा सकता 


है, घड़ी जा सकती है, रंगा जा सकता है और मोड़ा जा 
सकता है । 


- वालक स्वभावतः बुरे नहीं होते । सच्चाई और भोलाएन 


उनके सहज गुर हैं..पर वे दूषित वातावरण प्रति- 
कुल; परिस्थिति या. बुरा: संसर्गः पाकर बुरे, बन,जाते. हैं। 





बढहाड़ें 
३ । 


१. बुराई की सीख देने वालेः स्वयं उसके परिणामों से: बच 


2 


टर 


नहीं. सकते । ह 


: लोग बुराई को शीघ्र ग्रहण करतेः हैं किन्तु भलाई को 


नहीं । इसके दो कारण हो सकते हैं :-- (१) इंबेलता 
और (२) परिस्थिति । 


. बुराई भी एक साथ नहीं आ जाती । उसका भी अभ्यास 


क्रम होता. है. पहले. भय- लगता है, दूसरी. बार संकोच, 
तीसरी बार निःसंकोचता आ जाती है और चौथी वार 


साहस बढ़ जाता है, फिर तो पाप का अभ्यास हो 


जाता है । 


« किंतना अच्छा हो, प्रत्येक बुराई के अवसर पर मनुष्य 


अपनी दिशा को उदाहरण बनाते । 


* बुराइयों की ओर बिता रूके लुढ़कने की यह वह 


फिसलन है जो व्यक्ति को अवनति के रसातल तक ले 


' -जायेंबिचा नहीं छोड़ती । 


(डर 


: बुराइयों को मिटाने के लिए संस्कार परिवर्तन या हृदय - 


परिवर्तन का प्रयास हो तो वह बुराई जड़ मूल से मिट 
सकती है । | 


बुरा काम वही है जिसे करने पर या करते समय छिपाने 


की आवश्यकता पड़े । 


* यदि मानव जीवन का आज सूक्ष्मता से पर्यवेक्षण किया 


जाये तो यह स्पष्ट प्रतीत होगा कि वह बुराइयों की 
लाइब्ररी बन गया है। 


. आज मानव बुराइयों के कारण खोखला हो रहा है, 


वह पनप नहीं. रहा है । अ्रच्छाइयों से उसने आंखे मृ द 


* रखी है । यह स्थिति भयानक है । 


१०. 


१५० 


मानव बुरा नहीं होता, बरे होते हैं उनमें आये हुए 
अवगुणा, उसमें घर बना कर रहने वाली बुराईयां । 





भक्त और भक्ति का पात्र 


. सही भक्त वही होता है जो मानव जीवन में झाचार 
-झओर विचार को अपना कर चलता है। 

. सच्चा भक्त ग्रुरु के उपदेशों पर भरोसा करता है । 

. मनुष्य भक्ति का पात्र तभी वन सकता है जबकि वहें 


क्षमा, कोमलता और कष्ट सहिष्णुता को अपनाता 


छू «८ #&< ०६ 


. असहिष्णु, कठोर हृदयी और अविनयी कभी भी: भक्ति 
- का अधिकारी नहीं बन सकता । 
. भक्ति का लक्ष्य जीवन शुद्धि, आत्म उल्लास और बंधन 


मुक्ति है । 


, वीतराग प्रंमु का ध्यान करो और अपने को उन्हीं में 


ग्रपित कर दो; यही सच्ची भंक्ति 





भय 


. जो लोग अपनी अधिकृत जनता को, दूसरों को .भग्रभीत 


करने की प्रेरणा देते हैं, वे अपने लिए भय का.,वाता- 
वरण तैयार कर रहे हैं । 


- जो आज दूसरों को भयभीत कर सकता है, वह कल 


जिसे अपना मानता हैं उसे भी भयभीत कर सकता है । 


. दृुबलता जीवन के लिए अभिशाप है। दूसरों को डराना 
हिंसा है, उसी प्रकार डरना भी हिंसा है ।.डर डरने 


वालों को ही डराता हैं । 


- भयाकुल मनुष्य उन्मुक्त आकाश में सो नहीं सकता । 
. जो प्रमादी है, उसको सब तरह का भय होता है। 
- जो अप्रमत (प्रमादी) है, उसे भय नहीं होता । 

भय वहां होता है, जहां श्रद्धा का उत्कष नहीं होता । 


श्भ्१्‌ 


: 5: छिंपना: वहां है, जहां भय है; ग्राशंका है । - 
९. भय वहां है, जहां यथार्थ के प्रतिकूल आचरंण हैं। 

'१०. भय पापी कोः है, धर्मी को: नहीं । 

११.. डरना कमजोरी और डराना करवा. है 

१२. डर वहां होता हैं जहां मूठ पलती है. 


माग्य- निर्माता 


, ४ हमारे” भाग्य को बनाने वाले और: बिगाड़ेने वले हम 
स्वयं हीः हैः ॥: 
२. मनुष्य अपने भाग्य का 'खुद निर्माता हैं।' 
- ३. मंनुष्यः अपने भाग्य का 'कंत्ता-धर्ता हैं?। 
४. मानंव सुख और: दुःख का स्वयं निर्माता हैं उसकी अ्रच्छी 
और बुरीः प्रवृत्तियां ही उसके लिए' अच्छा श्रौर बुरा 
होने का .काररणा' है?। 


१५२ 


भारतीय भ्रष्याव्म विज्ञान 


९. भारतीय अध्यात्म विज्ञान के ऊंचेपत का अनुमान झाप 
इसी से लगा सकते हैं कि जहां भौतिक विज्ञान के 
विकास की परिसमाप्ति होतो है, अध्यात्म विज्ञान वहां. 
से शुरू होता है । । । 

२. भारतीय तत्त्व ज्ञान खास कर अन्तर्ज॑ंगत को छूता है । 
उसकी दृष्टि में सच्चा विज्ञान अहिसा और समता है । 
ये ही वे साधन हैं जो जीवत में शान्ति का श्रोत 
बहाते हैं । 





- म्राएवीय चिकन 


१. भारतीय चिंतन के अनुसार जीवन की परम्परा एकमात्र 
वर्तेमान जैसी न होकर भूत व भविष्य से जुड़ी हुई है । 


श्ण्रे 


२. भारतीय चितन में जीवन का जो महत्त्व है, मरण का 
भी उससे कम नहीं, यदि बह संयमपरूर्वक हो, क्योंकि 
संयममरण आत्म-साधना की संतृप्तता का परिपालक है। 

३. भारत के पास सबसे बड़ी पूजी है, वह नीति झौर चरित्र 
की है । सिक्के की पूजों यहां जोवन का सावन मात्र 
रही है, साध्य नहीं। साध्य रहा है सन्‍्तोष और शान्ति । 


ज+-क- *ए20० 38०० 


- भाषा 
१. भाषा भावों का दोत्य या प्रतिनिधित्व करती है, वह 
भावों को दूसरे -तक पहुंचाने का जरिया है । 


मोगय 


१. शोषण और: संग्रह भोग-विलास की पूर्ति के लिए हैं। 
२. भोग द्वत्ति में जब तक न्यूनता नहीं आती तब तक नें. 
. ,.. शोषण मिटता है न संग्रह । शक 

३ भौग में सुख नहीं विष्ाद है।_ ; 


१२, र्ड 


श्र्द 


ल्‍्धी 


3 


लए 


न्प 


. जिन भोगोपभोगों की भूल-भूलेया में गुम राह बन जो व्यक्ति 


अपने को भूल जाता है वह जीवन को भूल जाता है । 
वह. भोग सामग्री मृग मरीचिका से अधिक क्या है ? 


. सामग्री के अभाव में जो कराहता रहे, वही उसे पाकर 


विलासी बन जाये यह उचित नहीं । 


. वास्तव में भोग में सुख नहों, सुख की भ्रान्ति है। 
. ब्रत के दर्शन में रोग का मूल भोग-द्वत्ति हैं, पदार्थ और 


संग्रह नहीं । 


किक >-नल 6 


मोौतिकवा 


- मानव अपने आपको भूलता जा रहा है। वह आत्मीय 


तत्त्वों को छोड़ विजातीय तत्त्वों में रमण करने लगता 
है । वह अ्रध्यात्मवाद को छोड़ भौतिकवाद के चंगुल में 
फंसता जा रहा है । फनतः वह अपने आपको भ्रूला, 
मानवता को भूला और उसने दुः:खों के दल-दल को 
तिमन्‍्त्रण दिया । 


. आज पदलोलुपता का रोग घर्म को न अपनाने और 


भौतिकवाद को जीवन में,स्थान देने का दुंष्परिणशाम है । 


. भौतिकता में श्रन्तरंग सफाई नहीं, केवल बाहरी दिखावा 


है। अध्यात्म अन्तर की सफाई में विश्वास रखता हूं । 


(५४ 


- ४. श्रध्यात्म-शुन्य भौतिकवाद ने ही श्रण,ब॒म व उदजन बम 
जैसे प्रलयकारी अस्म्र उपस्थित किये हैं, वह मनुष्य का _ 
त्राण कभी नहीं कर सकता । 


मभोतिक विज्ञान 


१. भीतिक-विज्ञान साधनों के ढेर जमा कर सकता है पर 
वह मानव-मन में सनन्‍्तोष व संयम नहीं जगा सकता । 
संयम व सन्‍्तोष के बिना मनुष्य सुख व शान्ति श्राप्त 
नहीं कर सकता । 

२. भौतिक विज्ञान प्ृथ्वी-लोक व चन्द्र-लोक की दूरी को 
चाहे तय कर सकता हो, वह एक राष्ट्र व दूसरे राष्ट्र 

, . के बीच, एक समाज व दूसरे समाज के बीच, एड 

_' पड़ोसी व दूसरे पड़ोसी के बीच जो मनो दूरी है, विचारों 

. की दूरी है उसे तय नहीं कर सकता । 

३. भौतिक विज्ञान के प्रयोग का एक परिणाम यह;तिकला 
है कि वह जनता के लिए अभिशाप बन गया है, पद- 
पद पर मानव-विनाश करने के लिए तैयार हो गया है 

' * और उंससे विश्व-व्यापी जो अशान्ति बढ़ी है वह भी 

“भनुष्य के जीवन कें लिए एक समस्या.बन गई है। 


-अनम-नक]-ामपाकककका++ननन-+लननन. 


१४५ 


मन भेद 


१. छोटे-छोटे मत भेदों के लिए मन भेदों की दीवारें खड़ी 

.. करना महान भूल है। 

२. मत-भेदों की खाई से मन-भेदों की दरारें अधिक 
घातक है । | 

३. विश्व मैत्री का आदशे लेकर चलने वाले यदि छोटी- 
छोटी बातों को लेकर परस्पर मन मुटाव रखें, वेमनस्य 
फैलायें और अनैतिकता को प्रश्नय दें, यह सर्वथा हेय है। 


बडा एटे शेप: 


मर्यादा 


१. जहां मर्यादा होती है वहां संघ तो स्वयं वन ही जाता 
है पर संघ का स्थिरत्व उसी अवस्था में रह सकता 
है जबकि मर्यादाएं सुव्यवस्थित हों । 


श्श्७ज 


२. केवल मर्यादाएं ही कोई चाण नहीं हैं । उनके पीछे . 
भावना रहनी जरूरी है । 
३. मर्यादा में संगठन होता है । 
४. वही जीवन महत्त्वपूर्ण और आकर्षक है जो मर्यादित 
होता 
५. मर्यादा में रहने वाला सलिल जहां स्वयं आ्राकर्षक होता 
है वहां वह शस्य सम्पत्ति को भी निष्पन्न करता है। 
६. मर्यादित जीवन से ही समाज, राष्ट्र और आप सबका 
भला है । 
.७. जिस संगठन में आचार होता है, उसकी मर्यादा हंढ़ 
होती है । 
८. सदस्य की निष्ठा ही मर्यादा को मूल्यवान बनाती है । 
६. मर्यादा की एकरूपता के लिए उसका वाचन और समीक्षा 
आवश्यक होती है । 





मलत्व 


१. विकास की दृष्टि से व्यक्ति का महत्त्व हो सकता है पर _ 
. पूजा की दृष्टि से मैं व्यक्तिवाद को महत्व नहीं देता । 


श्श्र्८ 


नह नाप | ० 


डी 


रू 


महान (महापुलष) 


. बड़ा वह है जो त्यागी और संयमी है । .. 
. बड़प्पन - का मापदण्ड सम्यक्‌ आचरण और सत्य का 


अनुष्ठान है । ह 


. आचरणा-पतित कोई भी बड़ा आदभी नहीं हो सकता । 
. बड़प्पन का जो सम्बन्ध किसी जाति, वर्ग, वर्ण, कुल, 


आदि से माना जाता है वह काल्पनिक और अस्वा- 
भाविक है। हु 


. वास्तव में बड़ा वह है जिसने आत्म-शुद्धि के मार्ग पर 
' आगे बढ़ते हुए अपने आपको संयम से जोड़ दिया. है.। 
दु:ख आने पर पर्वत की तरह अडोल रहने वाले महांपुरुष 
' कहलाते. हैं और उनके नाम इतिहास में स्वर्ण पृष्ठों 


पर गौरव के साथ लिखे जाते हैं । 


: महापुरुष पथ नहीं चलाते । वे अपने स्वाभाविक गति 


के अनुसार चलते हैं तब उनके द्वारा स्वयं पथ निर्मित 


हो जाता है । 


१६ 


८. सांप आदि जहरी जीबों के रहने से छोटे वर्तन का. ३ 
पानी खराब हो सक्रत्ता है पर बड़े-बड़े तालाबों का पानी 
जहरीला नहीं हो जाता जबकि उनमें कितने ही जहरीले 
जीव-जन्तु रहते हैं । के 

€. जो मनुष्य श्रभ्िमान को मिटा कर जीवन में नम्नता -. 
को स्थान दे, वह महान है, ऊंचा । 

१०. विकार के साधन रहने पर भो जो मनुष्य विकारग्रस्त 
नहीं होते वे महान हैं । 

११. व्यक्ति अपने जीवन को जितना अधिक संयम से संजोयेगा, ' 

वह उतना ही ऊंचा और बड़ा होगा । ह 

महापुरुष किसी एक समाज, जाति और वर्ग के नहीं 

होते, वे सबके हैं और इसीलिए सभी लोगों द्वारा स्तुत्य 
. एवं वन्दनीय हैं । 

१३: मनुष्य बड़ा बनेगा अपने सच्चरित्र से, अपने पवित्र कार्यों 
से और नैतिक तत्त्वों को जीवन के प्रत्यक्ष व्यवहार में 
परिणित करने से । 

१४, बड़ा आदमी वह है जो अपने व्यापार में अप्रमाणिकता 
नहीं करता और दूसरे के अधिकारों पर अनुचित अधि- 

-. कार नहीं करता हो । 

१५. महापुरुषों के जीवन का प्रत्येक क्षरा शिक्षाप्रद व श्रेरणा- ह 
दायक होता है .। 

१६. महापुरुष वे हैं जो अपना. अपकार करने वालों पर भी 

, -क्रीप्र नहीं करते । 


नकली 


श्‌ 


१६० 


>छ 


मान 


* मान करने से मान नहीं रहता । मान रहता है -- 


मान त्याग से । 


मानव झभौर मानव-लतीवन 


* मानव पहले मानव है पीछे मजदूर और मालिक | 0 
' पहले मनुष्य मनुष्य बने फिर बाद में धामिक । ,. 
* मानव. का यह सहज स्वभाव है कि वह बंधा हुआा 


परतन्त्र और परमुखापेक्षी नहीं रहना चाहता । 


* आज सबसे बडी आ्रावर्यकता लोगों को सर्वप्रथम मानव 


बनने की है जिसंके बिना कोई भी योजना सफल नहीं 
हो सकती । 


१६१ 


१०. 


११. 


१२- 


१३. 


१४. 


१५. 


: मानव ने अपने हाथों अपनी मानवता खोई है, क्या वह 


अपनी चिर-विस्मृत श्रात्मकथा को याद करेगा ? 


« मनुष्य देवता वनना चाहे, इसके पहले वह मानव तो बने। 
: सच्चे मानव का श्रर्थ है -- मानवीय ग्रुणों को धारण 


करने वाला सत्कर्मनिष्ठ व्यक्ति । 


. सुगन्‍्धी के बिना फूल कसा ? बसे ही मानवोचित गुर्णा 


के बिना मानव कंसा ? 


. जिस प्रकार एक दीप से लाखों दीपक ज्योति पा सकते 


हैं उसी प्रकार एक व्यक्ति से लाखों में ग्रात्म-जागृति 
का संचार हो सकता हैं 

सत्य और अहिंसा से नफरत करने वाला मानव कभी : 
मानव नहीं वन सकता । 

व्यक्ति अपने जीवन की महत्ता को समझे और अपने 
में ऐसी सदवृत्तियां पैदा करें जिससे उनका भावी जीवन 
उन्नत और विकासशील वन सके । 

यदि व्यक्ति यह एक ही बात ग्रहण कर ले कि दूसरों 
के लिए बुरा कार्य नहीं करूगा तो वह सही रूप में 
मानव बन सकता है । 

मानव जन्म पाना और बात है, मानव बनता और | 
मानव जीवन क्षरिक है, यही कारण है- कि वह बहुत 
कीमती है. 

मालव जीवन सभी योनियों में एक ऐसी श्रेष्ठ योनि. है 
जिसकी प्राप्ति के बाद मनुष्य, श्रगर चाहे तो बहुत बड़ा 
लाभ उठा सकता है । ह 


१9. 


श्प. 


. मानव जीवन की, प्राप्ति का उद्देश्य बन्चनों से मुक्ति प्राप्त 


करना है । अर्थात्‌ दुःखों: से छुटंकारा पाना और शाश्वत 
सुख की उपलब्धिः करना हैं । 


मानव जीवनः बहुमूल्य है । इसको यदिं व्यर्थ गंवा दिया 
गया तो फिर इसका दुबारा, मिलना कठिन है । 


ग्राज मनुष्य का जीवन विश्यूखलता के कारण विषम 
बनता जा; रहा है; । जब- तक विश्व खलता: चलेंगो' तब: 


. तक समता. व श्ात्ति, केसे आयेगी । 


१६, 


श्र: 


२३. 


मानव: जीव्रन की. सार्थकता इसमें नहीं है कि आप ज्यादा 
से ज्यादा विलासी. बनें, पू जीपति बनें, ऐश आराम से 
जिन्दगी. को बितायें । 


. धामिक जीवन मानव जीवन की सबसे पहली अपेक्षा है । 


- मानव जीवन हीरे के तुल्य कीमती है इसे यों हीं नहीं 
गंवा देना चाहिये | त्याग, तपस्या व्यक्ति से नभी हो . 


सके तो कम से कम सुबह दो, घड़ी मन. को शुद्ध कर, 


ईएया और मत्सर को-तज कर परमात्मा का भजन 
ही करे । 


जीवन एक प्रवाह है । नदी का प्रवाह जिस प्रकार बहता 
जाता है-यह जीवन भी बहता रहता है.। जहां. बांध 
आता है, प्रवाह रुकता है । इसी तरह यह मनुष्य जीवन 
जीवन का एक रूका प्रवाह हैं। 


मनुष्य का जीवन ज्ञान-विज्ञान की एक बहुत बड़ी प्रयोग . 
शाला है । इसमें इतने प्रयोग हुए हैं जिचका शतांश भी 
नहीं पकड़ा जा सकता । 


१३३ 


२४. 


मनुष्य जन्म मिला, विकास की सम्पूर्णा सामग्रियां मिली। 


. ऐसा होते हुए भी यदि व्यक्ति जीवन का सही उपयोग 


नहीं करता तो वह उसकी श्रज्ञता है । 


* जीवन का मूल्य धन-संग्रह नहीं, वह अमूल्य है। 
' मनुष्य दूसरों के विपय में गलत धारणा रख सकता 


किन्तु अपने विपय्र में नहीं । 


* मानव को कात्र समभना बुद्धिहीनता है। 
* संसार भर की आश्चर्य से आइचर्यजनक व दुलंभ से 


दुलभ वस्तुगश्नों में जितना आइचर्यजनक व दुर्लभ मानव 


' जीवन है उतनी और कोई चीज नहीं । वह आश्चर्य 


जनक तो इसलिए है कि संसार के आश्चर्यों का केन्द्र 
व जनक वही है । 


* मानव-जीवन बहुत कीमती है । इसमें यदि व्यक्ति साहस, 
' जागरूकता और आत्म-उत्साह से काम करे तो ऐसे 


काम कर गुजरता है जो उसके अपने लिए तो उन्नति 


के हेतु हैं ही, औरों के लिए भी वे उन्नति के मार्ग पर 


३०. 


३१ 


रे२ 


आगे बढ़ने में मशाल का काम देते हैं । 
लोग कहते हैं देश का पतन हो गया, समाज का पतन 


“हो गया, पर मुझे लगता है कि श्राज व्यक्ति की आत्मा 
का पतन हो रहा है।.. ु 


मनुष्य चाहे कितना. भी शक्तिश्ञाली- क्यों न- हो, मृत्यु 
के आगे किसी का ब्रल नहीं चलता । । 


क्या वह जीवन कोई वास्तविक जीवन: है जहां व्यक्ति 
अर्थ कीट बन उससे चिपटा; रहे;और एक अवधि.विशेष 


पड 


5 के बाद अपनी मानव योनि को परिसमाप्ति कर यहां 


३३५० 


से चलता बंने । 
सपनों की दुनियां में जाकर भी जो सपने का नहीं बनता 


' वही वास्तविक व्यक्ति है । 


३४. 


मानव जीवन का ध्येय संयम की साधना है न कि विलास॥। 


» जब तेक मानव अपने आपको नहीं परखेगा, तब तक 
“उसकी कोई भी प्रगति सम्पूर्ण और स्थायी नहीं 


' हो सकती । 


३६- 


व्यक्ति स्वयं जब अपने दोषों को देखना शुरू कर देता 
- है तो उन्हें त्यागने में जल्दी समर्थ होता है । 
३७. 


मनुष्य अपने अन्तःकरण की प्रेरणा से जो करता है 
वह सत्य शिवं सुन्दरं होता है । 


७+...६- -ककमार२ ३२: बड:-०-.॥०-- 


मानवता 


९. युद्दों और संचर्यों के दावातज़ से दस्त मोनवता आज 


कराह रही है 


* मानवता संयम और सदाचार में है। मानवता त्याग और 


प्रत्याख्यान में है । मानवता सत्य और अहिसा में है ।. 
भानवता ब्रह्मचर्य और अचौरय में है। मानवता अपरिग्रह 
में है। मानवता सन्‍्तोष और क्षमा में है। मानवता 


र्र्शः 


>4ग 


सबको भ्रात्म तुल्य समभने में है । वह राद्गुणों को 


जज 


संजोए मानव के अ्रन्तःस्थल में रहती है । 


* वल प्रयोग के साथ किसी पर विचारों को लादना मानवता . 


की हत्या है । 


' मानवता बाहर के आडम्तरों में नहीं, वह अ्रन्तर की. 


कस्तु है । 


* आज देश ने सबसे ज्यादा खोया है तो ईमान और मानवंता . 


को खोया है । 


* जब तक जीवन में सात्विक आचरणा, ईमानदारी, सदृबृत्ति 


मेत्री-भाव जैसे सदगुणा नहीं झ्राते तव. तक॑ वह उपचार 


मात्र जीवन है वास्तविक नहीं । 


७. नेतिकता श्रौर मानवता का आधार हृदय-शुद्धि है । 
८. ज्योति के बिना जैसे दीपक का महत्त्व नहीं, प्राणों के 


११. 


विना जिस प्रकार शरीर का मूल्य नहीं, उसी तरह 
धर्म के बिना मानव केवल कहने भर को मानव रहता 
है, सच्ची मानवता के दर्शन: उसमें नहीं होते । 


* मानवता के लिए चरित्र का उत्थान आवश्यक है। 
* यदि मानव की मानवता नहीं बनी तो उसके पांस फिर 


सुरक्षित रह ही क्‍या गया ? 
व्यक्ति से घृणा करंना मानवता का अपमान है । 


रद 


मूंत्य 


७ 


१. मानव मानव का छात्र नहीं होता । मानव को परास्त 
कर अपने को विजयी मानने वाला सूर्ख है । 


२. गंलती होना इतनी बड़ी बात नहीं, पर उसंको स्वीकार 
न करता या उस पर आत्म ग्लोनी न केरता मू्खता है । 


मूल्यांकन 


१. किसी का मूल्यांकन तवीनता और प्रांचीनता से नहीं 
हो सकता। अच्छाई की कसौटी एक मात्र गुण है । 


न्न्की 


ल्‍फ् 


श्र 


मेद्री 


' जो व्यक्ति दूसरों के “स्व” -का अपहरण - नहीं करता 


वह सबका मित्र है | 


* जो बात मंत्री, प्रेम, सदुभावना से बन सकती है वह 


रक्तपात और हिंसा से नहीं वन सकती । प्रतिशोध की 
भावना पैदा किये बिना किसी को पराजित करने का 
कोई उपाय है तो वह मैत्री है । 


 मेत्री के बिना विवाद का कभी अन्त नहीं होता । 2 | 


बोली टूटे दिल को मिला देती है । अभय भाव शत्रु 
को भी मित्र बना देता है। : 
मंत्री के क्षेत्र में छोटे बड़े का भेद समाप्त हो जाता है । 


* संवत्सरी पर्व हमें. यही संदेश देता. है, कि. हम आत्म- 


चिंतन करें और आपस के मन-सुट्राव, को, भूल. .जाएं 
तथा मंत्री और श्रातृत्व बढ़ाएं । 


 मैत्री जीवन के परिष्कार.का पहला और जीवन की 


ऊंचाई का चरम सोपान है । 


(कफ, 


22 


१०. 


श्र 


१३. 


१४. 


१५. 


: ७. जो व्यक्ति समाज या संस्थान मैत्रो का प्रसार करते हैं, 


शत्रु भाव की परिसमाप्ति कर अपनी मित्रता से दूसरे 
के हृदय को आप्लावित करते रहते हैं, वे सचमुच ही 
महान साध्य की साधना में संलग्न हैं । 


, मैत्री जीवन की शान्ति का सर्वोच्च वरदान है । उसकी 


उत्पत्ति अभ्य में और विकास में होती है । 


- आज मनुष्य के पास प्रलय की प्रचुर सामग्री है। इसके 


निरोध का एक मात्र विकल्प अ्रब मंत्री ही है । 


अहिंसा, अभय और विश्वास मेत्री के बिना टिक 
नहीं सकते । 


मंत्री अहिसा में है । 


. मैत्री दो व्यक्तियों से सम्बन्बित होती है । अहिंसा दो 


के बिना भी हो सकती है । 


विश्व बन्धुत्व की भावना को फैलाने के लिए जरूरी है 
कि हम किसी पर व्यक्तिगत आपेक्षात्मक नीति को 
अख्तियार नहीं करें । हमारी नीति मण्डनात्मक रहनी 
चाहिये । 


सत्य में सदाचार का अखण्ड स्वरूप समाया हुआ है 
उसका कोई भो अंग सत्य की सीमा से बाहर नहीं है । 
सत्य कोई छोटी-मोटी पगडण्डी नहीं, वह राजपथ हैं । 


जिस पर झआत्म-विश्वास के साथ अग्रसर हुआ जा सकता हैं! 


डण्डे के बल पर और प्रलोभन द्वारा किसी स्थायी सुबार 
की बात नहीं की जा सकती । उपदेश द्वारा हृदय 
परिवर्तत करके ही किसी को सन्‍्मार्ग पर लाया जा 


१६६ 


१६. 


१७. 
१८. 
१९. 


२०. 
२१. 


२२. 
२३. 
२४. 


२५ 


१७०, 


सकता है । 

परस्पर सहयोग से प्रेम की भावना का विस्तार होता 
है तथा वह धर्म नहीं होते हुए भी व्यक्ति को धर्म के 
लिए सक्षम बनाने में सहायक होता है । 

वह दिन अभ्युदय का होगा, जिस दिन युद्ध का प्रतिशोध 
मत्री से लिया जायेगा । 

मित्र से कोई भय नहीं होता इसलिये भ्रभय की भूमिका 
भी मंत्री है । 

मंत्री प्रेम से ऊंची है, क्योंकि वह मात्र सगे-सम्बन्धियों 
के दायरे से बाहर भी की जा सकती है । 

मेत्री की सच्ची प्रक्रिया किसी गिरते हुए को उठाना है। 
मैत्री का आदर्श है, केवल मित्रों ओर प्रेमियों के साथ 
ही नहीं, शत्रुओं के साथ भी मित्र भाव बरता जाय। 
मेत्री एक विराट और व्यापक तत्त्व है। अपने में इसे 
पनपाने के लिएं मानव को चाहिए कि वह दूसरों से 
प्रेम पाकर पूले नहीं, विरोध पाकर सूखे नहीं । 
मेत्री की पृष्ठभूमि अभय है । ह 

मेत्री और प्रेम में अन्तर है। प्रेम में एक तरफ आ्राकषरणा 
और भुकाव होता है जो समता को नहीं बने रहने देता । 
मंत्री की मूल भित्ति सहिष्णुता है । 


मोक्ष 


१. सारे कर्म बन्ध टूट कर आत्मा का सत्‌ स्वरूप निखर 
आना, उसका पूर्ण विशुद्ध हो जाता मुक्ति है। 
२. मुक्ति प्राप्त करने में वेश-भूषा बाधक नहीं । वेश चाहे 
साधु का हो या गृहस्थ का। वास्तविकता तो यह है कि 
अन्तरात्मा में साधुत्व आना चाहिये । 

३ आत्मा के सत्य साक्षात्कार का ही नाम तो बन्धनों से 
छुटकारा है । | 

४. रथ का एक पहिया रथ नहीं है। रथ की एक घुरी 
रथ नहीं है, रथ का एक घोड़ा रथ नहीं है। इन सबका 
समवेत ही रथ हैं । उसी प्रकार सम्यग्‌ - ज्ञान घूरी 
हैं, सम्यगू-हष्टि पहिया है और सम्यक्‌-चारित्रं घोड़ा है । 
यदि सम्यग्‌-ज्ञान, दर्शन और चारित्रं को एक साथ लेकर 
साधना मार्ग पर उतरें तो अवश्य ही सिद्धि मिलेगी। 

५. आत्म-मुक्ति की प्रक्रिया के दो तत्त्व हैं -- संवर और 
निजेरा । संवर निदृत्ति है और निर्जरा निदृत्ति संवलित 
प्रवृत्ति, संवर निरोव है और तनिजेरा झोवन । 


१७१ 


मोम 


: मौन में जो आनन्द है वह बोलने में कैसे हो सकता है ? 
* मौन का आनन्द बोलने के आनन्द से ऊंचा है। 





खूद्ध 


युद्ध तलवारों, वन्दृकों, मशीनगनों और अ्रणुवमों में नहीं 


है, वह मानव के दिल और दिगभाग में है। मानव जब 
चाहता है तभी लड़ाई का भूत खड़ा होता. है । 


: युद्ध की पागल मनोवृत्ति ममुष्य को जन्मान्ध बनाये 


रखती है । 


युवक - वृद्ध 


: युवकों में अदम्य उत्साह है, साहस हैं और काम करते 


' की क्षमता है पर इन सब की सार्थकता तभी है जबकि 


न्प्णा 


०<्‌ 


वे सही माने में जीवन का उद्देश्य समभते हुए चरित्र- 
विकास और आत्म-निर्माण के पुनीत लक्ष्य में इनका 
प्रयोग करें । 


- युवकपन केवल अवस्था सापेक्ष नहीं है । वह उत्साह, 


लगन और साहस सापेक्ष है । 


: युवक बुजुर्गों के अनुभव से लाभ उठा कर ही आगे बढ़ 
- सकते हैं । । 

- युवकों और बुढ्ढों का सहयोग अंधे और पंगू का सा है । 
- भ्रगर युवक बृद्धों के अनुभवों का लाभ उठाकर बृद्धों 
और युवकों के बीच की खाई को पाठ कर आगे बढेंगे 


तो संगठन के कार्य में सफलता मिलता पूर्णातः संभव है । 


_>०-_+-++_++-_हप-कुधा+०--++ मम. 


१७३ 


योग] 


१. जो अश्रपनी वृत्ति को आन्तरिक विशुद्धि से जोड़ ले वही 
तो योगी है । 


अनिल 


योतना की सफलता. 


१. योजनाओं की सफलता के लिए पहले उसकी रूपरेखा. 
पर स्वयं चलें: और बाद में दूसरों का पथ-प्रदर्शन कंर। 


>६7 66३७ 
ह्ाय 
९. व्यक्ति परक विजय की कामना राग है। 


हा > -- ८ 4 ५-->- 


- औैएड़ 


१. 


ल्प्णैः 


ह्ष्द और अपुव्रत 


प्रणुक्रत-पन्दोलन की मूल भित्ति व्यक्ति है। व्यक्ति का 
पड़ोस पर, पड़ोस का समाज पर, समाज का राष्ट्र पर और 
राष्ट्र का संसार पर असर पड़े बिना नहीं रहता । 


. नदी का उद्गम-स्त्रोत बहुत छोटा होता है पर आगे 


चल कर वह बहुत बड़ा रूप ले लेता है। इसी तरह 
व्यक्ति-व्यक्ति से शुरू किये जाने वाले अणुत्रत आन्दोलन' 
का रूप पहले छोटा दिखाई देता है परन्तु वह समाज, 
देश और राष्ट्रगसबकी आत्मा को छू सकने की क्षमता 
रखता है । 


 अणुब्रत चरित्र व नैतिक-निर्माण की योजना है जिसकी 


आज राष्ट्र को बहुत बड़ी आवश्यकता है । 


श्छः्‌ 


द्पष्ट और घमे 


१. धर्म राष्ट्र की आत्मा का निर्माता है । 


श्छ्द 


राष्ट्र की आत्मा तब ही स्वस्थ, मजबूत और प्रसन्न रह 


सकती है जबकि उसमें धर्म के तत्त्व घुल मिल गये हों । 


, राष्ट्र निर्माण में धर्म जहां तक सहायक हो सकता है 


झौर इसके लिए धर्म जिन सूत्रों का प्रतिपादन करता 
है वे हैं -- आत्म-स्वतन्त्रता, झ्रात्म-विजय, अंदीन-भाँवें, 
श्रात्म-विकास, और आत्म-नियन्त्रण । इन सूत्रों का 
जितना विकास होगा उतना ही राष्ट्र स्वस्थ, उस्नेत 
और विकसित बनेगा । ह 


, धर्म का क्षेत्र व्यक्ति-सुधार का क्षेत्र है। व्यक्तियों का 


समूह समाज और समाज की एकता राष्ट्र है । अतः 
इस दृष्टि से वह समाज-सुधार और राष्ट्र-सुधार की 
भी साधन बन सकता है। : 


त्नत्ट्ल््ि प्र 


ह्ष्ट भनिर्मांण 


. जिस राष्ट्र में सब व्यक्ति नेता बन बेठते हैं, सबके सब 
अपने झ्रापको पंडित मानते हैं और सब बड़े बनना 
चाहते हैं वह राष्ट्र जरूर दुःखी रहेगा । 

, जब तक सत्यनिष्ठा और प्रामारिशकता जीवन का मूल मंत्र 
नहीं बन जाती तब तक मानवता का सूत्र पहचाना जाय 
* यह कभी भी सम्भव नहीं और राष्ट्र का निर्माण हो 
जाय यह कभों नहीं हो सकता । 

. राष्ट्र की आत्मा वहां की जनता है । जब तक जनता 
का जीवन शुद्ध नहीं, प्रामारिंकक नहीं, सत्योन्मुख नहीं 
तब तक सच्चा राष्ट्र-निर्माण नहीं । 

. जिस देश, राष्ट्र और संघ में जितने अंधिक सत्यवादी 
होते हैं, वह उतना ही अ्रधिक प्रतिष्ठित और उन्नत 
बनता है । 


जन्‍न्‍क- अडिपरास-थहि 4४7 


श१्छ्छ 


न 


१८ 


लक्ष्य 


व्यक्ति तब बनता है जब उसका कोई निश्चित लक्ष्य हो 


उसकी पूर्ति की तड़फ हो और उसका आग्रह हो । 


* रीति-रिवाज, आचार -व्यवहार और परम्पराओं में संयम 


हो, सरलता हो यह एक लक्ष्य है । 


* हमारा आदर्श और लक्ष्य यह है कि विरोधियों को भी 


अ्रहिसा के माध्यम से जीतें । न किसी से उद्िस्न हों 
और न किसी को उद्विग्न करें । 


* काम के पीछे नाम अपने आप होता है मगर केवल नाम 


हानिप्रद है। नाम की भूख न रखते हुए काम में जुटे 
रहना ही परम उद्देश्य है । 


० 


+ 


नए 


>च 


लल्ला 


. लज्जा का भअर्थ हैं-असत्‌ कार्यों से, बुरी प्रवृत्तियों से 


भय रखना, जिससे व्यक्ति अपने आपको उनसे बचा संके । 


. बुरे आचार और बुरे व्यवहार के प्रति जो संकोच होता 


है उसे लज्जा कहते हैं । 


. बंधन हृदय का होता है, लज्जा आंख की होती है; इन 


आवरणों की नहीं । 


नम पक 


चक्रोफकि 


: वक्त हृदय से निकली वक्रोक्ति दूसरों का हृदय-आकषित 


नहीं कर सकती । 


श्छ६ 


4 घ० 


* विकार-भावना विद्या साधक में बाधक है 
* विकार व्यक्ति को व्यामोह में डालता है और उसके 


बिका? 
है । 


मौलिक आनन्द को दवाये रखता है ।. 


 भ्रकृृति को छोड़ कर विक्नति में जाना दूःख हेतु (अथर्म) है। . 
* बाहरी पदार्थ ममकार पैदा करते हैं और ममकार विकार 


पैदा करता है । 


* चक्षु द्वारा रूप का साक्षात्‌ करना बुरा नहीं, बुरा तो 


उसके देखने में जो विकार है वह है । 


 ज्यों-ज्यों आन्तरिक वृत्तियों का विकार बढ़ता है त्यों- . 


त्यों स्थितियां जटिल बनती हैं । 


* मानव जितना विक्ृति में उलभा, विभाव में गया, सचमुच 


उसने कुछ पाया नहीं, पर खोया है ।. 


* बिल्ली के दांत वे ही हैं जिसमें वह अपने बच्चों को भी 


पकड़ती है और चूहे को भी । पर बच्चे को पकड़ते समय 


न 


नशा पं 


०<्‌ 


नीडट 


डी) 


उसकी यह दृष्टि रहती है कि कहीं खरोच न आये और चूहे 


को पकड़ने पर यह दृष्टि रहती है कि कहीं छूट न जाये । 
यह आंख का अन्तर नहीं, मानसिक-विकार का अच्तर है। 


०-९“ ७--३१०-० 


विकास 


. अनावश्यक प्राचीनता को समेटते हुए आवश्यक नवीनता 


को पचाते जाना विकास का मार्ग है । 


. मानव जीवन विकास की पहली सीढ़ी है । 
. जीवन - विकास को दबाने वाला पदार्थ-विकास हमें 


नहीं चाहिये | : 


. मैं राष्ट्र का वास्तविक विकास बड़ी-बड़ी बांधों, पुलों 


और सड़कों में नहीं देखता, उसका सच्चा विकास उसमें 
रहने वाले मानवों की चरित्र-शीलता, सदाचरसा, सच्चाई 
और ईसमाचदारी में मानता हूँ । 


: अध्यात्मिक विकास ही मानव का सच्चा विकास है । 
समूचे संसार को सुधारने की डींग भरने वाले मनुष्य, 


समूचे संसार को देखने वाले मनुष्य जब । अपने को 
नहीं सुवारेंगे, अपने जीवन की ओर नहीं देखेंगे, जीवन 
में दुष्प्रवृत्तियों का विरोध नहीं करेंगे, तब तक विकास 


१८१ 


की सब कलपनायें मानव-मस्तिष्क की थोथी कह्मनो 
टी होंगी । | 

७. मानवता का विक्रास ही सांस्क्ृतिक-विकास 
८. जीवन का सर्वतोमुखी विकास केवल सामाजिक ओर | 
राजनंतिक श्रधिकारों को उपलब्धियों तक ही सीमित 
है । क्‍ 
६. जवन-विकास-क्रम के मुख्य तीन सूत्र हैं-- श्रवण, श्रद्धा 
और पराक्रम । 
१०. अपनी दुष्प्रवृत्तियों का विरोध कर सद्प्रवृत्तियों का . 
समावेश करना ही जीवन विकास की सर्वोच्च साधना है। . 
११. दुःख सुख को ही जीवन का ह्वास और विकास मत . 
समभो किन्तु संयम जीवन का विकास, और अ्रसंयम 


ह्ास रे | 
१२. विकास के पहले लक्ष्य की स्थिरता होनी चाहिए ! - 





विचार- प्रच? 


१. विचारों को फैलाने का एक मात्र तरीका हृदय में अपनी 


विचारधारा को जचाना है । 
विचार फंलाने के लिए लड़ाई को प्रश्नय, देना भयंकर 


भूल है । 


श्ष्र 


न 


>> 


न्ब्णः 


विलेता 


: सच्चा विजेता और सच्चा सैनिक वही होता है जो अ्रपनी 


आत्मा पर विजय पाता है और अपनी आत्म-प्रवृत्तियों 
से जूफता है । 


72% 37*%-4%-८ ७ -- 


(विज्ञान 


. यदि विज्ञान का अध्यात्म के साथ समन्वय नहीं हो तो 


वह विज्ञान अभिज्ञाप बन जाता है । 


२. जिसमें शभ्रहिसा नहीं, वह विज्ञान नहीं । 
: विज्ञान वह है जो जीवन को सही दिशा दे । जीवन 


को पवित्र और ऊंचा बनाए। अहिंसक जीवन जीना 


श्परे 


श्प४ 


सिखाए। जिस चिज्ञान में यह नहों इसके विपरीत हो,वर - 
विगत ज्ञान होगा । है 


 पदार्थ-विज्ञान को दृष्टि से विज्ञान को कोई बुरा नहीं. 


कह सकता किन्तु उसका दुरुपयोग निन्‍्दनीय है । 


 श्राज विज्ञान का हेतु विज्ञान नहों अज्ञान है। 
. विज्ञान के बिना संसार चल नहीं सकता और ग्रध्यात्त 


के बिना जीवन सूना है. । 


. विज्ञान पर अध्यात्म का अंकुश रहना चाहिये ! यदि . 


वह न रहे तो विज्ञान संसार को निगल जाएगा। 


. विज्ञान तो वहों है जो जीवन को शुद्धि की ओर ले जाए।. 
. ज्ञान का परिष्कृत या विकसित रूप ही विज्ञान है या. 


यों कहें कि प्रयोग सहित जो ज्ञान है उसका वाम 
विज्ञान है । 


. ज्ञान और विज्ञान में कोई बहुत अन्तर नहीं । विज्ञान 


ज्ञान से परे नहीं है । विशिष्ट ज्ञान यानत्रि अन्वेषण व 
खोजपूर्ण जो प्रायोगिक ज्ञान है, वही विज्ञान है। आज 
विज्ञान का सर्वत्र बोल बाला है । यद्यपि यह बुरा वहाँ 
है, क्रित्तु उसका दुरुपयोग बुरा है । 


क्द्यिा 


. आजीविका के लिए विद्या की साधना बहुत छोटी बात 

है । अतः लक्ष्य महान रखो । 

. आत्म-विद्या सबसे बड़ी विद्या है यदि वह नहीं श्राई तो 

शेष सब. विद्यायें भारभूत रहेंगी । 

. विद्या की वास्तविक शोभा है-विनय, विवेक और आचार । 

. विद्याजन का वास्तविक लक्ष्य है -- जीवन को, जीवन 

की यथार्थता को और उसके अध्यात्म पक्ष को सम्यंक्‌ 

. रूप से जानना, तदनुक़ुल वृत्तियों को अपने में प्रतिष्ठित 

करना, क्योंकि भारतीय संस्कृति केवल इहलौकिक इष्ट 

संस्कृति नहों है । 

विद्या वरदान है पर आचार शून्य होने से वह अभिशाप 
भी बन जाती है । 

. याद रखिये, अनुशासत और बिनय के अभाव में श्राप 

विद्या अजीरणो रोग के समान है । 

विद्या का फल मस्तिष्क-विकास अवध्य है किन्तु हैं वह 


यश 


१०. 


११. 


१२. 


१३. 


१४. 


१५. 


प्रधमिक, उसका चरमफल श्रात्म-विकास है । 


* विद्या की साधना केवल पुस्तकीय ज्ञान हो यह वांदनीय : 


नहीं । मुख्यतया श्रात्मानुशासन होनी चाहिये । 


" विद्यार्जज का मकसद केवल साक्षरता या ऊंची-अंची - 


उपाधियां पा लेने से पूरा नहीं होता । उसका सही लक्ष्य 
है--जीवन को समभना, उसे संस्कारित बनाना । 
पढ़ने के बाद भी जिनमें संयम की साधना नहीं है, हेय- 
उपादेय का ज्ञान नहीं है, त्याज्य-ग्राह्म का विवेक नहीं 
है वे पंडित भी निरे अज्ञानी हैं । ॥ 
वह विद्या अ्रविद्या है जो भ्रन्तरवृत्तियों में परिशुद्धि 
नहीं लाती । ह 
विद्या का सही लक्ष्य है-- अपने आपको सुसंस्कृत बनाना, 
शान्ति और अन्त: तुष्टि के सच्चे मार्ग को पानो-और 
उस पर चलने की योग्यता हासिल करनामे .. 
विद्यार्जन का लक्ष्य परीक्षायें, उतीरं कर ऊंची.- ऊंची 
उपाधियां पा लेना मात्र नहीं है । इसका सहीं लक्ष्य 
आत्म-विकास और जीवन-शुद्धि है । । 
पंसों से मिलने. वाली विद्यय पैसों तक. -ही पहुंचेगी, 
जीवन तक नहीं । का जी 
विद्या वह है जो बन्धनों को तोड़ कर मुक्ति की ओर 


अग्रसर हो । + हे 


विद्यार्थी 


१. विद्यार्थी का जीवन योगी का जीवन है। योगी साधना: 
काल में एक लक्ष्य, ध्यानस्थ, खाद्य-संयमी और ग्रुु के 
अ्रधीन रहता है, वेसे ही विद्यार्थी भी अध्ययन काल मरे 
इसका पालन करें । मु 


२. वृक्ष ज्यों-ज्यों फलता है वह नम्न वनता जाता है वेसे ही 
विद्यार्थी को भी विद्या की वृद्धि से नम्र बनना चाहिए । 

३. विद्यार्थी यह स्मरण रखें कि उनके जीवन का लक्ष्य 
पुस्तकीय ज्ञान और उपाधियां श्राप्त कर लेना ही नहीं 
है, उनका सही लक्ष्य है--जीवन का निर्माण । जो विद्या 
के साथ विनय, विव्रेक व चरित्र श्रादि सदुगुणों के 

. साहचर्य से होता है । 

४. विद्यार्थी जीवन-निर्माणण की वेला है। प्रत्येक विद्यार्थी को 
चाहिये कि वह जीवन में इस स्वरण्णिम-काल का सु 
पयोग करते हुए विकास के पथ पर ब्रग्नस॒ः ह्दो। 

५. अल्प-ज्ञान के का रण ही विद्यार्थी उच्छ डुखल हवा जाते हैं 


८ 


#डआ 


प्र 


१०. 
११. 
१२: 


१३. 


वे ही शिक्षित बन कर गम्भीर और शान्त बन जाते हैं। - 


 छात्र-जीवन मा व-जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग है जिसमें : 


आझागामी जीवन का निर्माण होता है । 


 अस्यान्य शिक्षाओ्रों की तरह अध्यात्म शिक्षा भी विद्यार्थियों 


के लिए आवश्यक है । 


, विद्यार्थी-जी वन निर्माण का प्रथम सोपान है | भावी 


जीवन-रेखा का आदि बिन्दु है । 


. छात्रावस्था जीवन निर्माण की उर्वर भूमि है। इसमें 


वपन किया गया बीज छतशाखी के रूप में फलित 
होता है । 

विद्यार्थी जीवन अन्य जीवनों की रीढ़ है । 
विद्यार्थी सच्चे ज्ञानार्थी बनेंगे तभी उनकी सफलता है। 
विद्यार्थी जीवन की तीन विरोधी बातें हैं-- ंगार, 
अनिष्ट सम्पर्क और प्रणीत रस का भोजन । 

मनुष्य को विद्यार्थी होता चाहिये । लोक धारणा ऐसी है 
कि व्यक्ति पहले विद्यार्थी बनता है और बाद में शिक्षक । 


. पर मैं समभता हूँ कि व्यक्ति पहले शिक्षक बनता है 


१४, 
१४ 


१६. 


श्प्८ 


और फिर विद्याथी । 

चारित्र्य के बिना विद्या भार है । 

तत्त्व ग्रहण करने के लिए हर व्यक्ति विद्यार्थी है। इंढ 
और जवान का इसमें प्रश्न नहीं । हर अवस्था में हर 
व्यक्ति को तत्त्व पाने के लिए विद्यार्थी रहना चाहिये । 


विद्यार्थियों (सुकुमार बालकों) का निर्माण करने वाली ढौ. 
शक्तियां हैं -- पहली माता-पिता और दूसरी शिक्षक- 


१७, 


शप, 


१६. 


... २० 
३१. 
२२. 


२३. 
' है वह है चरित्र-शीलता । 


3 


२५. 


्क 


शिक्षिकायें । 

आचार शून्य विद्वता किसी काम की नहीं । जीवन 
आचारी होना चाहिए । विद्यार्थियों में ज्ञान और चरित्र 
दोनों की ही आवश्यकता है । दोनों मिल करके ही 
जीवन को विकसित, सफल और संस्करारित बना सकते हैं । 
किस समाज, देश और राष्ट्र का भविष्य कसा है, इसका 
अन्दाजा वहां के विद्यार्थियों के जीवन से लगाया जा 
सकता है॥ | | 
विद्यार्थी का जीवन तो एक तपस्वी और योगी का जीवन 
है, वह आत्म-खजन की उन अनूठी घड़ियों में से गुजरता 
है, जो फिर कभी आने वाली नहीं हैं । 

विनय विद्यार्थी-जीवन का भूषण है । 

बरह्ाचय पालन विद्यार्थी के लिए अत्यन्त झश्रावश्यक है । 
मैं स्वयं विद्यार्थी हूँ, इसलिए विद्यार्थियों में पहुंच कर बहुत 
प्रसन्न होता हूँ । मेरी नम्र मति के अनुप्तार प्रत्येक 
व्यक्ति को विद्यार्थी बने रहना चाहिए । विद्यार्थी रहने वाला 
जीवन भर नए-नए आलोक पाता है । विद्वान बनने के 
बाद प्राप्ति का मार्ग रूक जाता है । 

विद्यार्थियों को जीवन में जो सबसे बड़ी चीज ग्राप्त करनी 


छात्र बीज है । वठ विज्ञाल वृक्ष का मूल बीज होता है । 
इसी तरह जीवन का मूल विद्यार्थी जीवन है । 
विद्यार्थी जीवन तअ्रस्य जीवनों की रीढ़ हैं। जय तक वह 
सम्पन्न और समुन्नत नहीं होगा, देश, समाह और राष्ट्र 
उन्नति नहीं कर सकते । 


>> 9-9० 


विद्वार---अविद्दाव्‌ 


. विद्वान्‌ वहो है जो दूसरों को जानने से पूर्व अपने आपको 
भली भांति जान ले । । 

२. जो सब कुछ जान कर भी अपने आपको नहीं जानता 

वह अविद्वान्‌ है । 


न 


विधि-निषेध क्‍ 


१. विधायक तत्त्व उस उपेक्षा में कम व्यापकः होते हुए भी 
_ थोड़े में नहीं बताया जा सकता । ह 
: २. निषेध-तत्त्व व्यापक होते हुए भी थोड़े में बताय्रा जा 
सकता है । 


१६० 


विनय 


१. विनय जीवन का आचार है । 

२. जो नम्र होता है वह सहज ही दूसरों को अपनी ओर 
आक्ृष्ट कर लेता है । ः 

: ३. विनयपूर्वक ली गई विद्या पनपेगी और फूलेगी । 

४. विनय और गुलामी में तो बहुत बड़ा अन्तर है। ग्रुलामी 
लालच, स्वार्थ व आकांक्षाओं से की जाने वाली खुद्यामद 
है और विनय इससे सर्वथा विपरीत । 

५० विनय: विद्यार्थी-जीवन का आभूषण है । 

६. बड़ा वह बनता है जो नम्र होता है, अभिमान का 

त्याग करता है । 

७. विनीत विद्या प्राप्त कर सकता है, अविनीत नहीं । जैसे . 

“पल था पोली जमीन में बेस्सा। का पानी नीचे 

तक बैठता है, लेकिन पथरीली जमीन पर बरसात काम 
नहीं करती । 

८. विनय के बिना जीवन-अईडला नहीं बन सकती । 


श्ध्श्‌ 


६ वही परिवार सुखी और सम्पत्तिशाली है, जहां एक : 
नेतृत्व के प्रति उसके सदस्य विनयी हैं । 


वि 


वि्शिेध 


१. विरोध एक संघषे है और संघर्ष से ही ज्योति पद 
होती है । 
२. जिस योजना का विरोध नहीं होता, वह पनप नहीं सकती | 
३. विरोध से घबराने वाले खत्म हो जाते हैं और उठकर 
उसका सामना करने वाले विजय प्राप्त कर लेते हैं| 
४. विरोध के सामने विरोध लेकर बढ़ोंगे तो वह बढ़ेगा श्रौर 
यदि उसको पीठ देकर अपना कार्य करते रहोगे तो वह 
अपने आप खत्म हो जायेगा । 

५. विरोध की स्थिति में घबरा जाने वाले दुनिया में कर 
भी क्‍या सकते हैं ? 

६. जितने अत्ररोध प्रारम्भ में खड़े होते हैं उतने आगे 
नहीं रहते । 

७. विरोध को मैं लाभकोरी समभता हैं, क्योंकि वह गरक्ति _ 
. को जागरूक रखता है । 


८. किसी को विरोधी मान कर उसके कार्य में बाधक मरते. 
बनो । विरोध अपना दोष है; उससे अपना. अहित होता 


१६२ 


(22 


१ 


. मानव को छात्र सानना बुद्धि की कमी है। सजातीय 


तत्त्वों में विरोध नहीं होता । विरोध का आधार विजातीय 
तत्त्व हैं । 


. भोग की वृत्ति से स्वार्थ, स्वार्थ से भेद और भेद से 


विरोध होता है । 


, जो विरोध का विरोध के द्वारा प्रतिकार नहीं करता 


वह अवश्य ही कोई सामथ्य॑वान व्यक्ति होता है। 


. विरोध के सामने विरोध लेकर चलने में जहां समय की 


बर्बादी है वहां मानसिक पतन भी कम नहीं । विरोध 
को विनोद समझ कर हंसते-हंसते उसको लांघ जाना 


: कायरता व कमजोरी नहीं बल्कि आत्म-बल का जीता 


न्प्पण 


ण्ड 


जागता उदाहरण है । 


. जो विरोध करने वाले हैं सम्भवतः उनके पास कोई काम 


नहीं वे निकम्मे बैठे हैं; अन्यथा वे विरोध करके कौनसी 
प्रगति कर लेंगे ? 


. हमारा विरोध केवल आडम्बर से, धर्म के नाम पर होने 


रू 


वाले अधामिक आचरण से और धर्म के वहाने किए जाने 
वाले स्वार्थ पोषण से है । 


१६२३ 


६ वही परिवार सुखी और सम्पत्तिशाली है, जहां एक... 
नेतृत्व के प्रति उसके सदस्य विनयी हैं । ” 


तिल 


विशिेध 


. विरोध एक संघषे है और संघर्ष से ही ज्योति पैदा 
होती है । 

२. जिस योजना का विरोध नहीं होता, वह पनप नहीं सकती | 
३. विरोध से घबराने वाले खत्म हो जाते हैं और उठकर 
उसका सामना करने वाले विजय प्राप्त कर लेते हैं । 

४.: विरोध के सामने विरोध लेकर बढ़ोगे तो वह बढ़ेगा और 

यदि उसको पीठ देकर अपना कार्य करते रहोगे तो वह 
अपने आप खत्म हो जायेगा । ह 
५. विरोध की स्थिति में घबरा जाने वाले दुनिया में कर _ 
भी क्‍या सकते हैं ? है 
६. जितने अवरोध प्रारम्भ में खड़े होते हैं उतने अार्ग. . 
नहीं रहते । 
७. विरोध को मैं लाभकारी समभता हूँ, क्योंकि वह शक्ति 
. को जागरूक रखता है । 


८. किसी को विरोधी मान कर उसके कार्य में बाधक मेंते 
बनो । विरोध अपना दोष है, उससे अपना.श्रहित होता है 


>> 


१६२ 


/रि7 


* १०. 


बा 
न 


ना 
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न्प्ज्ण 


जा 
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: मानव को शत्र मानना बुद्धि की कमी है। सजातीय 


तत्त्वों में विरोध नहीं होता । विरोध का आधार विजातीय 
तत्त्व हैं । 

भोग की वृत्ति से स्वार्थ, स्वार्थ से भेद और भेद से 
विरोध होता है । 


' जो विरोध का विरोध के द्वारा प्रतिकार नहीं करता 


वह अवश्य ही कोई सामर्थ्यवान व्यक्ति होता है । 


* विरोध के सामने विरोध लेकर चलने में जहां समय की 


बर्बादी है वहां मानसिक पतन भी कम नहीं । विरोध 
को विनोद समझ कर हंसते-हंसते उसको लांघ जाना 
कायरता व कमजोरी नहीं बल्कि आत्म-बल का जीता 
जागता उदाहरण है । 


: जो विरोध करने वाले हैं सम्भवत: उनके पास कोई काम 


नहीं वे निकम्मे बेठे हैं; अन्यथा वे विरोध करके कौनसी 
प्रगति कर लेंगे ? 


* हमारा विरोध केवल आडम्बर से, धर्म के नाम पर होने 


वाले भ्रधाभिक आचरणा से और धर्म के बहाने किए जाने 
वाले स्वार्थ पोषरणा से है । 


न 


का 


१६४ 


विवेक 


« आपकमें श्रद्धा है पर श्रद्धा के साथ-साथ सद्विवेक चाहिएं। . 
. आत्म-बल का विकास ज्ञान एवं विवेक -जाशति पर 


निर्भर है । ह 


मनुष्य के पास विवेक नामक एक विशिष्ट शक्ति है, 


जिसके द्वारा वह हेय क्‍या है, उपादेय क्या है, कार्य 
क्या है व अकारये क्‍या है-- इन सबका निरय कर 
सकता है । 


. भलाई और बुराई का विवेक होता मनुष्य के लिए 


अत्यन्त आवश्यक है । उनको जाने बिना भलाई का ग्रहण _ 
और बुराई का परिहार कैसे हो सकता है ? 


. मनुष्य विवेकी होने से बड़ा है किन्तु यदि वह विवेक 


झ्रात्म-जागृति में नहीं लगता है तो मनुष्य पशु से भी 
कहीं ज्यादा गया बीता है । । 


- विवेक ही वह विशेषता है जो मानवता झोर पशुता में 


भेद करती है। 


मे फाओआनिन (५ वोफलीकी 3०- कण 2तड७-२१००३7००० लिप ककशलब लीक जिफाा ० कमान... 2 का ||... ४“... 


७ विवेक के अभाव में व्यक्ति तजित, भमिन्दित और गहित 
' होता है। 


चकिव शान्ति 


१. हिसा के प्रचार के लिये आज जितने उपक्रम किये जा 
रहे हैं, अगर उतने अहिंसा के प्रचार के लिये किये 
जाय तो विदव शान्ति की पुकार नहीं करनी पड़ती । 

२. विश्व शान्ति का अर्थ अपना प्रश्न॒त्व बढ़ाना नहीं है । 

उसका अर्थ है-दूसरों के अधिकारों पर हाथ न उठाना । 





वश्वास 


. स्वयं विश्वासी बनो, यदि तुम में दूसरे के प्रति विश्वास 
है तो अवश्य ही दूसरे का विश्वास तुम्हें प्राप्त होगा । 

२. विश्वास आपसी व्यवहार का झल है । हे 

- सदू-विश्वास जीवन को सत्य पर डटे रहने की भरा 
देता है । 

४. विश्वास आचरण से पैदा होता 

उसे पैदा नहीं कर सकते । 


न 


दा; 


है । लेख और वक्तव्य 


५६० 


+*र9 


न्प्ण 


वीश्ता 


* किसी को मार देने में वीरता नहीं, वीरता है मार सकने 


पर भी नहीं मारने में । 


- सच्ची वीरता अपने आपको जीतने. में है । 
: सच्चा वीर और साहसी वही है, जो नैतिकता और सदा- . 


चरणा के मार्ग पर सत्यनिष्ठा के साथ खेलता हुश्रां 
कठिनाइयों, बाधाश्रों और असुविधाओ्ों की जरा भी . 
परवाह न करे । द 
किसी को मार डालना शूर-वीरता नहीं हैं, 
ही हो तब तो जंगली भेड़िया, बाघ, चीता आदि हिंसक 
पशु सबसे अधिक वीर माने जायेंगे । | 


५. मारना वीरता नहीं, मरना सीखना वीरता है । 
६. अहिंसक सच्चा वीर होता है, वह स्वयं मर कर दूसरे 


१६६ 


की वृत्ति को बदल देता है, हृदय परिवर्तित कर देता है। 


- हाथ में ढेला लेकर दूसरे का सिर फोड़ने वाला वीर - 


+ाचत 


ब्ण्ण 


ाड 


नहीं होता है। वीर वह होता है जो दूसरे के द्वारा अपना 
सिर फोड़े जाने पर भी सहिष्णुता और समभाव से उसे 
भेलता है । 


. वीरता दूसरे को वष्टट पहुंचाने में नहीं बल्कि हंसते- 


हंसते कष्टों का हलाहल पी जाते में है । 





व्यक्ति-क्षमाल 


. मानव जाति के दो अंग हैं -- स्त्री और पुरुष । दोनों 


में एक छोटा एक बड़ा नहीं हो सकता । पैरों से गति 


तभी सम्भव है जब दोनों समान हो, समाज-विकास 


में भी एक की हीनता अखरती है । 


 व्यक्ति-व्यक्ति का विकास ही समाज का विकास है ! 
- अध्यात्म एवं समाज जीवन के दो पहलू हैं, किन्तु जब 


सामाजिकता व्यक्ति के अध्यात्मिक - बिकास में वाधक 
बन जाती है, तब उसका प्रतिकार करना ही होता है । 
व्यक्ति के परिमाजेन के बिना समाज की प्रिमार्जन कैसे 
सम्भव है ? व्यक्ति-व्यक्ति से ही समाज बनता है । समाज 
की मूल भित्ति व्यक्ति है । 


. जब तक व्यक्ति नहीं सुधरेगा तब तक समाज और राष्ट्र 


सुधार का नारा व्या अर्थ रखेगा ? 


१६७ 


हि 
री 
रू 


६. 


9. 


१४. 


श्ध्द 


व्यक्ति ही समष्टि का मूल है । । 
श्राज व्यक्ति का दृष्टिकोण ही गलत बनता जा-रहा है। . 
उसे जहां व्यक्तिवादी वनना चाहिए वहां वह समाजवादी 
बना और जहां समाजवादी बनना था; वहां. व्यक्तिवादी 
बन गया । अध्यात्म के मार्ग में जहां व्यक्तिवादी बनने . 
की अपेक्षा थो वहां वह समाज-सुधार की भावना ले 
वंठा और व्यक्तिवादी दृष्टिकोण को भूल बेठा। लोक- 
दृष्टि में जहां समाजवादी दृष्टिकोण की अपेक्षा थी वहां. 
व्यक्तिवादी बना क्‍योंकि वहां उसका अपना स्वार्थ सधता 
है, यह वतंमान की चिन्ताजनक स्थिति है । 


व्यक्ति के सुबरे बिना समाज सुधर नहीं सकता । 


. समाज-परिवर्तन की मूल भित्ति व्यक्ति का परिवर्तन है । 
. मानव-समाज को मिटा कर भौतिक स्वार्थ नहीं साधा 


जा सकता । 


. पुरुष और नारी समाज-रचना के आधार हैं । 
. स्त्री और पुरुष समाज रूपी रथ के दो पहिये हैं । 
. व्यक्ति का अस्तित्व अपना है और समाज का अस्तित्तव 


व्यक्ति है । व्यक्ति वस्तुवाद है और समाज सुविधावाद। 
व्यक्ति की आवश्यकता अपने आप पूरी नहीं हुई तब 
सापेक्ष स्थिति का उद्गम हुआ । सापेक्षता ने समाज 
को जन्म दिया । ह 
जो व्यक्ति दूसरों के अधिकारों को छीन कर, ऊँचे 
कर और शोषरापूर्वक अर्थ-संग्रह कर धन कुबेर बनने 
की लालसा रखता है, वह अध्यात्म से बहुत दूर है। 


35 ऋ८ कक इस्लटशडुकरा शहद न्‍फीरफर 3०-३० 


५०८2000275 5 #% 0४५४० ४४८१० 7+००४ ४३७७ ०४ ४५ ७४४४४ लक 


१७. 


१८. 


१६. 


२०. 


२१. 


२२. 


(५६. व्यक्ति-विकास को मैं समाज-विकास की नींव मानता हुं । 
. १६. 


असंयम और अनुशासनहीनता को जहां खुल कर खेलने 
का मौका मिलता है, वहां व्यक्ति, समाज या राष्ट्र अर्थ 
सम्पन्न होकर भी सुख और शाच्ति से सम्पन्न नहीं 
हो सकते । 

समाज का जागृत होना व्यक्ति पर निर्भर है । वयोंकि 
संम/|ज की मूल इकाई व्यक्ति है । 

धर्माचरण का असर जितना व्यक्ति पर होता हैं उतना 
ही समाज पर होता है। अनैतिकता को त्यागने का 
जितना असर व्यक्ति पर होता है उतना ही समाज पर 
भी होता है । 

समाज में प्रवेश पाकर व्यक्ति ज्यों-ज्यों अपनी दुर्बलता 
का प्रतिकार पाता है त्यों-त्यों महत्वकांक्षा और स्पर्धा 
उसे शक्ति संग्रह के लिए प्रेरित करने लग जाती है। 
जिस प्रकार तापमान शून्य डिग्री से नीचे चला जात 
है तो जीवन दुर्भर हो जाता है, उसी प्रकार समाज के 
अधिकांश व्यक्ति यदि सर्व साधारण नैतिक मान बिन्दु 
से नीचे खिसक आते हैं, तो समाज स्वस्थ नहीं रह सकता । 
आज 'लोग समाज में परिवर्तेन चाहते हैं, पर वे समाज 
की रीढ़-व्यक्ति की ओर नहीं देखते, जिसका कि सामूहिक 
रूप ही समाज है । 

जब [तक व्यक्ति में परिवर्तन नहीं आएगा, तब तक समान 
में परिव्तेन आ जाए, यह किसी प्रकार भी सम्भव नहीं । 


२३. व्यक्ति-परिवतेन के माध्यम से किया गया समाज-परि- 


खा २ 
१६६» 

ध डर 

के ् 


4 
रॉ 


अर 


वर्ततन चिरस्थायी होगा और व्यक्ति परिवर्तन की उपेक्षा : 
कर किया गया समाज-परिवर्तन दवे हुए रोग की तरह . 
भविष्य में अनेक समस्य|भञ्रों का उत्पादक बनेगा । 


कब 


२४. संसार को सुधारने के लिए हमें व्यक्ति से शुरुआत 
करनी होगी, क्योंकि संसार रूपी भवन की नींव व्यक्ति: 


ही है । 


व्यवहात्युद्धि-ग्राव्मगुद्धि 


१. व्यवहार-शुद्धि के लिए आत्म-शुद्धि होनी चाहिए । 2 
व्यवहार-शुद्धि के आन्दोलन से दोष दब जाते हैं पर 
उसकी जड़ नहीं मिटती । 


365५० 


ना 


द्र्त 


, ब्रत ग्रहण के पहले मनुष्यों को तदनुकूल भुमिका बनानी 


चाहिए । ब्रत एक बीज है । उ्वैरभूमि में बीज फलित 
होता है, उसके अभाव में वह नष्ठ हो जाता है । ब्रत 
बीज के लिए हृदय को उवेरभूमि बनाइये, अन्यथा त्रत 
फलीश्ूत नहीं होगा । 


. अजीर्णा की आशंका से क्या कोई कभी भोजन छोड़ता 


है ? पर किसी कारण से अजीर्णं होने पर उसको मिटाने 
का प्रयास किया जाता है। भविष्य में पुत: न होने 
का ध्यान रखा जाता है, वैसे ही बतों के भंग की. श्राशंका 


, से उसे अस्वीकार नहीं करना चाहिए, पर ध्यान. रखना 


नए 


चाहिए कि ब्रतों का भंग न ही । 


, मकान का कलई आदि से नवीनीकरर और टूट-फूट 


को मरम्मत से ठीक किया जाता है। वैसे ही प्रायदिचत्तों 
से ब्रतों को विशुद्ध और संकल्पों को दोहराने से उसका 
नवीनीकरण किया जाता है । 


४, नींव के बिना भवन नहीं रह सकता । इसी प्रकार ब्रत 


२०१ 


# 72 


१०. 


३. ब्रत लेने वाला कोरा ब्रतं ही नहीं लेता । 


के बिना सही माने में जीवन-विकास का भवन खड़ा नहीं . 
रह सकता । ॥ 


* ब्रत लेने मात्र से वे सफल नहीं होते । उनकी सफलता 


के लिए उनकी उपासना करनी होती 


 ब्रती बनने के वाद ईच्छायें सीमित नहीं होती, किन्तु 


ईच्छायें सीमित हो जाती है तभी ब्रती बनते हैं। 


 ब्रतों की साधना नदी की अधिरल धारा की तरह होनी 


चाहिए । वह क्या ब्रत-साधना जो थोड़ी दूर चल कर 
ही सूखने वाली नदी की तरह सूख जाये या रूक जाये। 
ब्रतों का धारावाहिक विकास ही जीवन में कुछ चेतना . 
लाता है और तभी उसमें निखार आता ह 


* ब्रत आवश्यकताओं की पूर्ति होने न होते से सम्बन्धित 


नहीं है, इसका सम्बन्ध आ्रात्मा की भावना से है । 


: प्रतिकुल प्रसंग उपस्थित होने पर भी मानसिक विकारों 


पर नियन्त्रण बनाए. रखना ब्रत की वास्तविकता एवं 
साहस का परिचय है । 

ब्रेतों का आन्दोलन कठिन होता है, यह मैं मानता हूँ. 
पर साथ-साथ यह भी मानता हूं कि उसके बिना कठि 
नाइयों का पार नहीं पाया जा सकता । 


. आज संसार को जिसकी आवश्यकता है, वह है मानसिक 


सन्तुलन । उसकी पूति ब्रत से ही सम्भव है । , 


१ २. ब्रती-समाज की कल्पना जिंतनी दुरूहं है, उतनी ही 


सुखद है । 
पहल वह 


0] 


म्र्ब् 


ल्‍्प्प 


|. प 


थे विवेक को जगाता है, श्रद्धा और संकल्प को दृढ़ करता 
है, कठिनाइयां भेलने की क्षमंता पैदा करता हैं, प्रवाह 
के प्रतिकूल चलने का साहस लाता है, फिर वह व्र्त 
लेता है।. 
: विलास, भोग, बड़प्पन और ऐशोआराम ब्रतों के शत्रु हैं । 
. ब्रतों का पालन शाब्दिक-बृत्ति से नहीं होना चाहिए । 
उनकी प्रात्मा का विकास होना चाहिए । 
६. ब्रतों का अपना स्वतन्त्र मूल्य है। भौतिक अभिसिद्धि 
के लिए उनका प्रयोग ब्॒तों की उच्चता का अपमान है । 
* केवल ब्रतों की गुण गाथा गा लेने मात्र से कुछ भी 
बनने का नहीं । 
अहिंसा का जीवन में आचरण ही ब्रत है । 
जो अवगुण आत्मा में घर कर गये हैं, उन्हें निकाल 
कर पुनः न आने देना ही ब्रत अ्रहरा का उद्देश्य है । 
. यह घरूल नहीं जाना चाहिए कि केंवल त्रत ग्रहण ही सब 
कुंड है । ब्रत तो जीवन की एक दिशा माई हैक 
* ब्र्त में महती शक्ति है । उत्तका विकास हुवे विना सुख 
और शान्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता । 
. ब्रत का सम्बन्ध हृदय से होता है। जब॑ किसी काये के 
प्रेति हृदय में विरोधी विचार पैदा होते हैं तव वह उससे 
पराइमुख होने की सोचता है । | 
, आत्मा से लालसा छूठे, भोग से मन हटे, यही वाध्तव 
में क्रत का स्वरूप है । 
 ब्रत एक प्रहरी है जो आने वाली बुराइयों को रोक कर 


२०३ 


२०. 


२६. 


ना 


मनुष्य की रक्षा करता है । 
जो ब्रत निभाने के लिए जीवन को भी नगण्य मानते 


हैं, उनके लिए असम्भव कुछ भी नहीं है । 


व्रत एक कवच है जिसे पहन कर मनुष्य कहीं भी चला 
जाये तो वह उसकी बुराइयों से रक्षा करने में. 
समर्थ रहेगा । 


व्रच-कानून 


 ब्रेत हृदय को छूता है, अ्रन्तर को पकड़ता है और जीवन 


को बदलता है । वहां कानन ऊपर से थोपा जाता 
बाह्य शरीर को पकड़ता है और भयभीत बनाता है। 


« कानून और ब्रत का एक लक्ष्य होते हुए भी अन्तर इतना 


है कि कानन किसी को हरा सकता है, जीत नहीं सकता, - 
ब्रत हराता नहीं, पर दूसरे को जीतता है । 


, व्यक्ति कानन को भंग करते नहीं हिचकता, पर लिये 


हुवे ब्रतों को तोड़ते समय उसकी आत्मा काँप उठती है। 


, भारतीय संस्कृति में व्रत भंग का व्यक्ति. को. जितना 


.. भय है उतना कानून का नहीं । 


इद्ाब 


. शराब की बोतल के खारे पानी ने मानव की मानवता 
का पानी: उतार ब्िया है । 


यदि आदमी .सुख से जीना चाहता तो वह शराब . 
जेसे हालाहल का परित्याग कर सनन्‍्तवाणी-सुधा-संजी वनी 
का पान करे । 

शराब से बचने का अर्थ हैं--अपने को गिरावट से बचाना 
और दु:खों से बचाना । 


_--क्ताएीनकिकी0क-- 


डत्रु 


. शत्र-सोव एक शल्य है जो पल पल चुभता रहता है, 
इसरे की अपेक्षा अपना अधिक ग्रनिष्ट करता है । 


. शत्रुता के हेतु हैं-स्वार्थ और अविश्वास । 


२०५ .. 


३. जो व्यक्ति झत्रुता का सिर-दर्द मोल लेना न चाहे, वह .- 
अपने स्वार्थों को सीमित करे । सीमा की परिभाषा है- 
दूसरे के स्वार्थों को आघात पहुंचे, वहां तक न जाएं । 

४. बेर से अनिष्ट दूसरे का नहीं होता, अपना होता है। 

५. यदि मनुष्य अपने आप किसी की हिसा न करे तो उसका 
कोई भी जात्रु नहीं है । 


बी. प्रे॥0:०2६-० 


हक 


१. सच्चा शासक वह है जो अपने पर अनुशासन करे ] 


झातठत्र 


१. आततायी की हिंसा का विधान करने वाला शास्त्रया 
शास्त्र का निर्दिष्ट अंश समाज-शआ्वास्त्र हो सकता है 


धमंशास्त्र नहीं । 
२. धममे-शास्त्र किसी भो परिस्थिति में हिंसा का विवान: 
नहीं कर सकत। । 


२०६ 


न] 


] 


शिक्षा 


शिक्षा का उद्देश्य स्वयं को सुसंस्कृत बताना है । 


. शिक्षा ही गम्भीरता की जननी है । 


३ शिक्षा जबानी नहीं होनी चाहिए । वह अध्यापकों एवं 


्द्धात 


अभिभावकों के आचरणा में उतर कर बच्चों के सामने 
ग्रानी चाहिए । उनकी झ्रावाज ऊपरी न होकर हृदय 
की आवाज होनी चाहिए । 


. आप अपना जीवन विनम्र और अनुशासन-प्रिय बनायें, 


अपने आपको सुनागरिक बतायें और उत्तरोतर आत्मो- 
न्नति करते जायें, इसी में शिक्षा पाने की सफलता है । 


. शिक्षा का प्रथम उद्देश्य जीवन का विकास है | 
. ज्ञात और शिक्षा का लक्ष्य है-जीवन उन्नत, विकसित 


और पविन्न बने । 


. शिक्षा की सफलता और सुरूपता के लिए. मैं तीन बातों 


को आवश्यक मानता. हूँ--शिक्षा अध्यात्मवाद का आया: 
लेती हुई हो, शिक्षकों का चरित्र निर्मेल हो, ताकि वे 


२०२ 


१०. 


११. 
१२. 


१३१ व 


१४: 


हर. 


१७. 
१ प 


श्ष् 


२०. ह 


२०८ 


शिक्षाथियों के समक्ष स्वयं एक मृत्त आ्रादर्श हो, शिक्षार्थी 
सदाचार एवं संयम के प्रति निष्ठावान हों अर्थात्‌ बहि 
मुख न होकर वे अन्‍्तमुखी वृत्ति वाले हों । । 


" शिक्षा का लक्ष्य जीवन-निर्माण होना चाहिए 
- पुस्तकों में अक्षर-ज्ञान है, पर शिक्षा नहीं । शिक्षा तो . 


जीवन से मिलती है । 

शिक्षा जीवन-वूटी है जिसके द्वारा व्यक्ति का जीवन 
सात्विक और सुसंस्कारी बनता है । 

वह ज्ञान या शिक्षा जड़ है जो सदाचरण से सुनी हो । 
शिक्षा जीवन शोधन का अन्यतम साधन है । 

पर अर्जन करने वाला व्यक्ति बड़ा विद्वान बन सकंता है, - 
लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह शिक्षित हो. । इसके 
प्रतिकुल श्रल्प विद्या वाला व्यक्ति शिक्षित हो सकता है । 
जीवन का हर व्यवहार यदि सवृ-शिक्षा से अभिप्रेरित . 
हो तो उसमें असंयम के लिए स्थान नहीं रहता । 
शिक्षा कहनी और करनी की भेद-रेखा को तोड़ती है। 
जहां यह रेखा नहीं टूटी, करना कुछ, कहना कुछ, ऐसा 
रहा, वहां शिक्षा का ध्येय पूरा नहीं हुआ । 


, सक्रिय-शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है।' 


अक्षर-बोध शिक्षा का साधन है, शिक्षा नहीं । 


शिक्षा से गुण-दोष की परख आती है, हेय-अआदेय की 


भावना जागृत होती है । 
आजीविका शिक्षा का उद्देश्य नहीं है 
शिक्षा रूपी मुक्ताफलं आध्यात्मिकंता के धागे में पिरोये 


जाते हैं, तभी वह जन-मन-हारी हार बन हंदय को 


- सुअलंकृत कर सकते हें । 


बी 


विद्या और शिक्षा में अन्तर है । विद्या को आशय है 


पढ़ना, किसी तत्त्व को जानना और शिक्षा का तात्पये 
है जाने हुए तत्त्व का पुनः व्यवहार -जस में अभ्यास 


'करना, उसे जीवन में उतारना । 


झान्ति 


, विश्व के सस्मुख दो ही मार्ग हैं -- हिंसा और अहिंसा । 


हिंसा विनाश का पथ है, अहिसा निर्माण का । एक 
प्रशान्ति और अराजकता उत्पन्न करता है तो इंसरा 
शान्ति और व्यवस्था । 


- मौत के तख्ते पर चढ़ा हुआ खू खार दस्उ भी जीवन- 
दान की बात सुन शान्ति अनुभव करता है । 
, यदि विश्व को विनाश से बचा कर शान्ति से श्राष्ठावित 


करना है तो हमें जातीय, प्रान्तीय, वर्गीय और भाषाई- 


भेदों का परित्याग कर आदर्श और व्यवहार का सामैं- 


- जस्य करना होगा । 


४. एक झ्ञान्त व्यक्ति विद्व-्शान्ति के निमित्त बनता है 
.. और एक अशान्त व्यक्ति अशान्‍्त विश्व का । 


२०६ 


हद 


१० 


(२ 


१३. 


२१० 


* शान्ति का साधन उदजन बम;:राकेट स्पुतनिक: आदि 


कोई भी घातक शस्त्र नहीं-है, उसका साधन अहिसा है। 


शान्ति आने का एक ही सही मार्ग है--अहिसा का 
अ्वलम्बन । 


- जीवन में सत्य की खोज की जाय और उसे जीवन में - 


उत्तारा जाए 


- मनुष्य अपने अधिकारों-से वाहर न जाये तभी शान्ति 


की पुकार सफल हो सकती है । 


चारों ओर जश्ञान्ति की प्रकार है , पर शान्ति का मार्ग 


नहीं मिल रहा है, क्योंकि जहां पर शान्ति की खोज है 

वहां शान्ति नहों और जहां शान्ति है, वहां उसे पाने की 

खोज नहीं । । मु ह 

दूसरे की शान्ति लूटकर अगर कोई स्वयं झान्ति पाना 
चाहता है तो वह श्ञान्ति टिकती नहीं ।. ..... 


- शान्ति का मार्ग है अपने श्रधिकारों में. सन्‍्तोष करना 


इसरों के अधिकारों को न हड़पना और सहिष्णुता रखना । 
आन्तरिक-श्ान्ति का एक मात्र सावन है--भर्म, यदि- उसके 
साथ सौदे वाजी न कर उसका सही माने में जीवन में 
प्रयोग किया जाय । 

बिना सन्‍्तोष के शान्ति नहीं ।-विना आत्मा पर नियंत्रण 
किये तृष्णा की ग्राग भभकती. ही. रहेगी और उसमें 
परम स्वर्गीय शान्ति स्वाहा होती रहेगी । 


« सचमुच यदि मनुष्य को शान्तिःचाहिए तो: सबसे, पहले 
अपेक्षा है कि तदनुकूल श्रद्धा बनाए और अपनी चेतना 


५८७8२ जल कक 2८) 60« #फलल ८ कक बह 2 6 


को प्रबुद्ध करे। 
४ पिलोॉसिता का जीवन जोने वाले केभी शान्ति को छू तक 
नहीं सकेते। हे कक ० 

६. शान्ति का श्रोत आत्मा है, वह श्रोत भौतिक साधनों में 

नहीं ड हे पर 

सख-सुविधा या आवश्यकता की पूर्ति जीवन-निर्वाह का 

: साधने अवश्य है, पर वह शान्ति की मंजिल नहीं। ह 

(८ शान्ति को बाधक तत्त्व उन्मांद का व्योमोह है । 

१६. शान्ति का प्रकाश अभय के साब्निध्य में फैलता है । 

२०. आत्मं-निर्माएं के बिना न तो शान्ति मिल सकती है और 
न सही अर्थ में जीवन का स्तर 'ऊचा उठ सकता है ! 

२१. जब तक जीवन-व्यवहार में दम्भ रहेगा, हिंसक द्ृत्तियाँ 

हेंगी 'तेव तक शान्ति का समावेश जीवन में हो संके यंह 
कम सम्भव लगंतां है । 

: २२. शान्ति अहिसा भर संयम पर आधारित है । 

२३. जब तक असद-वृत्तियां खुली रहेगी तब तक शान्ति का 
निर्बाध पथ पाना असंम्भव है। 

२४. तृष्णा और आर्काक्षो का गुलाम बना मानव धन कुबेर 
होने पर भी शान्ति का उतता अनुभव नहीं कर वकेत: 
जितना कि एक सन्तोषी निर्धत होने पर भी कर सकता हैं । 

२५: शॉन्ति का साधने सौमेरंस्य है। सौम॑नस्य का ताए ह 
हम दूसरों के अपराधों की गांठ बाँध ने बेछे। ' | 

६ वास्तविक शाच्ति घन में नहीं; संयम, सादंगी और सात्विंक 
वृत्तियों में है। कार कक शक 7 


हत #ाछ 


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२११ 


२७. 


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२६. 


३०. 


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जर. 
३३. 
३४. 
३५ 
३६. 


5) डे 3. 


२१२ 


जो मनुष्य अपनी बाहरी प्रवृत्तियों पर जितना अंकुश लगा 


सकेगा, वह उतनी ही शान्ति का अनुभव कर सकेगा। 


मानसिक समाधि के बिना शान्ति नहीं होती | 
मानवीय विचारणा का सर्वोपरि मूक और मध्षुर परिषाक 
शान्ति है । ह 

शक्ति-सन्तुलन. शान्ति के प्रयोग का क्षरिौक उपशम भले 
ही करदे, किन्तु वह अकुतोभय झान्ति का मार्ग नहीं 
बनता । 


- बहुश्न॒तता के विना जीवन सरस नहीं वनता। वसे ही: 


आत्म-गुप्तता या स्थिर-प्रज्ञता के बिना जीवन में शान्ति 
नहीं आ्राती । 

सचमुच शान्ति चाहिए तो सबसे पहली अपेक्षा है कि उसके 
अनुकूल श्रद्धा बने और चेतना जागे। 

शान्ति का साधन भौतिक पदार्थ नहीं, अहिसा या समता 
है । 


शान्ति को खतरा मूढ़ता से है । मृढ़ता तब आ्ाती है 


जब शक्ति, अधिकार और पदार्थ के लिए मानव-मन कूम ' 


उठता है । 
शान्ति का साधन एकमात्र आत्मसंयम 

ईमानदारी का प्रयोग जीवन में सचमुच शक्ति का संचार 
करता है । ! 

शान्ति उस आह्वाद का नाम है जिससे आत्मा में जाग्रृति 
चेतनता, पवित्रता, हलकापन और मूल स्वरूप की अनुभूति 
होती है । 


३८. 


३६. 
, अपनी शान्ति के. लिए संग्रह कम करो । 
४९. 


न 


एक वह भी शान्ति संसार में कही जाती है जो भोतिक हर 
(पौद्गलिक ) इष्ट वस्तु प्राप्ति के संयोग से क्षणिक 
शारीरिक एवं मानसिक परितृष्ति के रूप में प्राणी के 
अनुभव में आती है परन्तु यह शान्ति, अशान्ति को 
कारणभूत होने से वास्तविक शान्ति नहीं है । 
आत्मशान्ति अन्तरात्मा से उद्भूत होती है । 


अपनी शान्ति के लिंए दूसरे की शान्ति का अपहरण 


.. मत करो । यही सच्ची शान्ति है । 


धर. 


ज्ाच्ति अपने आप में. साध्य और अपने आप में साधन 


है। वह कहीं बाह्य जगत में नहीं रहती और न बाहरी ' 


., वस्तुओं से वह मिल सकती है । 


४३. 


नये नये शस्त्रों के आविष्कार एवं निर्माण से कभी शान्ति 


« नहीं हो सकती । 


१.3. 
४५. 


४६. 


४७. 


शान्ति सम्तोष में है, लालसा में नहीं .। 


शान्ति कहीं वाहर से नहीं आयेगी । उसका खजाना आपकें 
पास है । ह 

जो सहन करने का मंत्र नहीं जानता वह शान्ति से जी 
नहीं सकता । की 

शान्ति का निवास-स्थल है धर्म । 


कज«+->+-+_्मकततत..+7 


र्र्रे 


शिक्ष! के कलंक 


१. आज की शिक्षण-पद्धति में ब्याप्त संयम-शृन्‍्यता का हों 
ह परिणाम है कि शञ्राज छात्र जगत में प्राय: उच्छ - 
खलता और आचारंहीनता परिव्यांप्त डे ४ 
२. उद्ृण्डता, उच्छू खलता, श्रविंनय और झनुशासनही नता-- 
ये शिक्षा के कलंक हैं । 
३. शिक्षा न्तिदोष होती है फिर भी विक्षार्थी या शिक्षित 
कहलाने वाले व्यक्ति सही अर्थ में शिक्षार्थी या शिक्षित 
नहीं हो तो शिक्षा के-सिर पर कलंक 'का -ठीका लगे 
बिना नहीं रहता । 


गिक्षा-केन्द्र 


१. शिक्षा-केन्द्र बह उबर - भूमि है जो यदि अपने उद्देश्यों 
का यथार्थ रूप में परिपालन करे तो योग्य व्यक्तियों 


२१४ 


पे 


के रूप में वे देश को बहुत ही बड़ी निधि दे सकते हैं । 


. शिक्षा. का सही- लक्ष्य जहां आत्म-विश्वास होना चाहिए, 


उसे वहां अधिकांशतः दृष्टि से ओकल रखा जा रहा है । 
यदि ऐसा नहीं होता और शिक्षा के केन्द्र इस. कमी से 
अछ्ते होते तो यह कब सम्भव था कि ऐसा नैतिक दुभिक्ष 
देश में झा जाता । ह 


जुद्धि 


, सरलता शुद्धि का मूल मन्त्र है | । 
. यह निविवाद सत्य है कि आत्मसंयम का पालन घः 


नहीं, कठिन है पर उसके विना उन्नति और शुद्धि भी 


सम्भव नहीं है । 


ना हे 


मा 


गरोौषण-कोन 


, शोषश नें करने वाला स्वयं: धन्य है, चाहे वह एक 


कौड़ी भी दान न दे। ' 


२१५ 


२. शोषण का पोषण करने वाले दानियों की अपेक्षा ग्रदानी 
बहुत श्रेष्ठ हैं । ४ 

३. शोषण का द्वार खुला रख कर दान करने वाला, हजारों 
को लूट कर कुछेक को देने वाला कभी धन्य नहीं हो 
सकता । । 


ग्रोषण- संग्रह 


१. मैं मानता हूँ कि शोषण और संग्रह आज की प्रमुख 
व भीषणशा समस्याएं हैं । किन्तु उसका स्थायी समाधान 
रक्त क्रान्ति नहीं हो सकता ।. रक्त क्रान्ति से समस्याएं - 
दूसरे रूप में उभरेगी ही, किन्तु जहां तक अहिसक क्रांन्ति 
का प्रश्न है वहां इसकों समूल नष्ट करने में शत-प्रति- 
शत सफल रहेगी, ऐसा मेरा विश्वास है ।.. 

२. महत्त्वाकांक्षा शोषण को जन्म देती है और शोषण 
अव्यवस्था को । | 

३. संग्रह और अशान्ति का उद्गम बिन्दु एक है| सामान्य 
स्थिति में वह अ्भिव्यक्त नहीं. होगा । संग्रह के बिन्दु 
इधर रेखा बनाते चलते हैं तो उधर अशान्ति भी अपनी 
रेखा पर बढ़ती जाती है । 

. ४. आपके. संग्रह, का अल्पीकरण अरखु झायुवों को श्रपनी 

मौत मरने की स्थिंतिं पंदा करेगा । ह 


२१६ 


र 5 


क्र] अं 


न्क्ा 


. उत्पीड़न और शोषण का कारण भोग: लिप्सा' है, मौतिक 


सुख-सुविधाओं के प्रति होने वाली आसक्ति है. 


- आवश्यकताएं बढ़ती हैं, वहां उनकी पूर्ति के लिए आशिक 


लिप्सा बढ़ती है त्तन शोषण बढ़ता है। शोषण चाहे 
व्यक्तितत, जातिगत और राष्ट्रीय--कैसा ही हो, उससे 
संघर्ष और दुर्भावना का जन्म हुवे बिचा नहीं रहता ॥ 


: जब त्तक दूसरों की अपेक्षा रहती है तब तके शोषण 
और दमन हुए बिना नहीं रह सकते ॥ 


हु 





श्रद्धा 


 एूध में घी कब से मिला यह कोई नहीं कह सकता ॥ 


किन्तु दूध के साथ स्तेह का होना निश्चित है और वह 


. भी श्रद्धा गम्य ही है | यदि प्रयंत्न करें तो अवश्य ही 


ल्थ्ण. 7 


श 


स्निग्घत्ब को दूध से अलग निकाल सकते हैं । उनके 


. निकालने का मार्ग -मन्यन प्रक्रिया है, ठीक उसी प्रकार 


आ्त्म-स्वरूप का दर्शव भी श्रद्धा, त्याथ और संयम से 
ही होगा । 


: श्रद्धा आत्म-विश्वास का अमोधष आधार है । 
, श्रद्धा के बिना क्रिया का फल नहीं मिलता । 


गुरु पर श्रद्धा रखे बिना ज्ञान नहीं आता, यदि आ.,भी 
जाये तो वह फलीभूत नहीं होता । 


२१७ 


१०. 
११. 
- दूसरा नहीं है । 


नस 


- श्रद्धा के बिना व्येक्ति ब्रती बन ही नहीं सकता । 
श्रद्धा के बिना चारित्र और आचार शुद्ध नहीं रहते । 
श्रद्धा का उत्कर्ष ग्रभय है । । 
 ज्यों-ज्यों श्रद्धा बढ़ती है त्यों-त्यों जीवन ब्रतमंय बनता 


जाता है । 


- श्रद्धा जहां स्वार्थ से जुड़ी रहती है वहां वह श्रद्धा का. 


रूप दिखाती है, पर वास्तव में वह श्रद्धा नहीं. होती । 
अगर किसी को कुछ पाना है तो वह श्रद्धालु बने । 
मेरी अनुभूति है श्रद्धा के बिना गति या प्रगति का मार्ग 


श्रद्धा--शगचाहर 


श्रद्धा के स्थान श्रद्धा और आचार के स्थान झ्राचार का 


महत्त्व है | श्रद्धा का कार्य आचार और आचार का 


. कार्य श्रद्धा नहीं कर सकती, दोनों का समन्वय रूप ही 


लक्ष्य प्राप्ति का सही साधन है । 


ग 


३१८ 


है. 


श्रद्धा--तर्क 


श्रद्धा और तर्क जीवन के दो पहलू हैं हे । जीवन में दोनों 
की अपेक्षा है । व्यवहारिक-जीवन में न केबल श्रद्धा 


. काम देती है और न केवल तक । दोनों का समन्वित 


रूप ही जीवन को समुच्नत बनाने में सहायक होता है। 
भ्रतः तक के साथ श्रद्धा की भूमिका होनी चाहिए और 
श्रद्धा भी कर्क की कसौटी पर कसी हुई होनी चाहिए।. 
श्रद्धाशून्य-तर्क व्यक्ति को सही मार्ग नहीं देता । 


. जो कार्य आस्था से बनने का होता है वह तक की धारा 


से नहीं बनता । 


२१६ 


; शर्म " 


९. ढूसरें के श्रम'कों छीनने की वृत्ति जब टूटर्ती हैं. तब 
अपने आप उसका जीवन आंत्म-निर्भर,,स्वावलम्बी और 
श्रमपूर्णा बन जाता है ॥ '. 

२ .जो व्यक्ति; अपने श्रम: पर प्रिर्भर रहता! है.वहः कभी 
महारम्भी और महापरिग्रही नहीं बनता ॥. - 

रे श्रम के दंवरा'जीवनाका सुख़पूर्वक निर्वाह.नहीं मानने से 

: चोरी आदि कुप्रवृत्तियां बढ़ती हैं ॥ . ह 

४८. श्रम. ही जीवन है - यह हमा रा घोष. हैः । परन्तु:श्रम. सात्विक 
होना.चाहिए, श्रम'से सभी कार्य- शक्‍्य, हैं । जो झ्रात्मा श्रमः 
में विश्वास करती है, उसके लिए, कुछ भी अशकक्‍य- नहीं 
और जो श्रम-से डरती है. उसे.सर्वत्र कठिनाइयांदिखलाई 
पड़ती है। 


स्र्० 


श्रांवंक 


(४. श्रावंक की पहिंचान है-पाप-भीरूता और अनाग्रह-बुर्दधि । 
२. श्रावकपन उसमें है जिंसमें त्योगः और जीवन: को संयभभय: 
बनाने का. प्रयत्न हो । | 


>> ल-साकामा:-क- 
है 


श्रोता-क्कां 


( मत्र-तत्र-सर्वेश्र बातें बनाने और सुननेवाले अनेक मिलते हैं 
किन्तु वास्तविक सुनने और सुनाने वाले मिलने कठिन हैं । 
₹ सुनाने वालों में यदि-त्याग और संयम को अंभांव हैं तथीं 


ः सुनने वालों में जिज्ञासों और विराग का प्रंभाव है तो ऐसी' 
स्थितिं में न सुनाने कॉले' का ही कोई महत्त्व हैं, व सुनने 
 अले-का ही |: के शक 


२२१ 


३. खेती के लिए उ्वेर-भूमि, अच्छे बीज और पर्याप्त वर्षा की 
अपेक्षा रहती है । इनमें से किसी एक- वस्तु के अभाव में - 
खेती नहीं हो सकती । इसी प्रकार सच्चेसु ननेवाले, सुनाने . 
वाले और सच्चे सिद्धान्तों के मिलने पर ही मानव-जीवन 
सफल और सार्थक बन सकता है, अन्यथा लहीं। 


बत-+. न. 





संकल्प 


१, अपनी बुराई को मिटाने के लिए स्व-संकल्प के अतिरिक्त 
दूसरा और कोई प्रयोग नहीं हो सकता । 
२. भविष्य में बुराइयां न आये; इसलिये संकल्प करना 


आवश्यक हैं । 
३. बिना संकल्प का मन बिना ब्रेक की मोटर के बराबर हे।. 


४. संकलपों को दोहराने.से ब्तों में हढ़ता और ताजगी श्राती 
५. संयम, नियमन और साधना-पूर्णा जीवन के लिए हृढ़ 
संकल्प की बहुत आवश्यकता हें । 
६. हढ़-संकल्प आदशों से नीचे सरकते हुए जीवन को सहारा 
देता है, उसमें अभितव बल का संचारकरता है। 
७. मैं प्रतिज्ञा को कमजोंरी नहीं मानता, बल्कि एक वहुत 
बड़ी वीरता मानता हूँ । । 


श्श्र 


प है 
न ६ ॥॒ 


१०. 


११. 


जो मनुष्य आगे का संकल्प नहीं कर सकता, वह अपने 
भविष्य के बारे में भी संदिग्ध है । 

वही मनुष्य प्रतिज्ञा कर सकता हैं, जो अपने मन को 
भविष्य में भी काबू रख सकता हू । 

हृढ़ निए्वयी और लगनशील व्यक्ति यदि अपने निश्चय 
और लगन से काम ले तो वह अपनी जीवन-वृत्तियों को 
सात्विकता की ओर मोड़ सकता है । 

संकल्प के बिना निष्ठा नहीं होती । निष्ठावान ही साधना 


' में सफल होता हैं। 


न््च्छि 


५ 


न 


संकीणेता 


मेरी दृष्टि में संकुचितता स्थान व बातों से नहीं, हृदय से 


हैं । यदि मनुष्य । है तो चाहे वह 
आती हूं । यदि मनुष्य का हृदय संकुचित हेत कर 
कितनी ही विश्वमेत्री की बात कर, वह विशाल नहीं बन 
सकता । 


. संकीर्णता और विशालता की पहचान बाहरी आकार 


नहीं हैं। दूरवीक्षण का संकड़ा काँच दर्शन देता हें, पे 
हम उसे संकीर्णा माने ? हमारी दृष्टि को का 2328: 
वह संकीर्ण नहीं होता । भले फिर उसका बाहरी जप ईे 


ही क्‍यों न हो । 


. बाहर की सारी वस्तुओं से हटकर अपने आप में चले 


जाना, यह संकोच का व्यापक रूप है | 


र२३े 


४. धर्म आत्म-शुद्धि का. प्रतीक है, वहाँ संकीर्ता व-अनुदारता 
है ही नहीं । ँ : 

५. आजकल एक नई सेंकीणंता और चल पड़ी है, चीज तो 
अंच्छी हैं, मगर यह अपने मत, अपने सम्प्रदाय. व अपने 
समाज की नहीं । अमुक मत, अमुक . सम्प्रदाय, व अमुक 
समाज-विश्येष की है, इसलिये ग्राह्मं नहीं ।. किसी के अच्छे 
तत्त्वों को भी शभ्रगर ऐसा समभकर अग्राह्य समझा जत्ता 
हैँ तो बुद्धि विपयर्य के सिवाय और कुछ नहीं । 


नील 


_अंयठन, 


१, संगठन सामुदायिक सावना का उत्तम श्रकार है भर 
उसे बनाए रखने के लिये मर्यादा आवश्यक है, वहाँ 
मर्यादा का साध्य संगठन और संगठन का- लक्ष्य साधना 


' बनती है । 
२. जहाँ पारस्परिक एकत्व है वहाँ झ्रानन्‍्द का निवास है 
३. भाडू एक एक तिनका मिलाकर बनता है । जब तक सब 
तिनके एक मुट्ठी में बन्धे हुए हैं, वे धर के कचरे को 
सांफ कर देते हैं, यदि.वे अलग-अलग बिखर. पड़ें त्तो 
जो कचरा निकालने वाले थे वे स्वयं कचरा बेन जाते हैं । 
». युवकों में जिस श्रकार शरीर वल है उसी प्रकार यदि 
: उनमें चरित्र-बल भी हो तो संगठन टिक सकता है । 


र्‌२४ 


/२2 


: १०. 


११. 


, संगठन का आधार चरित्र होना चाहिए । 
. जहाँ चरित्र की असमानता होगी वहाँ एकता हो नहीं 


सकती । 


, जिस संस्था में जितने अधिक चरित्रवान एवं निःस्वार्थ 


व्यक्ति होंगे वह संस्था उतनी ही ग्रधिक सजीव और 
दीर्घायु होगी । अन्यथा स्वार्थों के संघर्ष में संगठन 
कभी पिसकर मर जायेगा। 


, संगठन में अपने आपको महत्व नहीं दिया जाता वहाँ 


अपने अहं को गालना होता है । 


. केवल भावना से व्यक्ति चल सकता है, संघ नहीं चल 


सकता । 

संगठन का आधार प्रेम होता है, प्रेम का आधार विशु 
आचार । 

आधार की सुव्यवस्थित शइ खला में जकड़ा रहने वाला 
संगठन ही वास्तव में मजबूत, दीर्घकालिक और विशुद्ध 


संगठन होता है । 


द००>«__--_्म्ककििननना-+- 


संर्यात 


, मानव जैसी संगति करता है, वेसे ही ग्रुणावय॒ुर्त उसमें 


आते हैं । 


सत्संग क्या-क्या नहीं करता ? उससे बढ़कर दूसरी कोई 


चीज नहीं है। 


र्र२० 


5 


न 


न 


4० ५) 
३ “ए) 


भ 
शत 


+ 


सत्संग से बुद्धि की कृष्ठा दुर होती है, सत्य की प्रतिष्ठा हर 
होती है, गौरव की वृद्धि होती है; पाप दर होते हैं ओर 
दूर-दूर तक प्रतिष्ठा का संचार होता हैं ६ - 


- सत्संग में आकर ही मनुष्य श्रवरा से लेकर मोक्ष तक की 


सुदूर, ढुःसाध्य व दुष्प्राप्प मंजिल पर विजय को अंडा. 
फहरा सकता है | किन्तु यह सब होता है सन्‍्तों के नजदोक 
आनें से ही । '' - 5 


: जौ मनुष्यं सच्चे सन्‍्तों की संगत पाकर भी उतना लाभ 


नहीं उठाता जितना उसे उठाना चाहिए तो उससे बड़ा 
ग्रभागों कौन होगा ? 000 4 


. सत्संगति मनुष्य की जड़ता का सफाया कर आत्मोन्नति 


का उत्तम से उत्तम साधन है। 


बम बा । 





बन. ++ ड 


. संघर्ष ही भेद लाता है-छोटा या बड़ा, बौद्धिक या काग्रिक । 
: किसी भी प्रकार के पारस्परिक संघर्ष में अशान्ति, 


असनन्‍्तोष एवं विनाश के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं हो 
सकता | * ' ' | 


. संधर्षों से शान्ति आ नहीं सकती । 


जहाँ भ्ेद-हष्टि को प्रमुखता दी जाती है वहाँ साम्प्रदायिक 
झगड़े और संघर्ष पैदा होते हैं । ह 


| 


& 
हि 


ही यदि जीवन में संघर्ष श्राता है और विवेक के साथ उसका: 


छल 


८ 


रा 


- १२. 


१३. 


१४. 


. नहीं आ सकती ॥ 


नाप 


सामना किया जाता है,तो वह एक अभिनव ज्योति द्वेता हे 
पर यदि अविवेक से यों ही, संघर्ष खड़ा किया जाता है 
तो उससे शक्ति का दुरुपयोग होता 


संघर्ष से भागना या अनावश्यक संघर्ष मोल लेना दोनों ही 


अनुचित है।. : 


. भौतिक, उन्नति के भवन का निर्माण आश्चक्ति की ईंटों 


से होता है । 
जहाँ आशक्ति है, राग-ह्वेष का, प़ाबल्य है. और है तव मम 
का सीमातीत भेद - वहाँ उहग है, संघर्ष है, दमन हैं, युद्ध 
हुँ और अंशान्ति हैं। 


5 


 बलात दूसरों पर अपनी, संस्कृति या वाद लादने की चेष्टा 


करना संघषे का दूसरा रूप हू. | 


, वर्ग-संघर्ष जैसी विकट समस्या अहिंसा -और,संन्तोष का 


पथ लिये बिना स्थायी रूप से सुंलक नहीं सकती । 


संघर्ष अ्शान्ति का मूल हैं ।  ; ; हद 


जहाँ दो हैं वहाँ संघर्ष है.। बिना संघर्ष के जीवन में चमक 


संघर्ष का हेतु विविधता या भेद हैं । श 
संघर्ष के परिणाम हैं-चिनगारी, ताप और सर्वेस्व ताहा । 


जज मच ऑणण 


न हु 


बंहुष्टि. 


आवश्यकताओं को प्रुत्त करके हम सन्तुष्ट बन सकें यह. 
कभी नहीं होगा । सन्तुष्टि व्यक्ति की अपनी होती है, 
' पदार्थ की नहीं।.. आल 
. सन्तुष्टि का मतलब है-स्वनियमंन श्र्थात्‌ स्वतंत्रता । 

, आ्रात्म-सन्तोष का एक मात्र मार्ग आत्म संयम है । 


छ 5 - ह 
द््क्ल 
, उपैक्षा सन्देह उत्पंत्न करती है । 


. संशयशील मनुष्य समाधि (आत्म शान्ति) को नहीं पा 


सकता । 
. संदेह से असहिष्णुता, असहिष्णुता से भय, भय से 


अशान्ति पैदा होती है । 


सम्प्रदाय 


१. सम्प्रदाय का अर्थ संकीर्णे ओर संकुचित बाड़ा-बन्दी नहीं 
है और न वह पारस्परिक वैमनस्य, संघर्ष और कलह 
फैलाने का हेतु है। उसका तो अर्थ है-गुई-कम (गुरु 
परम्परा) सत्य या यथार्थ के अच्वेषण की एक धारा। 

३. साम्प्रदायिक आग्रह जहाँ पलता है वहाँ तत्त्व-चिन्तन की 

ः दिशा नहीं बनती । तत्त्व-चिन्तन की दिशा बने बिना 
मूल्यांकन की दिशा सही नहीं बनती । 





 झ्यम 


१. चरित्र न. तो किसी दूसरी जगह से आता हैं और न 
खरीदा ही जा सकता है । 


२२६ 


१३. 


५१४ 


न 


* संयम का मतलब है--आत्म नियन्त्रण । जहां इसकी कमी 


होती है वहाँ अ्रथर्म की .उत्पति होती है। 


« संयम का. अभाव होने से घर घर में झगड़े होते हैं, समाज 


और राष्ट्र में विग्नह फेलते हैं |“. 
2 रे 


- संयम सच्चे सुख और शान्ति का हेतु है। , .,- 
- संयम से आत्मानुशासन पंदा होता है | आात्मानुशासन 


से स्वतंत्रता का स्त्रोत निकलता है। 


« संयम समाज का कानून नहीं, व्यक्ति की स्वमर्यादा है।, 
- असंयम के घोर अन्धकार में संयम की कुछे किरणों भी 


पथ निश्चित बना देती है। . . हे 


, संयम का लगाव न गरीबी से है न अमीरी से । इच्छाओं 


पर विजय हो--यही उसका स्वरूप है। 


हच आ अन्य 


- सयमी वही रह सकता है, जिसकी संयम. में श्रद्धा हो । 


.. संयम, जीवन में शान्ति लाने का अमोघ हेतु है-। ,सरबता, 
सादगी, सात्विक आदि इसीसे फलित होने वाले गुरा हैं ।.. 
, जिस प्रकार -मेघ. के साथ. विद्यत.का: निवास है, उसी 


प्रकार सयम के साथ सहज रूप में पुण्य विद्यमान रहता है। . 


. लौकिक रूप में संयम की उपयोगिता, है श्रौर उसके ग्रभाव 


के कारण ही विधान, कानून आदि की असफलताय 
होती है 0 2. , कह: न्‍ 

यदि झ्आापको ज॑वन की, विश्वंखलता को मिटाना है व उसे 
व्यवस्थित, नियमित और शान्तिमय बनाना है तो भ्रपनी 


वृत्तियों को संयमित बनाइए 
संयम की साधना ही शान्ति की साधना हैं। 


२३० . 


जह >च्चछक. /अजबाखक 


१७. 


>च्ट>जिक हु 


, सन्‍्यस्त जीवन संयम का सक्रिय प्रतीक है । 
, संयर्मित जीवन-चर्या की साधना के लिए सम्यक्‌-चिन्तन 


के साथ-साथ सम्यक-श्र और क्रियाशीलता की 
अपेक्षा है । | 


जहाँ आज भौतिकवाद का नारा है कि आवश्यकताए 
बढ़ाओ्रो, उद्योग बढ़ाओं ज़िससे समृद्ध बने। वहाँ हमारा 
यह हंढ़ विश्वांस है कि जितनी लालसा बढ़ेगी, मानव 

उतना ही दुःख होगा । सुख-शान्ति के लिए त्वार मार्ग 
पर ही आनो होगा, जोवन को सं यम॒ प्रधान बनाना होगा । 


. गरीबी दीनता है, इसलिए ग्रच्छी नहीं है। अमीरी 


शोष णार्जित है, वह भो अच्छो नहीं। अच्छा और से 
मांग संयम है।... 


. संयमशील जीवन अपनाना ही सच्ची श्रद्धाउजलि हैं। 


संयमशोल बनना ही सच्ची उपासना हैं 


. व्यक्ति के जीवन में अच्छे या बुरे सारे संस्कार अपने ही 


नहीं होते वरने कुछ संस्कार पैतृक या जस्सजाद भी 


' होते हैं। . £ 


२. सैस्कार ऊँचे होते हैं तो संस्कृति भी ऊँची बन जाती है । 


रे ५ हर 


| 


र्‌३१ 


यकृत 


: १. संस्कृत राष्ट्र को प्राध्यात्मिक निधि की संरक्षिका हैं। 
२. सस्क्ृत का केवल इसलिए महत्त्व नहीं कि वह हमारे देश 
की प्राचीन भाषा है, वरत्‌ उसका महत्त्व इसलिए है कि 
वह भारत के सांस्कृतिक जीवन का एक जीवित प्रतीक है। 


क्स्क्ाति 


१. आचार और विचार की रेखाएं बनती हैं और मिटती हैं। 
जो बनता है वह निश्चित मिंटता है, किन्तु मिटकर भी 
जो अमिट रहता है अपना संस्थान छोड़ जाता हूँ वह 


हेँ स स्कृति । 


र्३्२ 


. जब आचार नहीं तो विचार से क्या ख़ने ? * इसलिए थोथे- 


बिचारों के भेवर में न फंसकर, आचार प्ूूलक विचारों 
की भावना जागे, संयम और स्वशासन की वृत्ति 
बढ़े, यही सही अर्थ में स स्क्ृति के चिल्तन का सुकल है । 


, जैन सस्क्ृति आध्यात्म की सस्‍्क्ृति हैं । 


४. आध्यात्म मूलक संस्कृति में विकास के चार साधन हूँ. 


लज्ञा, दया, संयम और ब्रह्मचयें । लज्जा से मतलब बुरे 
कार्यों को करते हुए संकोच का अनुभव होना, दया से 
मतलब है सबको समन समभना, संयम का मतलब है 
पापाचरणों में जाती हुई आत्मा को शैकेना भोरं ब्रह्मचर्ये 
का मतलब है ब्रह्म की साधना । 


५. ससक्ृति जीवन का आचार पक्ष है । 
६. सस्‍्कृति एक ऐसा व्यापक तत्त्व है, जी भारतीय और 


डी 


अभारतीय नहीं हो सकता । 
ससस्‍्कृति का उपासक व्यक्ति आग्रही नहीं होता, वह 


: अच्छी वस्तु को हर कहीं से और हर समय ले सक्रता है। 
, जब तक कोई व्यक्ति वीतराग नहीं ही जाता तब तक 


- उसकी स स्क्ृति निताच्त संत्यं नहीं ही सकती । 


. स स्क्ृति के उपासंक व्यक्ति को आग्रह: शोभा नहीं-देता । 
१०. 


जो संस्कृति पुरुषार्थ की स स्क्ृति है, लिन्तन की संस्कृति 
है और समता की सस्‍्कृति है उसका नाम है-श्रमण- 
संस्कृति | 


११. संस्कृति का सर्वोच्च पक्ष आन्‍्तरिक-विकास है । 


ला 
न 
नए 


जज 


३ २. मजबूत संस्कृति की छत्र-छाया में पलने वाली सभ्यता ही 
'.. टिकाऊ बनती है। ह 
१३. भारतीय संस्कृति का लक्ष्य चरित्र-विकास है, . चरित्र को . 

ग़ंवाकर कुछ भी पा लेना यहाँ घाटेका सौदा माना गया है। 

१४. जन स स्क्ृति आत्म उत्सर्ग की. संस्कृति है । 

१५. दुःख मिटाने की बृत्ति और शोषण, उत्पीड़न तथा 
अपहरण साथ.२ चलते हैं। इधर शोषण और उधर दुःख 
मिटाने की वृत्ति यह उच्च संस्कति नहीं । 

- सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह--इस त्रिवेणी से उत्पन्न होने 
वाली संस्कति ही सर्वश्रेष्ठ हो सकती 

१७. संस्कति सदा एक रूप, रहती है और उसका एकमात्र कार्य 
. जीवन का परिमार्जन है।... 

१८. संस्कति भाव एवं भाषा का. संगम है, भाव जहाँ वेयक्तिक 
होता है वहाँ भाषा सामाजिक होती है । 
संस्कति.तो मांजने को-कहते हैं जिसके द्वारा जीवन एवं 
जीवन की पद्धति का संस्कार एवं परिमार्जन होता है। 
भारतीय संस्कति की विशेषता यह है कि उसमें किसी के 

अधिकार के अपहरण, राज्य सीमा विस्तार, विध्वंत्तक 
शब्रासत्रों आदि के निर्माण की शिक्षा नेंहीं दी जाती बल्कि 
हैय (त्याग) की शिक्षा दी जाती है। 


् 


१६ 


१९. 


२०. 


२३४ 


सच्चा मंगल 
है जो उसे आत्मशुद्धि की 


६ जोवन के लिए सच्चा मंगल वह 
झोर ले जाए । 


|. _->-ककवारआ-: 
सच्चा साम्यवाद 


१. आप अपने हित और सुख-सुविधाओं के लिए दूसरे का 
लूटें, यही सच्चा 


हित और सुख-सुविधाएं कभी न 
साम्यवाद है । 


. परत्य का फेल मधुर है और साधना कठिन । .... 
२. मनुष्य भूठ के बिना जीवित रह सकता है: पर सत्य के 


न्शि #ब ०८ ९० 


बिना नहीं । 
त्य का रूप एक है,.उसके शोधन अनैक । 


- सत्य की व्याप्ति एक है पर देश, काल और स्थितियां भ्रनेक । 
« मनुष्य के चिन्तन और वर्तंता में सच्चाई होनी चाहिए।. 
, संत्य-पथ के अनुसरण से' हीं सत्य॑ का लक्ष्य पूरा हों 


सकता है । 
ऋ्ूठ मत बीलो, पर ऐसा सत्य भी मत बोलो जिसमें हिसा 


' की संमवेश हों। 


सत्यअंहिसो. को वचनामु्ते या' भाव अग्रकेाशांनात्मक 
पहलू है । 


, जब तक जीवन में अहिसा नहीं आती, सबको समान 


मानने की भावना विकास-नहीं-पाती तब तक सत्य का 


भी आचरण नहीं होता । 


श्१्६ 


१, 


हर. 
रे: 


१४, 


१५. 
६: 


, सत्य में संदाचार का अखण्ड स्वरूप समांयां हुंभा है, 


उसका कोई भी अंशः सत्य. की सीमा से बाहर नहीं । सत्य 
कोई-छोटी-मोटी पगडण्डी नहीं, वह राजपथ है जिस पर 


आत्म-विश्वास के साथ अग्रसर हुआ जा सकता है। 


सत्य जितना उपादेय है उतना ही जटिल और छिपा हुआ 


हैं, उसको प्रकाश में लाने का एकमात्र साधन है--शैब्द । 


उसी-के सहारे सत्य का आदान-अरदान होता है। शब्द 
अपने आप में सत्य या असत्य, कुछ भी नहीं है। वक्ता की 
प्रवृत्ति से वह सत्य और असत्य बनता है। 


सत्य का अर्थ है--जैसा सोचे वैसा बोले । 


सच्चाई से काम नहीं चल सकेतां-यह आत्म-साहर्स: और 
आत्म-बल से'हीन व्यक्तियों की बाणी है।. .. 
सत्य का आचरण न करनेवाला इतना बुरा नहीं है 
जितना यह मानने वाला कि सत्य से जीवन में कॉम नहीं 
चल सकता । ४ 
सत्यवादी कहीं भी भयभीत नहीं होता । 
जहाँ सरलता है वहाँ सत्य है । 


च्जलपकिलिथ कर्क - 


सफेलता-भग्रफलंता 


: संफल का अथे है! निष्ठावान । 8 
- जीवन की 'सफेलता -इसी में है| कि मानव सह माने में 


अपने कल्याण या विकास के लिए ग्रागे बढ़े । 


२३७ 


३. सफलता की मूल पूंजी मानव की भावना हैं। 
४. आश्ावाद में सफलता रहती है.। ह 


, जो अपना सारा समय खानें-पीने और सोने जैसी तुच्छ- 


क्रियाओ्रों में ही गंवा देते हैं, जो न॑ सत्संग करते हैं, न सांहित्य .. 
अध्ययन, न आत्मलोचन और न आत्मानुसंधान, उनका 
जीवन बकरी के गले में पदा हुए स्तनों के समान बिल्कुल 


बेकार और निरर्थक है । जीवन: सफल और सार्थक उनका 


ही है जो अपने बहुमुल्य समय को. सतृप्रवृत्तियों में . 


लगाते हैं । | 


. दूसरे के दोष देखना सुगम है, पर अपने दुगु णों पर 


दृष्टिपात होना बड़ा ही कठिन है किन्तु जो इसमें निष्णात 
हो जाता है, वह प्रत्येक काम में बहुत शीघ्र सफल हो 


: सकता है। 


१०. 


. उद्देश्य की सफलता और उपल 


, यदि अन्य समस्याओं के साथ- 
- समाधान का पूरा सामंजस्य नहीं 


, चिन्तनपूर्वक किया. हुआ कार्य अधिक सफल होता है । 
८. लक्ष्य की ओर ओत-प्रोत (तल्लीन) हुए बिना उसमें. 


सफलता नहीं पा सकेंगे । 
ब्धि उसी कार्यक्रम मं 


निहित रहा करती है जो कार्यक्रम मनुष्य को उद्देश्य की 

सीमा में पहुंचाने की महानता रखता है । ह 
सफलता का यही. रहस्य है कि मानव-वबृत्तियों का संचालन, 
प्रवर्तेत और उसका रहन-सहन निर्धारित कार्यक्रम के 


अनुसार चले और स्थायी रहे । 
साथ चारित्रिक समस्या करे 


हीं हुआ तो सफलता नहीं 


(२ 
१३. 


' १४, 


जावन की सफलता है-आत्म-परिमार्जन, आत्मोज्वल्य । 
जो व्यक्ति अपना उत्तरदायित्त्व नहीं समभता,' वह किसी 


भी काये में सफल नहीं हो सकता । 


जब त्तक सब लोग स्वतन्त्र हृदय से लालसा का अवरोध 


- नहीं करेंगे, तव तक वे समाजवाद का समर्थन करनेवाले 


१५. 


हों, चाहे सास्यवाद का सम्मान करने वाले हों, चाहे 
जनतंत्र की मंत्रणा रखने वाले हों, चाहे और २ 
मनोवांछित वाद-विवादों की कल्पना करने वाले हों अमन 
चेन की कामना को सफल नहीं बना सकते । 

वीसवीं सदी का मानव स्वतंत्रता की रट लगाने में जितना 
सभ्य बना उतना सभ्य स्वतंत्रता की रक्षा में नहीं बना । 





कि 


: समस्वय उन तत्त्वों का होना चाहिये, जिनमें मिलने की 
क्षमता हो, जिनके मिलने का उपयोग हो ।: 

२: आग्रह-हीनता सम्वय और मेल का झावार है। . 

. भोग से सुख नहीं मिला तब त्याग श्राया, दूसरे जीते नहीं. . 


... गये तब अपनी विजय .की ओर ध्यान गये, हुकुमत 


.बुराइयां नहीं मिटा. सकी तव “अपने पर अपनी हुकुमत 


का पाठ पढ़ाया गया । आगऐसे आग नहीं बुझी, तब प्रेम 


से बुभाने की बात सूझी-। ये वे सूमें हैं जिनमें चेतन्य है, 
जीवन है, दो को एक में मिलाने: को क्षमता है। 


२३६ 


४ 


समच्वग्र :एक़ मेल ज़ोल वाला तत्त्व:है | वह सबको एक 


बनाता है, मिलाता है । 


. अहिसा की मीमांसा में स्थाह्वाद के अध्याय का योग 
अधिक़ महत्त्वपूर्रा है। इससे समनत्रग् की -हृष्टि और दूसरों 


के विज्ञारों को समझने की भावना -का महत्त्वपूर्ण विकास 
हुंआ है । 


स्र्म्मय 


, समय अपनी गति से चलंता है। अपने श्राप में उसका कोई 


मूल्य हो या नहीं किन्तु इसकी परिधि में जो रहते हैं 


उनके लिये समय ही बहुत मुल्यवान है। लाभान्वित वही 


हु होता है जो उंसका मूल्य आंक सके । 


, समय एक ऐसी अनोखी वस्तु है जिसकी कभी पूर्ति: नहीं 


की जा सकती । 


' काल में परिवर्तन नाम की ऐसी आलौकिक शक्ति विद्यमान 
है जिसके कारण वह पुरातत को नवीन और तवीन का 
पुरातन में परिणत करता ,हुआ, सदा अपना अस्ख 


बलित 


चक्र घुमाता रहता हू । 


52 


-ाछ 


- समय में कितनी बड़ी ताकत हैँ कि एक कुशल से कुशल 


और बलवान से -बलवात़ व्यक्ति -भी समयः को 
अविद्यमानता में कुछ नहीं कर सकता | अतएव व्यवहारिक 
जीवन में, काल द्रव्य जितता कीमती हैँ उतना दूसरा 
और क़ोई द्रव्य नहीं । 


- मनोनुकूल चर्चा में समय की ओर यान नहीं ज़ाता । 


समय का प्रश्न वहाँ उठता है जहाँ मन के प्रतिकूल 
स्थिति हो । 


समस्या का हल 


- भौतिक उपकरणों पर स्वत्त्व का विसर्जन करें तो हमारी 


सारी समस्याएं आध्यात्म व अहिसा से सुलक सकती हैं । 


: संघर्ष, विध्वंस व विप्लव के द्वारा' समस्याओं को सुलभाने 


का जो उपक्रम है, वह वास्तविक सुलभाव नहीं, वह तो 
उलभाव है। 


- प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति.के समक्ष अपनी २ समस्‍यायें होती है 


उन समस्याओं का हल उचित मानवीय तरीकों से ही 
होना चाहिए। 


बड़ी से बड़ी समस्या के समय भी यदि हिम्मत और 


आत्मबल से काम लिया जाय तो समाधान मिल सकता है। 


२४१ 


नर 


१. जोंवन की विकूट समस्याएं अहिसा, सत्य, मैंत्री और - 

,  संदुवृत्ति से ही सुलक सकती हैं. और यह सुलभन क्षेणिक 

.. नहीं शाइवत और चिरंतन होती है। ह | 

६. समस्याओं के समाधान के दो मार्ग हैं-नये आविष्कार 
और संयम । एक में सुख मर्यादित है, वह भी क्षणिक 

. ओर भौतिक | दूसरे में अ्रसीम सुखानुभूति है। 


कनन अर सच 


मह भ्रव्तित्व 


१. दोनों विरोधी तत्त्वों का साथ रहना ही संहग्रस्तित्त्व है । 


करन 





महयोग 


१. परस्पर सहयोग से प्रैम की भावना का विस्तार होता है 
.. तथा वह धर्म हो या ने हो पर व्यक्ति को धर्म के लि. 
”. सक्षम बंन ने में सहायक अवश्य होता है । 





सहिष्णुता असाहिष्णुत7 


. सहनशीलता सबसे बड़ी शक्ति हु । 

२. आज जो भी व्यक्ति बाणी को सहन कर लेतां है वही 
सहनशील हैं । 

. जो भी संदिग्ध होगा, वह सहिष्णु नहीं होगा । 

- असहिष्णुता से कलह होता हैँ, लड़ाइयां होती है और 
युद्ध होता हं। 

४. असहिष्णुता से बेर बढ़ता है, बेर से चरित्र में विकार और 
उससे सुख-शान्ति की रेखा क्षीण हो जाती है । 

» संकोर्णाता और साम्प्रदायिकता की भावना को मिटाने के 
लिए लोगों को चाहिए कि वे अपनी नीति मण्डनोत्मक 
रखें, अपने विचारों का मतभेद होने पर वातावररंग को 
खराब न बनाकर उसके प्रति सहिष्णु बने रहें। 


रेडे३ 


साधन? 


- साधना के उत्कर् को अर्थ है. विचारों में अनाग्रह बघंद़े, 


सत्य के अन्वेंषण की. वृत्ति बढ़े, औचार : में पवित्रता बढ़े 
और अहिसा एवं झ्रात्म स्थिरता की भावना बढ़े । 


- विद्या और अविद्या में जो अन्तर है उसे समझ लेना ही 


.- जीवन की सर्वोपरि साधना है। 


रृष्च 


. जो भी व्यक्ति श्पन्ता जीवन शान्ति पूर्ण ढंग से .बिताना 


चाहे, उसे साधना का अवलम्ब लेना ही चाहिए 


. साधना का पहला सूत्र -भी यही है कि मनुष्य परिस्थिति 


के रहते हुए भी मानवता की रक्षा करे । 


- आत्म-शुद्धि के साथ साथ जन-शुद्धि का कार्य करना बहुतें 


बड़ी कठोर साधना है । 


. धर्म की सहुंची साधना अपने जीवन को. अधिकाधिक 


अहिंसा, सच्चाई, शोषणहीनता, निःस्वार्थपरायणता 
तथा समता आदि गुणों से ऊंचा उठाने में है । 


« साधना आत्म-मर्यादा है | 


ग्राधु 


. साधु स्वयं उठे और दूसरों को उठाये, यह उनका प्रमुख 


कत्तंग्य है । 


. साधु सन्‍्तों का आगमन जहाँ कहीं होता है वह धर्म 


जागृति के लिए होता है, वे घुसी हुई बुराइयों को निकाल 


. फेंकने की प्रेरणा देते हैं, फिर सन्‍्त किसो वेष के हों 


न्ध्छ 


९ 


क्र 


किसी देश के हों यदि वास्तव में वे सन्त हैं, त्यागी हैं तो 
वंदतीय है अभिननन्‍्दनीय है। 


: साधु का वेष वन्दनीय नहीं होता। वन्दनीय हैं उनके 


आचार, गुर और साधना । | 

सन्‍्तों के पास सुनने से ही पाप-धर्मे, न्‍्याय-अन्याय, भलाई 
श्रौर बुराई का ज्ञान होता है। . । 

सच्चे साधु वे होते हैं, जो कंचन और कामिनी के त्यागी 
होते है। वे न तो सामाजिक प्रपंचों में पड़ते हैं और न 
राजनंतिक उलभनों में उलभकेर अपना संमय बर्बाद 
करते हैं । वे न ॒पूं जोप॑तियों के पिठलंग्गू होते हैं और न 


२४४ 


हक 


पू जी कही जानेवाली वस्तुओं से हो अ्रपता निजी गठबन्धन - 
जोड़ते हैं। वे निःस्वा्-भाव से प्रेरित होकर स्वकल्यारा 
के साथ-साथ एकमात्र परोपकार दृष्टि से जन कल्याण के 
लिए प्रतिपल अपनी मूल्यवान सेवायें प्रदान करते हैं । 

साधु अपने आप पर नियंत्रण रखते हैं और ओरों को : 
आत्म नियंत्रण का पाठ पढ़ाते हैं। 


७. साधु इसलिए सुखी होते हैं कि उनमें संग्रह-बृत्ति नहों होती । 
८. सन्‍्तों के लिए गमन और आगमन दोनों एक ही सरीखे 


(2 


१०. 


११. 


श्र. 
१३. 


२४६ 


हैं, आत्म साधना के साथ-साथ जन-कल्याण के लिए 
प्रयास करना उत्तका काम है। वे जहाँ भो जाते हैं वहाँ 


ही करते रहते हैं । 


« साधु किसी एक के नहीं, सबके हैं । 


साधु किसी सम्प्रदाय या जाति विशेष के नहीं होते वे तो 
जन-जन के हैं। वहाँ निर्धन-धनिक, मजदूर-व्यवंसायी 
पडित-अश्रपंडित, हरिजन या महाजन में किसी प्रकार का 
विभेद नहीं होता । 

वह साधु कोई ऊंचा साधु नहीं जो केवल लाखों का नेतृत्व : 
करे और मर्ठों में बेठा रहे । सच्चा साधु तो वह है जो 
अपने अ्नुयायियों के सुधार के लिए कुछ प्रयत्न करे। 
केवल समाज बनाने मात्र से ही कुछ हो जाने वाला नहीं 
यदि उन्होंने अपने मठों का मोह नहीं छोड़ा |... 
सन्‍्तों का जीवन आत्म-स्वतंत्रता का जीवन है। 

संतों के उपदेश, संतों की शिक्षाएं, श्रद्धालुओं के जीवन में 
साकार हो जाए यही उसके वास्तविक अ्रभिनन्दन है । 


3 नाक 


- क्राध्य-साधन: 


- साध्य को पाने के लिए साधन की छुद्धि बड़ा मं 


रखती है । 


: साधन-शुद्धि के बिना जीवन में पवित्रता नहीं भझ्राती । 
- अच्छे साध्य के लिए साधन भी अच्छे हों तभी सिद्धि 


: सुन्दर, ध्यापक और चिरस्थायी होगी । , 


न्च्द्ि 





मामन्तग्माही 


* भोगवादी-मनोवृत्ति, संग्रहवादी-मनोवृत्ति, व्यक्तिवादी- 


मनोवृत्ति और परिवारवादी-मनोवत्ति-ये सामरू तशाही 


्न्कै निश्चित परिणाम 


हे 


२४७ 


र्४्८ 


साहित्य-साहित्कार 


. साहित्यकार में असीम शक्ति है। पर उसकी सार्थकता 


तभी है जब वह उसका सही उपयोग करे। 


. साहित्य जीवन का एक मधुर और सरल पंहलू है। 


हृदय को जेसी आननन्‍दानुभूति साहित्यानुशीलन में होती 
है वेसी अन्यत्र नहीं । हा 


_अनन्‍नननन-«दीकमीमिप्लकीिलतनभात 


'व्िद्वान्त 


, सिद्धान्त से मौलिकंता नहीं ओती, मौलिकतों के आधार 


पर सिद्धान्त स्थिर होते हैं । 


, सिद्धान्तवादिता से आलोचना प्रतिफलित होती है और 


अनुभूति से मौलिकता | 


३. 


' प्रद्येक कदम में संक्रियतां होनीं चाहिए तभी उस सिद्धान्त 


शाइवत सिद्धान्त समय अथवा परिस्थिति वश बदल नहीं 
जाते. |: बदल; जाए तो शाइवत केसे ९ :. 

व्यक्ति की सूफ अपने दिमाग की सूक है । वह क्षरिणक है, 
बदलती रहती है। सिद्धान्त प्रवचन हैं, उनमें क्षरिणकता 
नहीं होती, स्थायित्व: होता है न 5 जाए 


का रूए निखर पाता है। 


आय >__भररएफपीस एच ीकअम्ना 


बुध 


हु आय क 


. सुख का अक्षय कोष हृदय है, वस्तुएं नहीं ।. 
. स्वयं पर स्वयं के अनुशासन बिना जीवन सुखमय नहीं 


हो सकता । । 


. स्वभाव में आना चिरस्तन और शाइवत सुख है | . 
. सुख आत्माःका मूल स्वभाव है । 77 हू 
. यदि आप सुखी बनना चाहते हैं तो दूसरों के सुख में वाघा 


ले पहुंचाएं। -:- 


, यदि आप धर्म के प्रति मजबूत रहेंगे तो सुख का हार 


- आज नहीं तो कल जरूर खुलेगा । 


र्ष€ 


१४. 
१६- 


५ 0 


२५० 


* सुख का श्रोत आ्रात्मिक स्वतंत्रता में है। वह जब तक नहों 


आती है तब तक बाह्य स्वतंत्रता मात्र से सुख सम्भव 
नहीं है । 


'प. एक व्यक्ति जिसकी बहुत कम आंय है फिर भी यदि उसमें . 


सनन्‍्तोष और आत्म-तुष्टि के भाव हैं तो वह कोव्याधीश 
से कहीं अधिक सुख और आनन्द में है।. 


* सुख का हेतु अभाव भी नहीं है, श्रतिभाव भी नहीं है 


लेकिन स्वभाव है। 


- सुख हमारा अविभाज्य गुण है। 
. अगर अपने को सुखी बनना है तो सुख के मार्ग पर चलो' 


निसन्देह सुखी बनोगे। 


. हम किसी को सखी बनाने का ठेका तो नहीं ले सकते . 


पर किसी के सख को लूटे तो नहीं । 


. सुख का हेतु अहिसा या मंत्री है, उसका आवार 


अनपहररणा है| 

याद रखिये, आप दूसरों के सुखों को लूटकर, खुद सुखी 
नहीं बन सकेंगे । ह 

आसक्ति की जितनी ही क्रमी होगी, सुखों की सहज प्राप्ति 
उत्तनी ही अधिक होगी । . . 

जो सुख अहिंसा, सत्य, शील, सदाचार जैसे गुणा की 
उपासना -ें है, वह भोगोपभोग में नहीं । 

सुख आत्मा का धर्म है, शरीर का नहीं। वह सच्ताप से 
पंदा होता है, धन से नहीं । 


श्८, 


यह हृढ़ सत्य है कि जब तक व्यक्ति स्वयं अपने लिए 


' पड़ने वाली प्रतिकृल स्थिति को दूसरों के लिए करता 


नाक 


हफ्ते 


लय 


ली 


रहेशा तब तक सम्भव नहीं है कि वह भी सुखी बन सके । 


खुक्क-कुलत -' 


- सुख दो और दुःख मिटाओ की भावना में श्रात्म-विजय 


का भाव नहीं होता 4 


: दु:ख मिटाने और सुखी बनाने की वृत्ति व्यवहारिक है 


किन्तु क्षुद्र-भांवना स्वार्थ और संकुचितजृत्ति को प्रश्नय 
देने वाली है। | 


. सुख मत लूटो, दुःख मत दो । इसे विकसित करो । इसका 


विकास होगा तो ढुःख मिटाओ-सुखी बचाओ की भावना 
अपने आप पूरी होगी। 


- सुख की अधिक लालसा भी.सुख का कारण नहीं, प्रत्युत 


दुःख का ही कारण बनती है । 


. इच्छा की अपरिसितता दुःख और इच्छाओं का निरोघध 


सुख है । 
जिसमें दुःख न हो, वही सुख है । 


सर्प 


हट 


१७०. 


38 


आत्म-संयंम का भाव और अभाव ही क्रमशः सूख शोर 
दुःख का कारंणः है . ४ | 5. ५०८ -,. ४ 
आत्म-स्वभाव में स्थित रहना ही सही सुख है और. 
परभाव में जाना श्रर्थात्‌ बाह्य विक्तारों में फंसना ही 
दुःख है । 


- किसी वस्तु को छीनकर एक व्यक्ति को त्याग के लिए 


विवश कर देना और स्वयं किसीः वस्तु का त्याग कर देना 
इन दोनों में बहुत अन्तर है। एँक में जहाँ घोर अशान्ति 
दुःख, खेद और असन्‍्तोष की ज्वालाएं फूटती रहती हैं वहाँ 

सरे में महाच्‌ शान्ति, सूख और सनन्‍्तोष की शीतल लहर 


उठती रहती हैं । 


सुख संध्या का लाल दक्षितिज है जिसके सश्चात्‌ घनघोर 
श्रन्धकार है और दुःख प्रात:काल का पुनीत प्रभात है 
जिसके परंचात्‌ उज्जवल प्रकाश ही प्रकाश है ! 


>>. ऋममाा-मपीणबीड-कीक--+नममनक, 


बुक्कग्रान्ति 


0 मद अ क | 


, जिस रास्ते से चलकर आप लोग आ्राज ज्ञान्ति और सुख 


प्राप्त करना चाहते हैं, वह मांग सुख. और शान्ति का मार्स 
नहीं है । सूख और शान्ति का मार्ग तो संतोप है। 


, असंयम और अनुशासनहीतता -को जहाँ खुलकर खेलने का 
मौका मिलता है वहाँ व्यक्ति, समाज था राष्ट्र अर्थ सम्पन्न 
होकर. भी सुख और शान्ति से सम्पन्न नहीं हो सकता । 


. वास्तविक सुख-शान्ति, आत्मिक-तुष्टि और. तृप्ति-सत्य, 
अहिसा, सादगी और सन्‍्तोषमय-आत्मवर्म .यानी 
अ्ध्यात्मवाद को आराधे व अपनाये बिना त्रिकाल में भी 
सम्भव नहीं हो सकती |... . 


४. आत्म-निर्मेलता शाइवत सुख और झात्ति का हेतु 


५. सुख वे चाहते हैं जो सुख संविधाओं को पाकर भी. अतृप्त 

हैं। जो गरीब और सुख-सुविधाओं से वंचित हैं वे-शान्ति 
की-चर्चा नहीं कर रहे हैं, उनकी चर्चा अभी संख-सुविधा 
'. के लिए चलती है। निम्न वर्ग असविधा से पीड़ित है और 
: उच्चवर्ग अ्शात्ति से । 


. संसार में कौन ऐसा व्यक्ति है जो सुख नहीं चाहता । 
प्राणीमात्र सख का अभिलाषी है पर जब तक वह शारनि 
के सही मार्ग पर आता नहीं तब तक उसे सख कंसे मिल 
सकता है ? 


. सुख तो आन्तरिक शान्ति से ही उपलब्ध है। वह परनिर्भर 
नहीं, आत्मनिर्भर है । 


. आज मानव को अपनी दुृत्ति बदलनी है, अपने जीवन का 

सिहावलोकन करना है, अपने अन्ततम को टंटोलना है 

, और उसमें रहे विकारों को साहस के साथ निकाल फेंकना 

. है। यही वह मार्ग है, जिसपर चलकर वह शान्ति पा 
सकता है और सख का साक्षात्कार कर सकता है । 


२०२ 


१०. 


११. 
१२. 


. (३ 


* शान्ति और सुख को वही पा सकता है जो झात्मस्थ होकर 


चले, लोभ, असन्तोष को त्यागंकर जो: निर्लोभी और 
सन्तोषी बने। 

आवश्यकताओं का जितना अल्पी क रण होगा, जीवन उतना 
ही शान्त एवं सुखमय बनेगा । 

शान्ति का मूल्य सुख से बहुत अधिक है। 

यदि संसार शान्ति शर सख चाहता है तो उसे श्रणुक्रतों 
के मार्ग पर आना होगा अन्यथा वह भटकता ही रहेगा। 
गाज मानव उन्नत होने के बजाय अभ्रवनत बन गया है। मैं . 
कहूँगा कि यदि मानव को सही रूप से सुख और शान्ति 


की प्यास है तो वह आत्म-दृष्टा बने । 


द १४. 


.. २५४ 


प्रत्येक व्यक्ति के सामने अपनी अपनी कठिनाइयां रहती 
हैं। बिना उनके सहे सुखी नहीं हो सकेंगे। जिस व्यक्ति 
ने इस तथ्य को समझ लिया है, वह निश्चय ही एक 
आन्तरिक शान्ति का अनुभव करेगा । ह 


सुधार 


| समाज का सधार डण्डे के बल से करना उचित नहीं, 


उससे समाज की रीढ़ टूट जाती है। सुधार तो अ्रन्तर से. 


होता है । 


- जे. 


| यदि अपने आपको न सुधार कर संसार को सुधारने का 


प्रयास किया जायेगा तो न संसार सुधरेगा और त्त 
सुधारक ही । 


. सुधार धर्म से सम्भव हैं । ह 
, धर्म को जीवन में उतारिये। सत्य, अहिंसा, क्षमा, सहन- 


शीलता--ऐसे धर्म-लक्षरों को अपनाइये । इसीमें जीवन 
का सुधार है, उद्धार है । + 


. सुधरे हुए लोगों को तो सुधारने की कोशिश सव करते हैं 


पर महत्त्व उन लोगों को सुधारने की चेष्टा का है जो 
सघरे हुए नहीं हैं, संस्कारवान नहीं हैं । आदिवासियों या 
वनवासियों के जीवन को संस्कारितः औरः शुद्ध बचाने का 
काम महत्त्वपूर्ण है । ' 


, व्यक्ति स्वयं अपना सुधार कर सके, ओरों को सुधार के 
. मार्ग पर आने की प्रेरणा दे सके, इसके लिए ज्ञान, चरित्र 


न 


तथा क्रियाशीलता-इन बातों की आवश्यकता हैं, । यहें 


वह जिवेणशी है जो जीवन में सच्ची पावतता एवं उत्तमता 


का संचार करवाती है । 


_ सुधार का मार्ग है--हृदय-परिवतेन और बुराइयों के प्रति 


घ्णा । 


. सुधार के तीन सूत्र हैं-आत्म-निरीक्षरण,. आत्म-आलोचन 


और संकल्प । ५ 


. मैं तो यह मानता हैँ कि व्यक्ति-सुवार ही सव सुधारों को 


सुदृढ़ भित्ति है। अगर व्यक्ति.सु्र होता चला गया तो 
क्या समाज और राष्ट्र का सुवार पीछे रहेगा ? 


श्र 


११. 
१२. 


१३. 
१६. 


१५. 
६: 


१७. 


श्फ, 
१६. 


५3 


: मनुष्य अपना- सुधार नहीं - चाहता, संमाज का सुधार 


चाहती ह। स्वंयं'को सुधारे बिना संमाज का सुधार नहीं 
हो संकेती। # ए ह 
यदि सच्ची लगन के साथ काम किया जाये तो बहुत कुछ 
सफलता मिल सकती हे । / 


यदि समता, मंत्री और एकत्व की भावना बढ़ेगी तो व्यक्ति, 
समाज ओर राष्ट्र सभी सधर जायेंगे । 


सुधार का सही माध्यम व्यक्ति-सुवार है। 

अपने आपके? सुधार का जहाँ प्रश्न आता है वहाँ प्रायः 
व्यक्ति पीछे खिंसके जाता है; किन्तु यह-होना नहीं:चाहिए 
इससे सुधार की-बातें.थोथी बन जाती हैं। . :&- 
सुधार के साधन व्रत हैं । व कक 

संधार का तरीकों तो यह है कि व्यक्ति अपने को शुद्ध 
बनोंये “अंपनें व्येवहांर को: पत्रित्र, सत्य, तथा उदार 
बनाकर ही वास्तविक सुधार का द्वार खोज सकता है । 


सुधारक होनां यह बहुते छोटी बात है, पर वास्तव में 


सुधरा हुआ होना बहुत बड़ी बांत है। 


जिसका जीव॑न अ्सयत बृत्तियों से घिरा हो, न उसे कभा 
शान्ति मिल सकती है ओर न वह॒दूसरों को ही सुधार का 


“ओरें ले जा सकेता है । 


आप भले ही बड़ी बड़ी योजनानायें बनाल पर आखिर 
उनका आवार तो व्यक्ति ही' रहेगा। अंत उसे सुधार 


बिना कोई भी सुधार सम्भव नहीं है । 


२४. 


२५. 


नी 


: सही सुधार कानून, बल या दण्ड से नहीं, हृदय 


परिवतंन से होता है । 


सही बात तो यही है कि सुधार कार्य सबसे पहले अपने 
जीवन से शुरु होता । 


- सुधार व्यक्तिगत और जातिगत दोनों प्रकार के होते हैं 


फिर भी दोनों की स्थिति एक सी नहीं होती । 

व्यक्तिगत सुधार हृदय परिवर्तन पूर्वक होता है, इसलिये 
वह स्थायी, स्वतंत्र और श्रात्मिक होता है, समष्टिगत सुधार 
बलात्‌ कृत होता है इसलिये वह अस्थायी, परतन्त्र और 
अनात्मीय होता है। 


स्वयं. सुधरे बिना दूसरे के सुधार की सोचना कल्पना की 
उड़ान से अधिक मूल्य नहीं रखता । 


आत्म-साधना या आत्म-सुधार के बिना दूसरों के उत्थान 


की बातें बनाना केवल आत्म विडंबना के अतिरिक्त कुछ 
भी नहीं । 


लुविध। वाद 


» जहाँ सुविधावाद भुख्य बना चहाँ यथार्थवाद टिक नहीं 


सकता । 


रश७ 


२८ 


* सहजता सुविधावाद है पर सुविधावाद स्थायी सुख को 


सर्जन नहीं करता । 





छुसल्ता 
* सेयम चर्या, सद्वृत्ति, सौजन्य ही सौन्दर्य या सुसज्जा है। 
« सच्ची भरूषा है-सादगी,. उत्तम विचार तथा उच्च- 
अआ्राचरण । ह 
४ (3 
सोन्दर्य 


. आवररणा से जो चीज सुन्दर लगती है उस सुन्दरता में 


सन्देह ही है । वास्तव में सुन्दर चीज वही है जो बिना 
आवरण के भी सुन्दर लगे । 


. प्राकृतिक-सौन्दर्य ही सहज सौन्दर्य है । 


््ल्न्डाौटटस्‍व७४४० 


मोशल्य 


. सौराज्य वह है कि देशवासी- लोग अपने शुद्ध धर्मांचरण 
में पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव करें। 

. सौराज्य का यह श्र है कि लोगों के आपसी भगड़ों का 
अन्त हो जाये । 

. सौराज्य वह है कि जिसमें सदाचःरी, अध्यात्मवाद के 
प्रचारक, पारमाथिक उपकार के कर्णबार, दुराचार से 
भय खाने वाले साधु पुरुषों का आदर हो । 


: सौराज्य वह है जिसमें एक दूसरे के प्रति घृणा फंलाने की 
चेष्टा न की जाय । 


. सौराज्य का अर्थ है लोग उच्छुखल न बने, ग्ुरुजनों का 
आअविनय न किया. जाय, अन्याय का आचरण न किया 
जाय, कोई किसी के द्वारा तिरस्कार की हृष्टि से न 
देखा जाय । 


हि 
रद 
१3 


स्माट्क 


१. यदि कोई सच्चा स्मारक हो सकता है तो वह यह कि. 
स्वयं अपने पूव॑जों के आ्राद्शों को अपने जीवन में उतारे 
और दूसरे लोगों को भी यही प्रेरणा दे । 


+--+->**+-यह 5) टेक +8०---० 


ग्वद्ोषदर्यी 


१. स्वदोषदर्शी वनो ? परदोष देखने से कभी श्ान्ति-हाथ 
नहीं लग सकती । 

२. स्वयं को देखने वाला ही आगे बढ़ सकता है, अपने आपका 
पूर्ण मानने वाले का विकास अवरूद्ध हो जाता है । 


«>-क्की. शुक्र. 


ब्वभाव वहन 


९. स्वयंकृत अ्रभाव में स्वभाव का दर्शन निकट से होता है । 


ढ्व्य 


१. स्वास्थ्य शब्द का अर्थ अपनी शब्द-रचना में निहित है। 
अपने स्वरूप में रहने वाला स्वस्थ होता है। स्वत्व से 
परत्व में जाना विक्ृति है, सम्पूर्ण विक्ृति न मिटे तव तक 
वह स्वस्थ नहीं कहलाता । 

२. अतीत का प्रायहिचित और भविष्य में वेसा न करने का 
संकल्प ही स्वस्थता का लक्षण है । 


->-#७छ>.-म्सफीधिए 8. 


२६१ 


स्वायव. 


* सन्‍्तों का स्वागत बाणी, शब्दों और पन्नों से नहीं होता, 
उनका स्वागत तो भक्ति से होता है । 

२. वास्तविक अभिननन्‍्दन हृदय का होता है । 

. सच्चा स्वागत तो मैं उनका मानता हूँ जहाँ जीवन में 
विकास की ओर गति दिखाई दे । 


, श्रकिचनों के स्वागत का सही तरीका उनके बताये मार्ग 
पर अग्रसर होने का संकल्प करना है । 


न 


स्वाधीनता 


, स्वाधीनता सबसे बड़ा आनन्द और सबसे बड़ा उल्लास है। 
. स्वाधीनता का फल केवल समृद्धि का विकास ही नहीं है, 
च्रित्र-विक्रास भी उसका फल है। 

आजादी का सच्चा महत्त्व आन्तरिक स्वतंत्रता और 
निबेन्धता में है । 

, धर्म को अपनाने से ही वास्तविक स्वतंत्रता का सूत्र श्राह्म 
होगा । 

. सच्ची स्वतंत्रता ढुगु सों की दासता से मुक्ति पाना है । 

. आन्तरिक स्वतंत्रता के बिना बाहरी स्वतंत्रता पूर्ण रूप से 
सफल नहीं हो सकती । 

;. नियमानुवर्तिता व मर्यादा के बिना स्वतंत्रता नहीं आती । 


. बिंजातीय -ंन्धन को तोड़ फेंके विना कोई भी आदमी 
स्वतंत्र नहीं होता । 


ले 
ल्‍्द 
शा 


१०. 


११. 


१२. 
१३. 


स्वतंत्रता का दीप व्यक्ति स्वातन्ज्य की वलि वेदी पर | 


जले तभी शान्ति रेखा विद्योतित होगी । 

जहाँ मर्यादाविहीन स्वतंत्रता आती है वहाँ संगठन की 
दीवार खोखली होने लगती है। ह 
अंतरंग स्वात्तनत्य के बिना हजार उपाय करने पर भी 
सुख सम्भव नहीं । | 
स्वतंत्र वह है जो न्याय के पीछे चलता है । 
स्वतंत्र वह है जो स्वार्थ के पीछे नहीं चलता । जिसे अपने 
स्वार्थ और तज्जन्य गुट में ही ईश्वर दर्शन होता है, विश्व- 
शान्ति और भलाई दीख पड़तो है वह परतंत्र है। 


ब्वार्थ 


१. स्वार्थों की भुल-भुलैया व्यक्ति को इतना गुम राह कर देती है 


कि धर्म जो शान्ति, मैत्रो, ऐक्य और समन्वय का साधन है 
उसे भी वह कलह और वैमनस्य की श्ृंखलाओं में वांध 
डालती है। इस भूल-भुलेया से परे होकर मानवः विवेक 
औरबुद्धि से काम ले, धर्म के सही स्वरूप को समझे तो 
जीवन में शान्ति और सुख का संचार होगा । 


रपट 


२. स्वार्थ व्यक्ति को अन्धा बचा देता है, इसके वश हो वह 
अपना विवेक खो बैठता है । 

३ स्वार्थ-साधना में संघर्ष हुए बिना नहीं रहते । 

४. जहाँ स्वार्थ पूत्ि का चक्र चला वहाँ हिसा ने अपना प्रसार 

:.. किया, अविश्वास ने जड़ जमाई, अ्रनैतिकता ने फेलाव 
पाया । फिर भला मानव-जीवन में सुख केसे बच 
सकता है । 

५. शान्ति का सबसे बड़ा बाधक-तत्त्व है-स्वार्थ । 

६. दूषित वायु-मण्डल में जैसे इवास भी दूषित हो जाता है, 
शरीर स्वस्थ नहीं रह पाता, वैसे ही स्वार्थ के वायुमण्डल 
में धर्म भी शुद्ध नहीं रह सकता । 


हित 


£, किसी के अर्थ को अनर्थ कर प्रसारित करना, किसी के 
प्रति आ्रान्ति फैलाना हिंसा है। 

२. हिंसा प्रतिहिसा की जन्मदाई है। यूरोप का इतिहास 
इसका ज्वलन्त प्रमाण है। रूस में लेनिन आया, स्टालिन 


२६२० 


१०. 


११. 


२६६ 


आया और उसके बांद खं रचेवं । स्टालिन ने लेनिन के _ 
लिए क्‍या किया और खबचेव॑ं ने स्टालिन के लिए क्‍या 
किया, यह किसी से छिपा नहीं है । । 


* हिंसा से हिसा नहीं मिट सकंती । 
परिस्थिति की बाध्यता के बिना हिंसा को त्यागने में जो 


प्रंकाश है वह बाध्यता की स्थिति में नहीं है । 


- कायिक और वाचिक हिसा से भी मानसिक हिंसा जटिल 


होती है । 


» जीवन-निर्वाह के साथनों का केन्द्रीकरण हगथ्ना, फलत 


शोषरा बढ़', हिंसा बढ़ी। 


एक बार जो व्यक्ति हिसा के क्षेत्र में उतर पड़ता है वह 


फिर सहजतया उसके चत्रव्यूह से बाहर नहीं निकल 
सकता । 


. हिसा का आकर्षण इसलिए है कि उससे भोगवृत्ति पलती. 


है, भोग-सामग्री परिग्रह-सापेक्ष है और परिग्रह हिसा- 
सापेक्ष है । 


. कोई किसी की असत्‌ टीका-टिप्पणी करता है, वह भी 


हिसा है । 

कोई किसी के विचारों को तोड़-मरोड़कर रखता है या 
किंसी पर आरोप लगाता है, वह भी एक प्रकार की 
वेचारिक हिसा है । । 

किसी के उत्कर्ष को न सहकर उमपके प्रति घणा का प्रचार 
करना हिसा है। 


१९. किसी के प्राणों का बध कर डालना हिंसा का स्थूल रूप 
.. है, किसी के प्रति मानसिक ओर वेचारिक असत्‌ प्रवृत्ति 


हिंसा का सूक्ष्म रूप है। 


» भोग स्वयं हिसा है, उसकी सुरक्षा के लिये हिंसा करनो 


पड़ती है।. 


' जाति का मद हिंसा है। 
विद्या का उनन्‍्माद हिसा है। 
यदि प्रत्यक्ष हिसा की भान्ति परोक्ष हिंता से भी घृणा 


होती तो जीवन इतना असत्यनिष्ठ और अप्रमारिक नहीं 
बनता । 


- अशान्ति की जड़ है हिसा । जड़ में जब हिंसा है, दुर्भाव 
'है; ढेष है तब ऊपर अहिसा, सदुभावना और प्रेम केसे 


था सकता है ? : 


- दबाव से लिया गया श्रम हिसा की कोटि में है। 

* गलत चिन्तन हिसा है। 

. हिसा की परिसमाप्ति अहिंसा में ही हो सकती है। 

स्पर्धा से संहार को बल मिलता है 

: जहां जय और पराजय की भावना होती है वहाँ हिंसा है । 
. हिंसा से आत्मा अपविन्र बनती है इसलिए हिंसा का 


निषेध किया गया । 


« हिंसा को मिटाना है, हिंसक को नहीं । हिंसक को मिटाना 
तो स्वयं हिसा है । 


- बाहरी झ्राकर्षण हिसा है । 


र६७ 


श्द्‌ 
२३. 


२६. 


३०. 
३१. 


३३. 


३४. 
३५. 


३६. 


श्र 


जहाँ विवशता है वहाँ स्पष्ट हिसा है। 
अनिवार्य हिसा भी हिसा है । 


* संकल्पज्ञा हिसा अ्रशान्ति का प्रमुख कारण है । 


जितनी असत्‌ प्रवृत्ति, आसक्ति, एवं अम॑त्रीपूर्ण आचरण 

है, वह सब हिसा है । ह 
किसी का बुरा सोचना भी हिसा है। 
अहिसा के लिए हिसा के प्रयोगात्मक साधन भी हिसा को 
ही जन्म देते हैं । 


: प्राणों के चले जाने मात्र को जो हिंसा मानते हैं वे उनके 


बच जाने मात्र को भी वास्तविक अहिंसा मान सकते हैं, . 
किन्तु जो व्यक्ति हिंसक की दृत्तियों के बिगाड़ और सुधार 
को ही हिंसा या अहिंसा मानते हैं, उनकी अन्तमु खी दृष्टि : 
में प्राणों की प्रमुखता नहीं रहती । 

हिंसा और स्वार्थ की नींव. पर खड़ा किया गया वाद भले 
हो आकर्षक लगता हो, अधिक टिक नहीं सकता। : 

बल प्रयोग द्वारा कसाई से बकरा छुड़ाना भी हिसा है। 
यदि ओरों को गिराना हिंसा है तो स्वयं का पतन करना 
भी हिसा है । 

आत्म-हत्या भी उसी प्रकार हिंसा है जिस प्रकार किसी 
दूसरे की ह॒त्या । ह 


४. ७७००८ 2० अकैबट की पिला 


हीन-भाव एवं अहमू:भाव 


: अहंकार और हीनता दोनों ही पाप हैं । 

, अपने को बड़ा मानना अभिमान है और हीन मानना 
कमजोरी । 

. ज्योंही अपने श्रापको अधिक महत्त्व देने की भावना जगी, 
त्योंही फूट पड़े बिचा नहीं रहेगी । 

. अहं वृत्ति में न्‍्याय नहीं देखा जाता, वहाँ तो यही सोचा 
जाता है कि किसी भी प्रकार से मेरा अहं सुरक्षित रहे । 

. अहंकार सात्विक गुणों को ढ़कता है, विकास का अवरोध 
करता है । 

अपने को हीन समझना, आत्मशक्ति को कुण्ठित करना है। 


२७० 


-द्वकष्य-पशिवर्द व 


* हृदय १रिवर्तेन हृदय से होग। । 
- हृदय-परिवतन की बात को भी बहुत बार लोग साधारण 


कहकर टाल देते हैं, पर किसी भी निर्माण का पूर्ण रूप 
हंदय-परिवतंन ही है। ह 


» जीवन को बदलना धर्म का एक प्रमुख लक्ष्य है, जो हृदय- 


परिवर्तन के मार्ग के सिवा सम्भव नहीं 


. हृदय-परिवर्तन कें अभाव में बलातू हुआ कोई भी कार्य 
'चिर॑स्थायी हो सके, ऐसा बहुत कम सम्भव है । 

. अध्यात्मिक दया का सम्बन्ध हृदय-परिवर्तंन है, परन्तु 
लौकिक दया का सम्बन्ध सिर्फ बचाने मात्र से है, हृदय 


परिवतंन से नहीं । 


. जब तक हिंसा करने वाले प्राणी का हृदय-परिवर्तन नहीं 


किया जायेगा तब तक सम्भव नहीं कि बह व्यक्ति श्रहिसक 
बन जाए। 


१०. 
११. 


१२. 


. अहिसा और द॑या. का सम्बन्ध वंस्तुत: हंदय प्रिवतेत 


से है । 


. मनुष्य की दृत्ति बदलने पर ही वास्तविक अहिसा की वृत्ति 


जागृत हो सकती है । 


मनुष्य की वृत्तियाँ बदलना ही अहिंसा और दया की 


सच्ची साधना है । 

हृदय बदले बिना कोरी कागजी कार्यवाहियों से कुछ बनने 
का नहीं । 

आ्रात्मिक दुव्यंवस्था प्रिसमाप्ति का एकमात्र साधन हृदय 
परिवतंन ही है । 

हृदय परिवर्तत जीवन सुधार का सच्चा मार्ग है। 


लेय-सेय-उपावेय 


. हेय-ज्ञोय और उपादेय को समभते हुए व्यक्ति आत्मनिष्ठ 


बने, आत्म जागरण और शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति के लिये 
प्रयत्नशील हों, इसी-में उनके दार्शनिक अनुशीलन की 
साथेकता है । 


७ 
छत 
७ 





२. जानने हे दृष्टि से व्यक्ति को प्रत्येक बात जाननी चाहिए द 
पर उसमें जो अ्रहितकर हो उसका परित्याग करना 
चाहिए । 


क्षमता-क्षमापत्रा 


९. क्षमा-याचना एक पक्षोय होती है, किन्तु क्षमत-क्षमापनरा 
उभय-पक्षीय । वहाँ व्यक्ति दूसरों से क्षमा लेते हैं तो उसे 
क्षमा-दान देना भी पड़ता है। ह 

२. क्षमत-क्षमापना अन्तर श्रात्मा से हो, अन्यथा वह केवल 
होठों का व्यायाम व निराशव्दाडम्बर मात्र होगा।. 

३ इक तरफी क्षमा-याचना गुलामी की निशानी है । खुद 
क्षमा मांगे और दूसरों को क्षमा करे-यह एक तरल है, 
जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनाए, जीवन में उतारे । 


४. अपनी गलतियों के लिए क्षमा लें और उनकी गलतियों के 
लिए उन्हें क्षमा दें -यह क्षमत-क्षमापना का महा दूत है । 


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क्षमता 


१. दूसरों के लिए करने की क्षमता उन्हीं में हो सकती है, 
जो अपने लिए कुछ करें । 


२. कुछ कर गुजरने की क्षमता उनमें होती है, जिनका जीवन 
अहिंसा, सच्चाई और वन्यायपरायणता जैसे सदुगुणों से 
मंजा हो । 


क्षमा 


९. क्षमा-अहिसा का ही एक नाम है । 
९. क्षमा का मतलब समन्वय या मंत्री है। 


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० >्एछ 0) »७ 


६. 


८ धआ 


रण 


- लैसा सच्ची वीरता है । ह 
- अहिसा के विचार हिंसा पैदा करे यह उचित. नहीं, इस 


समस्या का निविकल्प समाधान है-क्षमा । 


* क्षेमाशील होना जैनत्व का सच्चा गौरव है। 


जान 


. यथार्थ एवं सार्थक ज्ञान वह है जो आचार संवलित है। 
, शान तभी फल लायेगा जब जीवन पवित्र होगा । 
, ज्ञानाभाव में जीवन बृनन्‍्य रहता है। 


मानव यदि कुछ करना चाहता है तो पहले वह ज्ञानोपार्जन 
करे। 


, जीवन में ज्ञानाराधन का बहुत बड़ा महत्त्व है, जब तक 


जीवन में ज्ञान का समावेश नहीं होता तब तक मनुष्य 
सही और गलत मार्ग की पहचान नहीं कर सकता | हैय॑ 
और उपादेय तत्त्व का ज्ञान नहीं पा सकता, अतः पहले 
ज्ञानी बनो, फिर दयावान । 

सद्ज्ञान जीवन में सन्मार्ग प्रदर्शित करता है। चरित्र के 
मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए ज्ञान प्रेरणा स्त्रोत है । 


बिना ज्ञान के श्रद्धा अधूरी है--अन्वी है । 


छठ, 


१० 


११. 


श्२. 


१३. 
१४. 


१५. 


साक्षरता ज्ञान नहीं, वह तो ज्ञान का साधन मात्र है। ज्ञान 
तो वह है जिससे गुर-दोष की परख होती है, हेय-उपादेय 
की भावना जाग्रत होती है और हिताहित का बोध 


होता है । 


, आजीविका के लिए ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं, 


उसकी आवश्यकता तो आत्म-विकास और चरित्र-विकास 
के लिये है । 

बन्धनों को जानो और तोड़ो । जानना पहले आवश्यक है, 
बन्धनों को जाने वगैर तोड़ना सम्भव नहीं। तोड़े बिना 
आ्राजादी कहाँ ? और आजादी के अ्रभाव में गुलामी से. 
पिण्ड छूटता नहीं है इसलिए (ज्ञान) जानने की सबसे 
पहले आवश्यकता है । 

ज्ञान सिफं ज्ञान के लिए नहीं बल्कि ज्ञान जीवन के 
लिए है । 

जीवन को विकसित करने के लिए ज्ञान की सबसे अधिक 
आवश्यकता है । ज्ञान ही जीवन है, ज्ञान ही सार है, ज्ञान 
हो तत्त्व है और ज्ञान ही आत्म-निर्माण तथा आत्म- 
विकास का मुख्य साधन है । 

ज्ञान अपने आप में प्रकाशपुज है । 


ज्ञान के साथ जिनमें चरित्र नहीं है वे परमार्थ तो क्या 
व्यवहार में भी सफल नहीं हो सकते । 

ज्ञान और विज्ञान प्राप्त कर मनुष्य अहिसा और समता 
की आराधना करे यह उसका सही उपयोग है। 


. वह ज्ञान अजान है जो जीवन के अन्त रतम को नहों छुत्ता । 


रछ< 


१७. ज्ञान का घनीभूत रूप ही श्रद्धा है। 
१८. ज्ञान की अपूर्णाता ही अहं को जन्म देती है । 


कक नओणत-।।2 (७००० ««_न्‍_व 


ज्ञान-क्रिया 


१. ज्ञान के बिना क्रिया अन्धी है । 

२. क्रिया और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं । 

३. ज्ञान से प्रकाश मिलता है और चरित्र से जीवन ' 
होता है। ह 

४, ज्ञान की जीवन में ग्रादेयता है इसमें कोई संशय नह 
चरित्र-शन्य ज्ञान बेल की पीठ पर लदी उन पुस्तव 
जैसा है जिनका उपयोग उस बैल के लिए सिर्फ भार 
के अतिरिक्त कुछ नहीं है । 

५. मोक्ष के लिए ज्ञान और क्रिया की नितान्‍्त झ्रावश्यकता 


३४४४2. 
2220 





२७६ 


सम्मति 


'सीपीसुक्त' (आचार्य श्री तुलसी के भाषणों में से चुनी 
हुई बाणियाँ) की पाण्डुलिपी देखने को मिललीं। आचार्य 
श्री तुलसी देश के माने हुए आध्यात्मिक विचारक हैं । 
मुझे भी उनके भाषण सुनने का कई बार मौका सुलभ हुआ 
है। ससीपी सुक्त' में उनकी जो बाणियाँ संग्रहीत है वे 
बहुत उपयोगी हैं। जिस प्रकार विशाल समुद्र के गहन 
तल में छिपी सीप के अन्तस्तल में उज्ज्वल व प्रकाशमान 
मोती रहता है, ठीक यही उपमा में 'सीपी सुक्तां के लिए 
उपयुक्त समभता हूं । 


[एँ. 
व 


होते. इसके संग्रहकर्त्ती ने जिस परिश्रम व लगन से कार्य 
| किया है, अत्यन्त प्रेरणादायक है। प्रन्थ को विभिन्‍न 
विषयों के अनुसार विभक्त करके तो इसके महत्व को और 


जन्जिप्पण 
न 


(अधिक बढ़ा दिया है। सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में इसका सर्वत्र 
ह आदर होगा तथा आज का बुद्धिवादी वर्ग इन वाणियों की 
गहराई में जाकर इसके चिन्तन को अधिक व्यापकता देंगे-.- 

ऐसी मुझे आज्ञा है । 


डालगढ़, बीकानेर करणीसिंह 
राजपुताना महाराजा, बीकानेर